स्कूली बच्चों को ऑटो में ठूंस-ठूंसकर बिठाने से बिगड़ रही उनकी रीढ़ और गर्दन, डॉक्टरों ने चेतायास्वास्थ्य
2 घंटे पहले· 3

स्कूली बच्चों को ऑटो में ठूंस-ठूंसकर बिठाने से बिगड़ रही उनकी रीढ़ और गर्दन, डॉक्टरों ने चेताया

रायपुर सहित छत्तीसगढ़ में स्कूल जाने वाले ऑटो और ई-रिक्शा में क्षमता से दोगुने बच्चों को बिठाया जा रहा है, जिससे उनमें गर्दन दर्द, सर्वाइकल और कमर दर्द जैसी शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं।

सुबह-सुबह स्कूल के लिए निकलने वाले बच्चों को माता-पिता जिस ऑटो या ई-रिक्शा में बैठाकर निश्चिंत हो जाते हैं, असल में वही सफर अब उनकी सेहत के लिए खतरा बनता जा रहा है। रायपुर समेत पूरे छत्तीसगढ़ में स्कूली बच्चों को ऑटो में क्षमता से कहीं ज्यादा ठूंसकर बिठाया जा रहा है, और डॉक्टरों का कहना है कि इसका सीधा असर बच्चों की हड्डियों, गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर पड़ रहा है। यही वजह है कि छोटी उम्र में ही बच्चों को अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

दरअसल ऑटो चालकों की थोड़ी ज्यादा कमाई की चाहत और अभिभावकों की थोड़ी सी बेफिक्री मिलकर बच्चों को दोहरी मुसीबत में डाल रही है, एक तरफ सड़क हादसे का खतरा तो पहले से ही बना रहता है, अब इसमें शरीर के ढांचे के बिगड़ने का नया खतरा भी जुड़ गया है।

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8 सीट के ऑटो में 14 बच्चे, बड़े वाहनों में 22 सवारी

सड़कों पर चलने वाले जिन ऑटो की क्षमता महज 8 सीट की होती है, उनमें रोजाना 12 से 14 बच्चों को ठूंसकर बिठाया जा रहा है, यानी तय क्षमता से लगभग दोगुना। वहीं 16 सीट क्षमता वाले बड़े सवारी वाहनों की हालत तो और भी चिंताजनक है, जहां 20 से 22 मासूम बच्चों को जैसे-तैसे लादकर स्कूल पहुंचाया और वापस घर लाया जा रहा है। इतनी भीड़ की वजह से छोटे बच्चों को ठीक से बैठने की जगह तक नहीं मिल पाती। कोई बच्चा आगे की तरफ झुककर बैठने को मजबूर होता है, तो कोई सीट के किनारे पर आधा लटककर सफर करता है। कई बच्चे तो पूरे रास्ते खड़े रहकर ही यात्रा पूरी करने को मजबूर हैं।

बच्चों की सेहत पर क्यों पड़ रही मार

इतनी तंग जगह में ठूंसकर बैठने की वजह से बच्चों की पीठ, कमर और रीढ़ की हड्डी पर लगातार दबाव बनता रहता है। यही वजह है कि इतनी कम उम्र में ही बच्चों में गर्दन दर्द, सर्वाइकल और मांसपेशियों में खिंचाव जैसी गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं। मेकाहारा के शिशु रोग विभाग सहित शहर के तमाम प्रमुख हड्डी रोग विशेषज्ञों ने भी इस बढ़ते ट्रेंड की पुष्टि की है। डॉक्टरों के मुताबिक ऐसे 3 से 4 केस रोजाना अस्पतालों में पहुंच रहे हैं।

हर महीने 4-5 बच्चे पूरी तरह बिगड़े पोश्चर के साथ पहुंच रहे अस्पताल

हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ सुरेंद्र शुक्ला बताते हैं कि आजकल लगभग हर अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने के लिए ऑटो या वैन किराए पर लेते हैं, लेकिन ऑटो चालक थोड़ी ज्यादा कमाई के चक्कर में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठा लेते हैं। इससे सड़क दुर्घटना का खतरा तो बना ही रहता है, लेकिन अब इसके साथ बच्चों का शारीरिक पोश्चर बिगड़ने का एक नया और गंभीर खतरा भी जुड़ गया है। डॉ शुक्ला के मुताबिक हर महीने उनके पास 4 से 5 ऐसे बच्चे इलाज के लिए आते हैं, जिनका पोश्चर पूरी तरह प्रभावित हो चुका होता है। रोजाना 20 से 40 मिनट तक लगातार गलत तरीके से बैठकर सफर करने से बच्चों की रीढ़ की हड्डी, कमर और गर्दन की नाजुक नसों पर गैर-जरूरी दबाव पड़ता है।

