जूता खरीदते समय ज्यादातर लोग सिर्फ साइज देखते हैं. साइज गलत हो तो पैरों में दर्द होने लगता है और जूता पहनते ही उतार देने का मन करता है, यह बात सही है. लेकिन सेहत के लिहाज से एक और चीज है जो साइज जितनी ही अहम है, और वह है जूते की क्वालिटी यानी उसकी रेटिंग. अगर यह रेटिंग ठीक न हो तो जूता आपकी सेहत को सीधा नुकसान पहुंचा सकता है.
हाल ही में आर्थोपेडिक सर्जन और इंटीग्रेटिव मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. किरण शेटे ने सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह के जूतों को नंबर दिए. उन्होंने ट्रेनिंग शूज को सबसे ऊपर 10/10 पर रखा, जबकि स्लिप-ऑन्स और सस्ते लचीले जूतों को सबसे निचले पायदान पर.
आखिर इस रेटिंग का मतलब क्या है
TrendKia से बातचीत में Zen Multispeciality Hospital, चेंबूर के कंसलटेंट और नी रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. राकेश नायर ने इस रेटिंग का मतलब समझाया. उनके मुताबिक यह नंबर बताता है कि मेडिकली किसी जूते की गुणवत्ता 10 में से कितनी है. इसका मकसद सिर्फ इतना है कि लोग सही जूता चुन सकें. गलत जूते पैरों, टखनों, घुटनों और यहां तक कि रीढ़ की हड्डी तक को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए सही चुनाव बेहद जरूरी है.
रनिंग शूज: 8/10
डॉ. शेटे ने रनिंग शूज को 8/10 दिया है और डॉ. राकेश नायर भी इसे सही ठहराते हैं. डॉ. नायर के अनुसार बेहतर कुशनिंग और झटका सोखने की क्षमता यानी शॉक एब्जॉर्प्शन के कारण ये जूते चलने, जॉगिंग और रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए सबसे उपयुक्त हैं. ये चलते-फिरते घुटनों और पैरों पर पड़ने वाले दबाव को घटाते हैं. हालांकि हर गतिविधि के लिए ये बेस्ट नहीं हैं. झटका सोखने में अच्छे होने के बावजूद कई रनिंग शूज जिम वर्कआउट या अचानक दिशा बदलने वाले मूवमेंट में पैरों को पर्याप्त साइड-सपोर्ट नहीं दे पाते.
ट्रेनिंग शूज: 10/10
सबसे ऊंची रेटिंग ट्रेनिंग शूज को मिली है. डॉ. नायर बताते हैं कि ज्यादा कुशनिंग वाले रनिंग शूज के उलट इन्हें पैरों की स्थिरता और मजबूती के हिसाब से डिजाइन किया जाता है. यही वजह है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, जिम वर्कआउट और फंक्शनल एक्सरसाइज के दौरान संतुलन बनाए रखने में ये बहुत मदद करते हैं. इनका डिजाइन पैरों की स्थिरता सुधारता है और वर्कआउट के दौरान चोट लगने का खतरा घटाता है. अगर आपके रूटीन में स्क्वैट्स, लंजेस या वेट लिफ्टिंग शामिल है तो ये सबसे सुरक्षित विकल्पों में से एक हो सकते हैं.
स्लिप-ऑन शूज: 3/10
स्लिप-ऑन जूतों को काफी कम नंबर मिले हैं. इसकी वजह यह है कि ये पैर को अच्छी ग्रिप और मजबूती नहीं देते, जिससे चलते समय पैर इनके अंदर हिलता-डुलता रहता है. पैर की इसी हलचल से संतुलन बिगड़ने, टखना मुड़ने या पैर में खिंचाव आने का खतरा बढ़ जाता है. लंबे समय तक चलने या खड़े रहने पर परेशानी और बढ़ती है. छोटी-मोटी भागदौड़ या कैजुअल इस्तेमाल के लिए ये सुविधाजनक जरूर हैं, पर देर तक पहनने के लिए सही नहीं माने जाते.
हल्के और कम सपोर्ट वाले मिनिमलिस्ट शूज: 6/10
मिनिमलिस्ट शूज को औसत रेटिंग दी गई है. ये जूते पैर के प्राकृतिक मूवमेंट और लचीलेपन को बढ़ावा देते हैं, लेकिन हर किसी के लिए सही नहीं होते. डॉ. नायर के मुताबिक कुछ लोग इनके आदी हो जाते हैं, जबकि दूसरों को, खासकर शुरुआती लोगों या जिन्हें पहले से पैर की कोई समस्या है, कम कुशनिंग और सपोर्ट के कारण पैरों और पिंडलियों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ सकता है.
हाई-कुशन शूज: 6/10
ज्यादा कुशनिंग वाले जूतों को भी औसत रेटिंग ही मिली है. इनके बेहद सॉफ्ट तलवे शुरुआत में बड़े आरामदायक लग सकते हैं, मगर हद से ज्यादा कुशनिंग कभी-कभी पैरों की स्थिरता घटा देती है. खासकर वर्कआउट या ऐसे मूवमेंट के दौरान जहां पैर का जमीन पर मजबूती से टिकना जरूरी हो, वहां ये दिक्कत दे सकते हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ आराम मिलने का मतलब सही सपोर्ट मिलना नहीं होता.
सस्ते लचीले जूते: 2/10
सबसे कम रेटिंग इन्हीं जूतों को दी गई है. इन कमजोर जूतों में अक्सर पैर के तलवे को मिलने वाला सही सपोर्ट, शॉक एब्जॉर्प्शन और बनावट की मजबूती नहीं होती. समय के साथ सही सपोर्ट न मिलने से पैरों का अलाइनमेंट बिगड़ सकता है और जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. जो जूता आसानी से मुड़ जाता है वह शुरू में हल्का और आरामदायक लग सकता है, पर विशेषज्ञ चेताते हैं कि लंबे समय में पैर का सपोर्ट कहीं ज्यादा मायने रखता है.













