योग अब सिर्फ परंपरा नहीं, मेडिकल साइंस की कसौटी पर भी खरा
भारत की पुरानी योग परंपरा को अब आधुनिक मेडिकल साइंस का भी समर्थन मिल रहा है. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर जहां दुनियाभर में करोड़ों लोग योगाभ्यास करते हैं, वहीं मेडिकल जर्नल्स और क्लिनिकल ट्रायल्स में योग की उपलब्धियां दर्ज हो रही हैं. यह बदलाव बता रहा है कि योग अब महज आस्था का विषय नहीं, बल्कि धीरे-धीरे साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य विकल्प के रूप में अपनी जगह बना रहा है. खासकर हृदय रोग के क्षेत्र में उभर रहे वैज्ञानिक प्रमाण इस दिशा में बेहद अहम हैं.
पिछले दो दशकों में तेज़ हुई योग पर रिसर्च
AIIMS दिल्ली के कार्डियोलोजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंबुज रॉय के अनुसार, योग पर वैज्ञानिक शोध का दायरा पिछले 20 सालों में तेज़ी से बढ़ा है. उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि योग पर प्रकाशित लगभग 90 प्रतिशत साइंटिफिक रिसर्च पेपर पिछले 20 वर्षों में ही सामने आए हैं और पिछले 10 साल में यह रफ्तार और तेज़ हुई है. बायोमेडिकल रिसर्च के प्रमुख सर्च इंजन पबमेड में योग से जुड़े क्लिनिकल ट्रायल्स की संख्या हालिया दशक में पिछले दशक की तुलना में दोगुनी से भी ज़्यादा हो चुकी है. यह ट्रेंड साफ बताता है कि योग को अब मेडिकल रिसर्च की मुख्यधारा में गंभीरता से लिया जाने लगा है.
ICMR का 'योगा-केयर' ट्रायल, कार्डियक रिहैबिलिटेशन में एक मील का पत्थर
हृदय रोगियों के लिए योग की उपयोगिता को सबसे मज़बूती से साबित करने का काम किया है ICMR द्वारा फाइनेंस 'योगा-केयर' ट्रायल ने. यह अध्ययन साल 2020 में जर्नल ऑफ द अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित हुआ था. इसे योग आधारित कार्डियक रिहैबिलिटेशन पर अब तक का सबसे बड़ा रैंडमाइज्ड क्लिनिकल ट्रायल माना जाता है. भारत के 24 केंद्रों में करीब 4000 हार्ट अटैक से उबर रहे मरीजों पर यह परीक्षण किया गया. नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे. जिन मरीजों ने 75 प्रतिशत या उससे ज़्यादा योग सत्रों में भाग लिया, उनमें प्रतिकूल हृदय संबंधी घटनाएं 40 प्रतिशत तक कम देखी गईं. इसके अलावा इन मरीजों ने हार्ट अटैक के बाद बेहतर स्वास्थ्य स्थिति दर्ज की और सामान्य जीवन में अपेक्षाकृत जल्दी वापसी की.
इस ट्रायल की अहमियत सिर्फ इसके नतीजों तक सीमित नहीं है. इसने यह भी साबित किया कि योग का मूल्यांकन उसी कठोरता से किया जा सकता है, जिस कठोरता से दवाओं और मेडिकल उपकरणों की वैज्ञानिक जांच होती है. यानी योग को अब दवाओं की तरह ही परखा जा सकता है.
'केयरमैच' विश्लेषण: अस्पताल में दोबारा भर्ती होने का खतरा 30 प्रतिशत कम
हाल के 'केयरमैच' एनालिसिस ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण नतीजे दिए हैं. इस विश्लेषण के मुताबिक, योग आधारित पुनर्वास पारंपरिक कार्डियक रिहैबिलिटेशन जितना ही फायदेमंद हो सकता है. इससे मरीज़ों की जीवन गुणवत्ता में सुधार हुआ और दोबारा अस्पताल में भर्ती होने की आशंका करीब 30 प्रतिशत तक घट गई. भारत जैसे देश में यह निष्कर्ष खास मायने रखता है, क्योंकि पारंपरिक कार्डियक रिहैबिलिटेशन सेवाएं महंगी हैं और छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. इसके उलट योग तुलनात्मक रूप से सस्ता, सुलभ और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य विकल्प है.
49 स्टडी के विश्लेषण में ब्लड प्रेशर पर भी दिखा असर
49 अलग-अलग अध्ययनों के एक संयुक्त विश्लेषण ने यह भी स्पष्ट किया कि योग के नियमित अभ्यास से औसतन सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर में 5 मीमी-एचजी और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर में 3 मीमी-एचजी की कमी आती है. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्लड प्रेशर में इतनी कमी भी स्ट्रोक और हार्ट अटैक के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से घटा सकती है.
शरीर के भीतर कैसे काम करता है योग?
शोध बताते हैं कि योग शरीर में ऑटोनॉमिक संतुलन को बेहतर करता है, हार्ट-रेट वैरिएबिलिटी बढ़ाता है और तनाव से जुड़े हार्मोनल सीक्रेशन को कम करता है. साथ ही यह मानसिक स्वास्थ्य को मज़बूत बनाने में भी मदद करता है. ये सभी पहलू हृदय स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी माने जाते हैं. यानी योग सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि मन और दिल दोनों को एक साथ दुरुस्त रखने में सक्षम है. यही वजह है कि विशेषज्ञ अब इसे एक व्यापक और समग्र हृदय देखभाल उपकरण के रूप में देख रहे हैं.













