पढ़ाई करते, खेलकूद में मशगूल या बातचीत के बीच अचानक बच्चा एकदम खामोश हो जाए और टकटकी लगाकर किसी एक बिंदु पर देखने लगे, तो अधिकांश माता-पिता इसे बच्चे का ध्यान भटकना या महज एक शरारत मान लेते हैं। जब कोई उसे पुकारता है, तो कुछ पलों तक वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देता और थोड़ी ही देर में सब कुछ भूलकर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आता है। यदि यह स्थिति कभी-कभार के बजाय दिन भर में कई बार दोहराई जा रही हो, तो इसे हल्के में लेना बच्चों के स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है। यह सामान्य आलस या अनमनापन नहीं, बल्कि मिर्गी की एक विशिष्ट श्रेणी एब्सेंस सीजर का स्पष्ट लक्षण हो सकता है।
कानपुर के अस्पताल में सामने आए 500 से अधिक मामले
कानपुर स्थित जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की न्यूरो ओपीडी में पिछले 6 महीने के दौरान इस तरह के व्यवहार वाले 500 से ज्यादा बच्चों के मामले दर्ज किए गए हैं। जब चिकित्सकों ने इन बच्चों के व्यवहार और उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स की गहन पड़ताल की, तो बड़ी तादाद में एब्सेंस सीजर की पहचान हुई। मिर्गी के पारंपरिक दौरों में आमतौर पर मरीज जमीन पर गिर जाता है या उसके हाथ-पैरों में तेज कंपन और झटके दिखाई देते हैं। हालांकि, एब्सेंस सीजर में ऐसा कोई भी शारीरिक झटका या अचानक गिरने जैसी हलचल नहीं होती, यही मुख्य वजह है कि घर-परिवार के सदस्य शुरुआती चरण में इस बीमारी को भांपने में चूक जाते हैं।
कुछ पलों के लिए बाहरी दुनिया से कट जाता है बालक
न्यूरो साइंस विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंह के अनुसार, एब्सेंस सीजर का झटका आने पर बच्चा अचानक कुछ समय के लिए बिल्कुल निष्क्रिय हो जाता है। वह उस वक्त जो भी काम कर रहा होता है, उसकी सारी शारीरिक और मानसिक गतिविधियां वहीं की वहीं थम जाती हैं। इस दौरान बच्चे की आंखें खुली रह सकती हैं, लेकिन वह अपने आसपास घट रही किसी भी घटना पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता। कोई यदि उसे नाम लेकर पुकारे या आवाज लगाए, तब भी उसकी ओर से कोई जवाब नहीं मिलता। महज कुछ सेकंड बाद जब यह दौरा समाप्त हो जाता है, तो बच्चा बिल्कुल पहले की तरह स्वाभाविक व्यवहार करने लगता है।
दिलचस्प बात यह भी है कि खुद बच्चे को भी इस बात का बिल्कुल अहसास नहीं होता कि पिछले कुछ सेकंडों में उसके साथ क्या हुआ था। इसी अनभिज्ञता के चलते परिवार वाले अक्सर यह मान बैठते हैं कि बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है या वह जानबूझकर ध्यान भटकाने के लिए बहाने बना रहा है। डॉ. मनीष सिंह स्पष्ट करते हैं कि मिर्गी के कई अलग-अलग रूप होते हैं और एब्सेंस सीजर भी उसी व्यापक बीमारी का एक हिस्सा है। चूंकि इसके संकेत आम मिर्गी के दौरों से बिल्कुल भिन्न हैं, इसलिए अगर बच्चा बार-बार ऐसा व्यवहार दिखाए तो बिना देर किए न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना आवश्यक है।
ईईजी जांच और सही चिकित्सीय हस्तक्षेप से सुधार
ओपीडी में पहुंचे 500 से अधिक मामलों में डॉक्टरों ने सबसे पहले विस्तृत केस हिस्ट्री तैयार की और उसके आधार पर ईईजी यानी इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी जांच कराई गई। ईईजी के माध्यम से बच्चे के मस्तिष्क में प्रवाहित होने वाली विद्युत तरंगों और असामान्य न्यूरोलॉजिकल गतिविधियों का सटीक ब्योरा सामने आया, जिससे कई मामलों में एब्सेंस सीजर होने की चिकित्सीय पुष्टि हो सकी। इसके बाद अस्पताल में इन बच्चों को निर्धारित दवाएं और जरूरी उपचार दिया गया। उपचार प्रक्रिया शुरू होने के उपरांत बच्चों के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया और वे बिना किसी बाधा के दोबारा अपनी पढ़ाई तथा दैनिक गतिविधियों को सामान्य रूप से करने में सक्षम हो गए।
माता-पिता के लिए सतर्कता और समय पर इलाज की अहमियत
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर बच्चा पढ़ते समय, खेलने के दौरान या भोजन करते वक्त बार-बार एकाएक चुप हो जाए और सामने देखकर भी किसी बात का उत्तर न दे, तो अभिभावकों को सावधान हो जाना चाहिए। यदि यह सिलसिला दिन में कई-कई मर्तबा दिखने लगे, तो इसे बच्चे का नटखटपन या लापरवाही समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है।
डॉ. मनीष सिंह ने जोर देकर कहा कि इस प्रकार के न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखने पर परिवारों को कतई घबराने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मिर्गी के इस स्वरूप के लिए बेहद असरदार और सुरक्षित दवाएं उपलब्ध हैं। यदि चिकित्सक के दिशानिर्देशों के अनुरूप नियमित दवाएं दी जाएं, तो बच्चों की स्थिति पूरी तरह संवर सकती है। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि अभिभावक इन बारीक लक्षणों को वक्त रहते पहचानें, बच्चे को विशेषज्ञ चिकित्सक के पास ले जाएं और समय पर डायग्नोसिस करवाएं, जिससे बच्चा एक स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सके।



