कोमल हड्डियों पर क्यों पड़ रहा है इतना ज्यादा असर

छोटे बच्चों की हड्डियां और मांसपेशियां अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई होतीं, इसलिए असहज स्थिति में लंबे समय तक बैठे रहना आगे चलकर गंभीर समस्याएं खड़ी कर सकता है। जब बच्चे ऑटो में एक-दूसरे से पूरी तरह सटकर और दबकर बैठते हैं, तो गाड़ी के हर झटके के साथ अपना संतुलन बनाए रखने के लिए उन्हें बार-बार झुकना या मुड़ना पड़ता है। इस लगातार झुकने-मुड़ने से पीठ और कमर की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि कई बच्चों में गर्दन दर्द, कंधों में अकड़न, कमर दर्द और मांसपेशियों में सूजन जैसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।

नजरअंदाज किया तो झेलनी पड़ सकती है स्थायी परेशानी

अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो आगे चलकर बच्चों की रीढ़ की हड्डी की प्राकृतिक बनावट भी प्रभावित हो सकती है। समय रहते ध्यान न दिए जाने पर बच्चों में कमर दर्द, सर्वाइकल दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी और शरीर के संतुलन में गड़बड़ी जैसी स्थायी समस्याएं बन सकती हैं। इसका सीधा असर आगे चलकर बच्चों के खेलकूद, पढ़ाई और रोजमर्रा की दिनचर्या पर भी पड़ेगा।

बचाव के लिए डॉक्टरों की सलाह

डॉक्टरों के मुताबिक इस समस्या के शुरुआती चरण में आने वाले ज्यादातर बच्चों को दवाइयों की जरूरत नहीं पड़ती। सबसे पहले उन्हें बैठने की आदत सुधारने की सलाह दी जाती है। जरूरत पड़ने पर हल्की दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं, कैल्शियम और विटामिन-डी की जांच कराई जाती है, और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम व फिजियोथेरेपी कराई जाती है। अभिभावकों के लिए भी यह जरूरी सलाह है कि वे अपने बच्चों को किसी भी हाल में ऐसे ऑटो या वाहन में न भेजें, जिसमें क्षमता से ज्यादा बच्चे ठूंसे गए हों। सफर के दौरान बच्चे की पीठ को पूरा सहारा मिलना चाहिए और उसके पैर जमीन या पायदान पर टिके होने चाहिए। इसके अलावा बच्चों को रोजाना कम से कम 20 से 30 मिनट शारीरिक गतिविधि और स्ट्रेचिंग जरूर कराई जानी चाहिए। अगर बच्चा बार-बार कमर, गर्दन या पीठ दर्द की शिकायत करे, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराएं।

सवाल-जवाब

रायपुर में 8 सीट के ऑटो में कितने बच्चों को बिठाया जा रहा है?
8 सीट क्षमता वाले ऑटो में रोजाना 12 से 14 बच्चों को ठूंसकर बिठाया जा रहा है, जो तय क्षमता से लगभग दोगुना है।
16 सीट वाले बड़े वाहनों में कितने बच्चे सफर कर रहे हैं?
16 सीट क्षमता वाले बड़े सवारी वाहनों में 20 से 22 बच्चों को बिठाकर स्कूल लाया और ले जाया जा रहा है।
बच्चों में किस तरह की स्वास्थ्य शिकायतें सामने आ रही हैं?
बच्चों में गर्दन दर्द, सर्वाइकल, कंधों में अकड़न, कमर दर्द और मांसपेशियों में खिंचाव व सूजन जैसी शिकायतें देखने को मिल रही हैं।
अस्पतालों में रोजाना कितने ऐसे केस पहुंच रहे हैं?
डॉक्टरों के मुताबिक ऐसे 3 से 4 केस रोजाना अस्पतालों में पहुंच रहे हैं।
डॉ सुरेंद्र शुक्ला के पास हर महीने कितने बच्चे इलाज के लिए आते हैं?
डॉ सुरेंद्र शुक्ला के मुताबिक हर महीने उनके पास 4 से 5 ऐसे बच्चे आते हैं जिनका पोश्चर पूरी तरह प्रभावित हो चुका होता है।
इस समस्या का इलाज कैसे किया जाता है?
शुरुआती चरण में ज्यादातर बच्चों को दवाइयों की जरूरत नहीं होती, बैठने की आदत सुधारने के अलावा जरूरत पड़ने पर हल्की दर्द निवारक दवाएं, कैल्शियम व विटामिन-डी की जांच और फिजियोथेरेपी कराई जाती है।
अभिभावकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
अभिभावकों को बच्चों को ऐसे ऑटो में नहीं भेजना चाहिए जिसमें क्षमता से ज्यादा बच्चे बैठे हों, सफर में पीठ को सहारा और पैर टिकने की जगह मिलनी चाहिए, और रोजाना 20 से 30 मिनट स्ट्रेचिंग करानी चाहिए।
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