झारखंड की राजधानी रांची में इस समय एक गंभीर स्वास्थ्य संकट सामने आया है, जहां रैट फीवर की वजह से 129 बच्चे अस्पतालों में भर्ती कराए गए हैं। इस बीमारी का प्रकोप रांची के अलावा आसपास के कई जिलों में भी तेजी से पैर पसार रहा है। इस स्थिति ने आम लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर यह बीमारी क्या है और क्या यह किसी महामारी की तरह आगे बढ़ सकती है। चूंकि प्रभावित होने वालों में अधिकतर बच्चे शामिल हैं, इसलिए लोगों में यह भ्रम भी फैल गया है कि क्या यह संक्रमण केवल बच्चों को ही अपनी चपेट में लेता है। इन तमाम चिंताओं और सवालों के समाधान के लिए नई दिल्ली स्थित सिक्किम मणिपाल अस्पताल की इंटरनल मेडिसीन की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. स्वाति माहेश्वरी से विस्तार से बातचीत की गई।
क्या रैट फीवर से डरने की जरूरत है और यह कैसे फैलता है
विशेषज्ञों ने साफ किया है कि इस बीमारी को लेकर अत्यधिक घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह बीमारी यदा-कदा ही सामने आती है और यह कोरोना वायरस की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में बिल्कुल नहीं फैलती है। हालांकि यह बच्चों के लिए थोड़ी तकलीफदेह जरूर साबित हो सकती है, लेकिन वयस्कों पर इसका असर अमूमन उतना गंभीर नहीं होता है। राहत की बात यह है कि इसका सौ फीसदी इलाज संभव है। लेप्टोस्पायरा नामक बैक्टीरिया के कारण होने वाली यह बीमारी मुख्य रूप से चूहे, छुछुंदर और खरगोश जैसे संक्रमित जीवों से इंसानों तक पहुंचती है। जब ये जीव इस बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाते हैं, तो उनके शरीर में यह पनपने लगता है और फिर उनके पेशाब तथा अन्य तरल पदार्थों के जरिए जमीन या पानी में मिल जाता है।
संक्रमण का तरीका और शरीर पर इसके शुरुआती प्रभाव
जब कोई व्यक्ति इस तरह के संक्रमित पानी या दूषित धरती के संपर्क में आता है, तो बैक्टीरिया उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। मेडिकल विज्ञान में इस स्थिति को लेप्टोस्पायरोसिस कहा जाता है। शरीर के भीतर पहुंचने के बाद यह बैक्टीरिया दो से चौदह दिनों के भीतर इंसान के खून में मिल जाता है और संक्रमण की शुरुआत करता है। जब किसी व्यक्ति को यह बीमारी होती है, तो उसके शरीर में कई तरह के लक्षण नजर आने लगते हैं। इनमें तेज बुखार, आंखों में लालीपन यानी कंजक्टीवायवल, सिरदर्द, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन, पेट में दर्द, मिचली, उल्टी, डायरिया और त्वचा पर रैशेज शामिल हैं। इसके अलावा कुछ मामलों में मरीजों को पीलिया की शिकायत भी हो सकती है। यदि यह संक्रमण और अधिक गंभीर रूप ले ले, तो खांसते समय खून आना, छाती में दर्द, त्वचा का पीला पड़ना, मल का रंग काला होना, पेशाब में खून आना और शरीर पर कई जगहों पर रैशेज उभरने जैसे लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं।
वेल्स डिजीज का खतरा और आंतरिक अंगों पर असर
