करौंदा एक ऐसा छोटा और खट्टा-मीठा फल है जिसका इस्तेमाल भारत के घरों में बड़े पैमाने पर अचार, चटनी, मुरब्बा, जैम और जेली बनाने के लिए किया जाता है। खाने के स्वाद को बढ़ाने के साथ-साथ यह पौधा अपनी शानदार पैदावार और औषधीय खूबियों के लिए भी अपनी खास पहचान रखता है। आयुर्वेद में इसके फल से लेकर पत्तियों और जड़ों तक का उपयोग विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है।
पर्यावरण विभाग ने साझा की खूबियां
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने अपने एक एक्स पोस्ट में करौंदे के पौधे से जुड़ी अहम जानकारियां साझा की हैं। विभाग के अनुसार, यह एक ऐसा पौधा है जो बहुत कम देखभाल के बाद भी आसानी से पनप जाता है। इस पर छोटे-छोटे और बेहद खुशबूदार फूल खिलते हैं। इसके फल जैसे-जैसे पकते हैं, वैसे-वैसे उनका रंग बदलता जाता है। शुरुआत में कच्चे करौंदे हरे रंग के होते हैं, जो पकने के बाद लाल और फिर गहरे बैंगनी से काले रंग तक के हो जाते हैं।
संरक्षक बाड़ के रूप में उपयोग
एक वयस्क करौंदे का पौधा लगभग 8 से 12 फीट तक ऊंचा हो सकता है। इसकी पत्तियां छोटी, मोटी और एक-दूसरे के आमने-सामने यानी विपरीत क्रम में व्यवस्थित होती हैं। इसकी शाखाओं और तनों पर कड़े और मजबूत कांटे पाए जाते हैं। इसी विशेषता के कारण कई लोग अपने खेतों या बागों के चारों ओर प्राकृतिक बाड़ या एक मजबूत सुरक्षा घेरा तैयार करने के लिए इसे लगाते हैं। करौंदे के फलों का सेवन सीधे भी किया जा सकता है, हालांकि इनका तीखा खट्टापन हर किसी को रास नहीं आता, इसलिए भारतीय रसोई में इन्हें मुख्य रूप से चटनी, अचार और मीठी चीजों में बदला जाता है।
पोषण का पावरहाउस
विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, करौंदा आयरन और विटामिन-सी का एक बेहतरीन स्रोत माना जाता है। इसमें मौजूद पोषक तत्व इसे संतुलित खानपान का एक उपयोगी हिस्सा बनाते हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए सिर्फ इस फल या पौधे पर निर्भर रहने के बजाय हमेशा चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।
आयुर्वेद में करौंदे का महत्व
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में करौंदे के फलों का इस्तेमाल कई प्रकार की शारीरिक परेशानियों को दूर करने के लिए किया जाता रहा है। पेट की गड़बड़ियों जैसे एसिडिटी, अपच, पेट दर्द, कब्ज, भूख न लगना, शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया और त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं के पारंपरिक उपचार में इसका नाम आता है। इसके अलावा शरीर पर लगे घावों, कुछ खास मूत्र संबंधी विकारों और मधुमेह से जुड़े अल्सर के मामलों में भी इसके पारंपरिक उपयोग का जिक्र मिलता है।
पत्तियों और जड़ों के औषधीय गुण
सिर्फ फल ही नहीं, बल्कि करौंदे की पत्तियों से तैयार काढ़ा भी पारंपरिक चिकित्सा में काफी लोकप्रिय है। जानकारों के अनुसार, इस काढ़े का इस्तेमाल बुखार, दस्त और कान के दर्द जैसी समस्याओं से राहत पाने के लिए किया जाता है। वहीं दूसरी ओर, इस पौधे की जड़ों का उपयोग पेट से जुड़ी विभिन्न गड़बड़ियों और अन्य पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता रहा है।



















