मेरठ में इन दिनों बच्चों के बीच मोबाइल गेमिंग और इंटरनेट मीडिया का आकर्षण लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसके परिणाम कई बार बेहद चिंताजनक सामने आते हैं। युवा और कम उम्र के बच्चे आभासी दुनिया की चमक-धमक में इस हद तक खो जाते हैं कि वे अपनी असल जिंदगी और परिवार से दूर होने लगते हैं। इस तरह की घटनाओं का एक गंभीर मामला कुछ समय पहले मेरठ के पास हस्तिनापुर इलाके में देखने को मिला था। वहां यूट्यूब पर वीडियो और घर का कंटेंट देखकर तीन नासमझ बच्चे अचानक अपने घरों से बिना बताए कहीं चले गए थे। इस घटना के सामने आने के बाद परिजनों ने थाने में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए बच्चों की तलाश शुरू की थी। इस पूरे प्रकरण और बच्चों के बदलते व्यवहार को लेकर विशेषज्ञों से बातचीत की गई ताकि इसके मूल कारणों को समझा जा सके।
मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर की चेतावनी
इस गंभीर विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए मेडिकल कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर तरुण पाल ने बताया कि आज के समय में बच्चों का मोबाइल के प्रति बढ़ता मोह माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। स्थिति यह हो गई है कि अभिभावक अपने बच्चों की इस लत से परेशान होकर बड़ी संख्या में इलाज और काउंसलिंग के लिए अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। बच्चों को इन उपकरणों से दूर रखना अब माता-पिता के लिए बेहद कठिन कार्य साबित हो रहा है, क्योंकि बच्चे हर समय स्क्रीन से चिपके रहना पसंद करते हैं।
पढ़ाई और तकनीकी बदलाव का नकारात्मक प्रभाव
डॉक्टर तरुण पाल ने आगे बताया कि आजकल शिक्षा प्रणाली में बदलाव के कारण स्कूल और कॉलेजों का अधिकांश काम ऑनलाइन या डिजिटल माध्यमों से होने लगा है। इसी बात का फायदा उठाकर बच्चे पढ़ाई के नाम पर मोबाइल फोन अपने पास रखते हैं और फिर धीरे-धीरे गेमिंग या अन्य प्रकार के यूट्यूब कंटेंट देखने में व्यस्त हो जाते हैं। इन आभासी मंचों का बच्चों के नाजुक मस्तिष्क पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसके बाद वे वास्तविक दुनिया को छोड़कर उसी काल्पनिक दायरे में जीने के आदी हो जाते हैं.
एकल परिवार और माता-पिता की व्यस्तता
बदलती जीवनशैली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समाज में एकल परिवारों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। आज के समय में घर के माता-पिता दोनों ही नौकरीपेशा होते हैं और कामकाजी जीवन की व्यस्तता के कारण वे बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। इस खालीपन को भरने के लिए वे बच्चों को बहुत कम उम्र में ही स्मार्टफोन थमा देते हैं, जो आगे चलकर बच्चों के भविष्य के लिए बेहद घातक साबित होता है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब अभिभावकों को अपनी नैतिक जिम्मेदारी को गहराई से समझना होगा। यदि माता-पिता अपने व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय निकालकर बच्चों के साथ बिताएं और संवाद स्थापित करें, तो इस विकट परिस्थिति से आसानी से बाहर निकला जा सकता है।
स्क्रीन टाइम कम करने और काउंसलिंग की सलाह
मनोवैज्ञानिक इलाज को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की लत छुड़ाने में दवाइयों की तुलना में मनोवैज्ञानिक परामर्श और काउंसलिंग का असर सबसे ज्यादा होता है। इसलिए सबसे जरूरी कदम यह है कि बच्चों के दैनिक मोबाइल स्क्रीन टाइम में लगातार और सख्ती से कमी की जाए। यदि आपका बच्चा भी लगातार फोन या टैबलेट से चिपका रहता है और मोबाइल छीनने या मना करने पर अत्यधिक चिड़चिड़ापन या गुस्सा दिखाता है, तो उसे नजरअंदाज बिल्कुल न करें। ऐसे बच्चे अक्सर अपने खान-पान और सेहत पर भी ध्यान देना बंद कर देते हैं। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर तुरंत किसी योग्य मनोवैज्ञानिक से परामर्श लें, ताकि समय रहते उचित कदम उठाए जा सकें और किसी बड़ी अनहोनी या पछतावे से बचा जा सके।



