डॉक्टरों के मुताबिक जब रैट फीवर या लेप्टोस्पायरोसिस शरीर के अंदर बहुत खतरनाक रूप धारण कर लेता है, तब यह वेल्स डिजीज में बदल जाता है। इस अवस्था में बैक्टीरिया शरीर के महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों, विशेष रूप से लिवर, किडनी और मस्तिष्क को भारी नुकसान पहुंचाने लगता है। लेप्टोस्पायरोसिस के बैक्टीरिया रक्त वाहिकाओं यानी ब्लड वेसल्स तक पहुंचकर इनकी दीवारों पर हमला करते हैं। इसकी वजह से किडनी के अंदर मौजूद बेहद बारीक नलिकाओं में सूजन पैदा होने लगती है। चूँकि किडनी का मुख्य कार्य खून को छानना और उसमें मौजूद हानिकारक कचरे को बाहर निकालना है, इसलिए जब इसकी सूक्ष्म नलिकाओं में संक्रमण और सूजन होती है, तो ब्लड वेसल्स से रिसाव शुरू हो जाता है। इस स्थिति में ऑक्सीजन आगे नहीं पहुँच पाती है और कोशिकाएँ मरने लगती हैं, जिसके परिणामस्वरूप किडनी अपना काम करना बंद कर सकती है और मरीज को किडनी फेल्योर का सामना करना पड़ सकता है।
लिवर पर प्रभाव और मल्टी ऑर्गन फेल्योर की स्थिति
जब यह बैक्टीरिया लिवर तक पहुँचता है, तो वहाँ की कोशिकाओं के बीच के आपसी जोड़ों को कमजोर करना शुरू कर देता है। इसके कारण लिवर में सूजन आ जाती है और पित्त की नलिकाएँ अवरुद्ध होने लगती हैं, जिससे बिलीरुबिन खून में मिलने लगता है और गंभीर जॉन्डिस की स्थिति पैदा हो जाती है। लिवर का सामान्य कामकाज पूरी तरह से ठप हो जाता है और शरीर में टॉक्सिन जमा होने लगते हैं। यदि स्थिति बहुत ज्यादा गंभीर हो जाए, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम अतिसक्रिय हो जाती है और इस बैक्टीरिया से मुकाबला करने के लिए साइटोकाइन्स का स्राव करती है। साइटोकाइन्स की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ने पर यह बैक्टीरिया के साथ-साथ खुद शरीर के अंगों के ऊतकों को भी नुकसान पहुँचाने लगता है, जिससे मल्टी ऑर्गन फेल्योर का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
इस संक्रमण से खुद को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना है। चूँकि यह बीमारी मुख्य रूप से चूहों के पेशाब से फैलती है, इसलिए बारिश के पानी, जलभराव वाले क्षेत्रों और गंदे नालों के पानी में चलने से हमेशा बचना चाहिए। घर वापस लौटने पर सबसे पहले अपने हाथ और पैर अच्छी तरह साफ पानी से धोने चाहिए। बारिश के मौसम में इस बात का खास ख्याल रखना बेहद जरूरी है। यदि आप ऐसे इलाके में रहते हैं जहाँ पानी भर जाता है, तो गमबूट और फुल वॉटरप्रूफ दस्ताने का इस्तेमाल करें। शरीर पर यदि किसी प्रकार का कटा, छिला या खुला घाव है, तो उस पर वॉटरप्रूफ बैंडेज लगाकर रखें ताकि दूषित पानी सीधे रक्त के संपर्क में न आ सके। गंदे पानी में भीगे हुए कपड़ों को तुरंत बदल दें और उन्हें अच्छी तरह धोकर धूप में सुखाएँ। बच्चों को बिल्कुल अनुमति न दें कि वे बारिश के रुके हुए गंदे पानी या कीचड़ में खेलें। हमेशा अच्छी तरह उबला हुआ या प्यूरीफाई किया हुआ पानी ही पीने के लिए इस्तेमाल करें। पके हुए भोजन और पीने के पानी को हमेशा ढककर रखें ताकि चूहे उन तक न पहुँच सकें। खाने-पीने के बर्तनों का इस्तेमाल करने से पहले उन्हें साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। अपने घर और आसपास के परिसर में कचरा बिल्कुल जमा न होने दें और डस्टबिन को हमेशा ढक्कन से बंद रखें। यदि शरीर में किसी भी तरह के संक्रमण के लक्षण दिखाई दें, तो बिना किसी देरी के डॉक्टर से संपर्क करें। किसी भी स्थिति में खुद से मेडिकल स्टोर जाकर दवाइयाँ न खरीदें और न ही अपनी मर्जी से कोई इलाज शुरू करें।



















