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लखीमपुर खीरी में पंगास मछली की मांग क्यों बढ़ रही है, जानिए इसके फायदेस्वास्थ्य
13 अक्तू॰ 2026, 6:33 am (14 दिन पहले)· 3

लखीमपुर खीरी में पंगास मछली की मांग क्यों बढ़ रही है, जानिए इसके फायदे

लखीमपुर खीरी और तराई इलाकों में पंगास मछली अपनी कम कांटों वाली बनावट के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है। लोग बच्चों और बुजुर्गों के लिए इसे सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और उसके आसपास के तराई क्षेत्र में मछली के शौकीनों की कमी नहीं है। यहां के बाजारों में रोहू, कतला और नैनी जैसी पारंपरिक मछलियां लंबे समय से लोगों की पहली पसंद बनी हुई हैं। लोग इन्हें अपने रोजमर्रा के भोजन से लेकर शादी-विवाह और विभिन्न आयोजनों में बड़े चाव से शामिल करते हैं। इनका स्वाद और स्थानीय बाजारों में इनकी आसान उपलब्धता इन्हें खास बनाती है। हालांकि इन तमाम खूबियों के बावजूद एक बड़ी समस्या हमेशा से इनके साथ जुड़ी रही है और वह है इनमें मौजूद छोटे और बारीक कांटे।

कांटों की झंझट से राहत

मछली को स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद फायदेमंद माना जाता है क्योंकि इसमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होता है जो शरीर की मांसपेशियों के निर्माण और उनकी देखरेख में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा मछली में कई तरह के पोषक तत्व भी पाए जाते हैं जो प्रजाति और उसके खानपान पर निर्भर करते हैं। लेकिन इसके बावजूद कई लोग केवल इस डर से मछली खाने से कतराते हैं कि कहीं खाने के दौरान कोई बारीक कांटा गले में न फंस जाए। खासकर परिवारों में जहां छोटे बच्चे और बुजुर्ग होते हैं, वहां मछली परोसते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है।

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पंगास मछली बन रही है नया विकल्प

इस समस्या का एक बेहतरीन विकल्प अब लखीमपुर खीरी के बाजारों में तेजी से उभर रहा है और लोग पंगास मछली को तेजी से अपना रहे हैं। मत्स्य पालन विभाग के अधिकारी निखिल त्रिपाठी के अनुसार मछली पोषक तत्वों का एक बेहतरीन स्रोत है, लेकिन बारीक कांटों की वजह से लोग इसे खाने से कतराते हैं। पंगास मछली में अन्य पारंपरिक मछलियों की तरह छोटे और उलझाने वाले कांटे नहीं होते हैं। इसके मांस से मुख्य हड्डी को बहुत आसानी से अलग किया जा सकता है, जिससे इसे खाना और परोसना काफी सुविधाजनक हो जाता है।

बाजारों में क्यों बढ़ रहा है इसका दायरा

पंगास मछली की लोकप्रियता अब केवल घरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि स्थानीय मछली बाजारों में भी इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी नरम बनावट और कांटों की कम परेशानी ने इसे खानपान के कारोबार से जुड़े लोगों के बीच भी लोकप्रिय बना दिया है। शहर के होटल, ढाबे और बड़े आयोजन स्थलों पर अब इस मछली का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। शादियों या पार्टियों जैसे बड़े आयोजनों में जहां एक साथ सैंकड़ों लोगों के लिए खाना तैयार किया जाता है, वहां ऐसी मछली को प्राथमिकता दी जाती है जिसे साफ करना और जिसके मांस से हड्डियां निकालना आसान हो।

खानपान में इसके अलग-अलग रूप

पंगास मछली की एक और खूबी यह है कि इसे पकाने के कई अलग-अलग तरीके मौजूद हैं। इसे आसानी से फ्राई किया जा सकता है, इसकी स्वादिष्ट करी बनाई जा सकती है या फिर इसे अन्य व्यंजनों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके मांस की बनावट इसे कई तरह की रेसिपी के अनुकूल बनाती है। यही वजह है कि लखीमपुर खीरी के तराई इलाके में लोग पारंपरिक रोहू और कतला के विकल्प के रूप में पंगास को चुन रहे हैं ताकि बिना किसी डर के स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन का आनंद लिया जा सके।

सवाल-जवाब

पंगास मछली लखीमपुर खीरी में क्यों लोकप्रिय हो रही है?
पंगास मछली अपनी नरम बनावट और बारीक कांटों की कम परेशानी के कारण लखीमपुर खीरी में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
पारंपरिक मछलियों में क्या समस्या होती है?
रोहू, कतला और नैनी जैसी पारंपरिक मछलियों के मांस में छोटे और बारीक कांटे होते हैं जिन्हें अलग करना मुश्किल होता है।
मत्स्य पालन अधिकारी निखिल त्रिपाठी के अनुसार पंगास की क्या विशेषता है?
निखिल त्रिपाठी के अनुसार पंगास में दूसरी मछलियों की तरह बारीक कांटों की परेशानी कम होती है और इसकी मुख्य हड्डी आसानी से अलग हो जाती है।
क्या पंगास मछली का इस्तेमाल होटलों और ढाबों में होता है?
हाँ, पंगास की मांग घरेलू बाजारों के अलावा होटल, ढाबों और बड़े आयोजनों में भी बढ़ रही है।
पंगास मछली को किन तरीकों से पकाया जा सकता है?
पंगास मछली को फ्राई करके, करी बनाकर और अन्य व्यंजनों के रूप में आसानी से पकाया जा सकता है।
मछली खाने से शरीर को क्या फायदा मिलता है?
मछली में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन पाया जाता है जो शरीर की मांसपेशियों के निर्माण और रखरखाव में मदद करता है।
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टिप्पणियाँ 5

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·13 दिन पहले

बच्चे और बुजुर्ग घर में हों तो मछली खिलाना किसी टास्क से कम नहीं लगता। पंगास में कांटे न होने की बात वाकई राहत देने वाली है, कम से कम गले में कांटा फंसने का डर तो खत्म हुआ।

Sophie Laurent@sophie-laurent·13 दिन पहले

लंदन के सुपरमार्केट में बिना कांटे वाली ऐसी ही मछली मिलती है, जो बच्चों को खिलाते वक्त डर नहीं रहता।

Ravikash Gupta@ravikash·13 दिन पहले

सोफी, सच कहा! पर क्या यहाँ भी वैसी ही बिना कांटे वाली पंगास मिलने लगी है जो बच्चों को आसानी से खिला सकें?

Nyra Kaif@nyra-kaif·13 दिन पहले

छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए कांटों वाली मछली चुनना सचमुच किसी सिरदर्द से कम नहीं होता। पंगास का यह विकल्प वाकई राहत देने वाला है, अब बिना डरे मछली का मज़ा लिया जा सकता है!

Michael Anderson@michael-anderson·13 दिन पहले

निखिल त्रिपाठी जी ने बिल्कुल सही कहा, बच्चों और बुजुर्गों के लिए कांटे निकालना सच में बहुत बड़ा झंझट होता है।

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