जोधपुर के दो अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में बीते एक दिन के भीतर दो प्रसूताओं की जान चली गई, जिसने शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में ला खड़ा किया है। एक महिला ने मथुरादास माथुर अस्पताल में दम तोड़ा तो दूसरी की मौत महात्मा गांधी अस्पताल में इलाज के दौरान हुई। दोनों ही मामलों में डॉक्टरों ने अत्यधिक रक्तस्राव और गंभीर स्वास्थ्य हालत की बात कही है, जबकि परिजन इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए पूरे मामले की जांच की मांग कर रहे हैं।
डिस्चार्ज के दो दिन बाद ट्रॉमा वार्ड में तोड़ा दम
ताजा और सबसे चर्चित मामला मथुरादास माथुर अस्पताल यानी एमडीएम अस्पताल का है। यहां एक प्रसूता करीब 20 दिनों से भर्ती थी और लगातार उसका इलाज चल रहा था। 17 जुलाई को डॉक्टरों ने उसकी सेहत में सुधार देखते हुए उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी। परिजनों के मुताबिक महिला घर लौटी तो सब कुछ ठीक लग रहा था, लेकिन महज दो दिन बाद यानी 19 जुलाई को उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। हालत ज्यादा बिगड़ने पर परिवार वाले उसे दोबारा एमडीएम अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसे ट्रॉमा वार्ड में भर्ती किया गया। इलाज के दौरान ही महिला की मौत हो गई। बीस दिन तक अस्पताल में रहने के बावजूद डिस्चार्ज के दो दिन के भीतर मौत होने से परिजन बेहद नाराज हैं और वे शुरू से लेकर आखिर तक हुए पूरे इलाज की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
25 दिन वेंटिलेटर पर रही महिला, प्रसव के बाद रक्तस्राव से गई जान
इससे पहले रविवार को महात्मा गांधी अस्पताल में भी एक प्रसूता की मौत हुई थी। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार यह महिला पिछले 25 दिनों से वेंटिलेटर पर भर्ती थी। प्रसव के बाद उसे अत्यधिक रक्तस्राव हुआ था, जिसकी वजह से उसकी हालत लगातार नाजुक बनी हुई थी। डॉक्टरों ने उसे बचाने के लिए इन 25 दिनों तक लगातार इलाज जारी रखा, लेकिन आखिरकार उसकी जान नहीं बच सकी। इस मौत के बाद भी परिजनों ने चुप्पी नहीं साधी और अस्पताल प्रबंधन से इलाज की पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल पूछे। परिवार का कहना है कि इतने लंबे समय तक इलाज चलने के बावजूद महिला को क्यों नहीं बचाया जा सका, इसका जवाब मिलना चाहिए।
मेडिकल रिकॉर्ड की जांच शुरू, प्रोटोकॉल पालन पर नजर
दोनों प्रसूताओं की मौत के बाद चिकित्सा विभाग हरकत में आ गया है और पूरे मामले की जानकारी जुटाई जा रही है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि दोनों मामलों के मेडिकल रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की जा रही है। इस दौरान यह देखा जाएगा कि इलाज के हर चरण में तय चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं। अगर जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो नियमानुसार संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल दोनों ही मामलों में चिकित्सा विभाग की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद स्थिति साफ हो पाएगी कि आखिर इलाज में कहां चूक हुई।




















