पारंपरिक पूजा-पाठ और अनुष्ठानों में सुगंध बिखेरने वाली धूप के तौर पर पहचाना जाने वाला लोबान दरअसल आयुर्वेद का एक अत्यंत मूल्यवान घटक है। इसे शालाकी, सालई, सलई गूगुल अथवा लबान के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में सदियों से जोड़ों के पुराने दर्द और हड्डियों की जकड़न को शांत करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता रहा है। अब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी इसके उपचारात्मक गुणों को गंभीरता से प्रमाणित करना शुरू कर दिया है। पेड़ की छाल से तैयार होने वाले इसके औषधीय अर्क पर हाल के वर्षों में कई गहन शोध हुए हैं, जिनसे साफ हुआ है कि यह ऑस्टियोऑर्थराइटिस, रुमेटॉयड अर्थराइटिस, सांस से जुड़ी तकलीफों और पाचन नली की पुरानी सूजन के उपचार में बेहतरीन प्राकृतिक जड़ी-बूटी साबित हो सकता है।
सूजन पैदा करने वाले तत्वों पर कैसे वार करता है लोबान
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार लोबान का मुख्य औषधीय आधार इसमें मौजूद बोसवेलिक एसिड है। हमारे शरीर के भीतर जब ल्यूकोट्रायनेस नामक रासायनिक यौगिकों का अत्यधिक निर्माण होता है, तब अंदरूनी अंगों और हड्डियों के जोड़ वाले हिस्सों में गंभीर सूजन पनपने लगती है। यही सूजन आगे चलकर गठिया, असहनीय जोड़ों के दर्द और अस्थमा जैसी दीर्घकालिक समस्याओं की मुख्य वजह बनती है। लोबान की छाल में चार खास किस्म के एसिड तत्व पाए जाते हैं, जिनमें अत्यंत शक्तिशाली एंटी-इंफ्लामेटरी गुण मौजूद होते हैं। यह एसिड सीधे तौर पर ल्यूकोट्रायनेस के निर्माण चक्र को बाधित करता है, जिससे ऊतकों में होने वाली सूजन और दर्द के जोखिम को नियंत्रित करने में सीधी मदद मिलती है।
घुटनों के दर्द और ऑस्टियोअर्थराइटिस पर हुआ अध्ययन
साल 2003 में प्रसिद्ध फाइटोमेडिसिन जर्नल में प्रकाशित एक चिकित्सकीय अध्ययन में 30 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया था, जो गंभीर ऑस्टियोअर्थराइटिस और घुटनों के असहनीय दर्द से जूझ रहे थे। इस अध्ययन में शामिल मरीज दर्द के कारण सामान्य रूप से चलने-फिरने में पूरी तरह लाचार हो चुके थे। जब इन प्रतिभागियों को लगातार एक महीने तक नियमित खुराक के तौर पर लोबान का सेवन कराया गया, तो उसके नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे। अध्ययन अवधि पूरी होने के बाद जिन मरीजों के लिए कुछ कदम चलना भी दूभर था, वे बिना किसी तेज दर्द के आराम से टहलने और दैनिक गतिविधियां करने में सक्षम पाए गए।
पेट और आंतों की बीमारियों में भी प्रभावी राहत
इंफ्लामेटरी बाओल डिजीज यानी आईबीडी पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी एक गंभीर व्याधि है, जिसके चलते आंतों में पुरानी सूजन, असहनीय पेट दर्द और पाचन संबंधी गंभीर विकार पैदा हो जाते हैं। वर्ष 2001 में इस समस्या को लेकर किए गए एक शोध में लोबान के चिकित्सकीय प्रभाव की जांच की गई थी। इसके प्राकृतिक सूजन-रोधी गुणों को देखते हुए क्रोन्स और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी आंतों की जटिल बीमारियों से पीड़ित मरीजों को कुछ दिनों तक लोबान से तैयार गोलियों की खुराक दी गई। इस परीक्षण के परिणाम बहुत शानदार रहे और आंतों की सूजन में तेजी से गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद हुए कई अन्य चिकित्सीय अध्ययनों में भी आईबीडी के उपचार में लोबान के नियमित प्रयोग से काफी बेहतर नतीजे देखने को मिले हैं।
अस्थमा और फेफड़ों की एलर्जी में सुरक्षा कवच
ब्रोंकियल अस्थमा की बीमारी का सीधा संबंध भी सांस की नलियों में होने वाली सूजन से जुड़ा हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि बोसवेलिया जड़ी-बूटी का नियमित सेवन सांस की नलियों के तनाव को कम करके अस्थमा के लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित कर सकता है। इसके भीतर मौजूद इम्यून-बैलेंसिंग तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को संतुलित रखते हैं, जिससे बाहरी पर्यावरणीय कारकों, धूल और प्रदूषण के कारण मरीजों में होने वाली मौसमी एलर्जी के प्रभाव को कम करने में बड़ी सहायता मिलती है।
कैंसर कोशिकाओं के फैलाव पर रोकथाम की संभावनाएं
लोबान की छाल में पाए जाने वाले बोसवेलिक एसिड के प्रभाव का परीक्षण कैंसर से जुड़ी प्रयोगशालाओं में भी किया गया है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया कि यह एसिड उन एंजाइमों की कार्यप्रणाली को रोक देता है जो स्वस्थ कोशिकाओं के डीएनए को क्षति पहुंचाने के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। इसके अलावा शुरुआती अध्ययनों में बोसवेलिया को एडवांस्ड ब्रेस्ट कैंसर की अनियंत्रित कोशिकाओं से मुकाबला करने में सक्षम पाया गया है। इसी तरह यह ल्यूकेमिया यानी जानलेवा ब्लड कैंसर, ब्रेन ट्यूमर और पैन्क्रियाटिक कैंसर की कोशिकाओं के अनियंत्रित विभाजन व प्रसार को सीमित करने में भी उपयोगी देखा गया है। हालांकि इन परिणामों को पूरी तरह नैदानिक और व्यावहारिक चिकित्सा में स्थापित करने के लिए अभी बड़े स्तर पर क्लीनिकल परीक्षण किए जाने बाकी हैं।
त्वचा के घाव, पाचन और पारंपरिक आयुर्वेदिक प्रयोग
आयुर्वेद में लोबान को शीत, कषाय और पित्त शामक गुणों से भरपूर माना गया है, जो आधुनिक समय में गोलियों के सुविधाजनक रूप में भी उपलब्ध है। पारंपरिक उपचार में शालाकी की छाल को बारीक पीसकर दाद और फंगल संक्रमण पर लगाने से वह पूरी तरह ठीक हो जाता है। किसी खुले या कटे हुए घाव पर रेशम का पतला कपड़ा रखकर लोबान के फल का चूर्ण छिड़कने और पट्टी बांधने से घाव तेजी से भरने लगता है। त्वचा को शीतलता प्रदान करने और स्वस्थ निखार बनाए रखने के अलावा यह जड़ी-बूटी मानसिक तनाव को कम करने, पाचन तंत्र को दुरुस्त करने, पेचिश की समस्या दूर करने, बुखार का तापमान कम करने, प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में भी अत्यधिक मददगार मानी जाती है।



















