मेरठ समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों में इन दिनों मौसम बार-बार करवट ले रहा है। कभी तेज बारिश तो कभी उमस भरा माहौल आम जनजीवन के साथ-साथ सेहत पर भी गहरा असर डाल रहा है। सर्दी-जुकाम और वायरल बुखार जैसी मौसमी बीमारियों के अलावा कान में संक्रमण यानी ईयर इन्फेक्शन के मामलों में भी इजाफा देखा जा रहा है। ऐसे में कान में दर्द या बेचैनी होने पर लोग अक्सर खुद से ही मेडिकल स्टोर जाकर दवा खरीद लेते हैं या कान में रुई ठूंस लेते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह लापरवाही भरी आदत राहत देने के बजाय मर्ज को और ज्यादा गंभीर बना सकती है। इसी विषय पर नाक, कान और गला यानी ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. सुमित उपाध्याय ने विस्तार से बात की है।
नमी और बदलते मौसम का कान पर असर
डॉ. सुमित उपाध्याय के अनुसार, हवा में नमी की मात्रा बढ़ने पर शरीर के अंगों में फंगल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है। इन दिनों ओपीडी में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जो कान में तेज दर्द, लगातार खुजली और अंदरूनी सूजन की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कान के संक्रमण की वजहें हर मरीज में अलग-अलग हो सकती हैं, इसलिए हर स्थिति में एक ही दवा असरदार साबित हो हो यह जरूरी नहीं है। काउंटर पर मिलने वाली दवाओं का मनमाने ढंग से इस्तेमाल करने से स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ सकती है। कान में किसी भी तरह की तकलीफ महसूस होने पर सबसे पहले किसी योग्य चिकित्सक से जांच कराना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।
कान में रुई लगाने की गलती क्यों है खतरनाक
अक्सर लोगों में यह आम चलन देखा गया है कि वे कान में कोई भी ड्रॉप डालने के बाद उसके मुहाने पर रुई का टुकड़ा लगा देते हैं, ताकि वह तरल पदार्थ बाहर न बह जाए। लेकिन डॉ. सुमित उपाध्याय चेतावनी देते हैं कि ऐसा करना कान के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। जब कान के भीतर रुई लगाई जाती है, तो वह अंदरूनी हिस्से में हवा के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह रोक देती है। इसके अलावा, रुई दवा के एक बड़े हिस्से को खुद ही सोख लेती है, जिससे दवा संक्रमण वाली सटीक जगह तक नहीं पहुंच पाती है। हवा का वेंटिलेशन रुकने से नमी अंदर ही कैद हो जाती है और बैक्टीरिया के पनपने के लिए अनुकूल माहौल तैयार हो जाता है। इसलिए बिना चिकित्सीय परामर्श के कान में रुई या किसी भी अन्य वस्तु का प्रयोग करने से हमेशा परहेज करना चाहिए।
इयरबड्स और हेडफोन का बढ़ता चलन
आजकल की जीवनशैली में केवल युवा ही नहीं बल्कि हर वर्ग के लोग इयरबड्स और हेडफोन का अत्यधिक इस्तेमाल कर रहे हैं। बिना सोचे-समझे लंबे वक्त तक तेज आवाज में गाने सुनने या कॉल्स पर रहने से सुनने की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है। लगातार कान के अंदर गैजेट्स अड़े रहने से कान का रास्ता लंबे समय तक ब्लॉक रहता है, जिससे हवा का आदान-प्रदान बंद हो जाता है। यही वजह है कि अब कम उम्र के लोगों में भी सुनने से जुड़ी परेशानियां तेजी से घर कर रही हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इन उपकरणों का उपयोग बेहद सीमित समय के लिए और कम वॉल्यूम पर ही किया जाना चाहिए, ताकि कानों को सुरक्षित रखा जा सके।
किन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
डॉ. उपाध्याय का यह भी कहना है कि कान से जुड़ी बीमारियां अब केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं रह गई हैं, बल्कि युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। मौसम के इस दौर में यदि किसी को भी कान में लगातार चुभन, दर्द, असहज खुजली, सूजन या फिर सुनने में किसी तरह की कमजोरी महसूस हो, तो इसे कभी भी हल्के में न लें। इस तरह के लक्षणों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। सबसे अहम बात यह है कि किसी भी घरेलू नुस्खे या मेडिकल स्टोर के भरोसे रहने के बजाय सीधे कान के डॉक्टर से मिलकर उचित और सुरक्षित उपचार ही लें।



















