आधुनिक जीवनशैली और असंतुलित खान-पान का सीधा दुष्प्रभाव लोगों के पाचन तंत्र पर दिखाई दे रहा है। आज के समय में पेट से जुड़ी तकलीफें बेहद सामान्य हो चुकी हैं, जिनमें कब्ज और पेट में बनने वाली गैस की शिकायत सबसे प्रमुख है। पूर्व में यह समस्या सामान्यतः बढ़ती उम्र या बुजुर्गों में ही अधिक पाई जाती थी, परंतु अब खान-पान के तौर-तरीके बदलने के कारण छोटे बच्चे और युवा वर्ग भी इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। पेट में थोड़ी सी गैस या भारीपन महसूस होते ही तुरंत गोलियां खा लेने का चलन बढ़ चुका है, जबकि आयुर्वेद के अनुसार बिना सोचे-समझे दवाओं का सहारा लेने के बजाय दैनिक दिनचर्या और आहार की व्यवस्था में संशोधन करना प्राथमिक उपचार होना चाहिए।
बच्चों में मैदे और बाजार के खाने से बढ़ रही पाचन की दिक्कतें
अंबाला छावनी नागरिक अस्पताल में पदस्थ आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. जितेंद्र वर्मा के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्र में उदर रोग और कब्ज की शिकायत लेकर बड़ी संख्या में मरीज नियमित पहुंच रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि वृद्धजनों में पाचन शक्ति धीमी होने से यह समस्या अधिक देखने को मिलती है, लेकिन वर्तमान में नन्हे बच्चों में भी कब्ज के मामलों का बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। बच्चों के भोजन में मैदे से निर्मित सामग्रियों और बाजार में बिकने वाले प्रसंस्कृत खाद्यों की अत्यधिक भागीदारी इसका मुख्य कारण बन रही है। ऐसे गरिष्ठ और पोषक तत्वों से हीन खाद्य आंतों की स्वाभाविक गति को बाधित करते हैं, जिससे पाचन तंत्र धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है।
सुबह से लेकर रात तक की दिनचर्या में सुधार जरूरी
कब्ज की समस्या को जड़ से नियंत्रित करने के लिए अपनी दैनिक दिनचर्या को व्यवस्थित करना अनिवार्य है। प्रातःकाल जागने के समय से लेकर रात्रि में विश्राम करने तक का खान-पान और रहन-सहन पाचन क्रिया को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इसके समाधान हेतु डॉ. जितेंद्र वर्मा ने प्रातः सोकर उठते ही हल्का गुनगुना पानी पीने का नियम बनाने की संस्तुति की है। इसके अतिरिक्त, दैनिक आहार में पर्याप्त फाइबर युक्त भोज्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए। भोजन की थाली में हरी पत्तेदार सब्जियों और कच्चे सलाद को नियमित स्थान देने से शरीर को जरूरी रेशा मिलता है, जिससे मल त्याग की प्रक्रिया सुगम और नियमित हो जाती है।
सलाद खाने का सही क्रम और पानी पीने के नियम
भोजन के साथ सलाद खाने के सही तरीके को लेकर अधिकांश लोग गलतियां करते हैं। डॉ. वर्मा के अनुसार, कच्चे फल और हरी कच्ची सब्जियों का सेवन मुख्य भोजन करने से पहले किया जाना सबसे अधिक लाभकारी होता है। रात्रि के भोजन में भी सुपाच्य हरी सब्जियों तथा हल्के सलाद को सम्मिलित किया जा सकता है। भोजन समाप्त करते ही तुरंत ढेर सारा पानी पीने की आदत से हर हाल में परहेज करना चाहिए, क्योंकि यह पाचक रसों को पतला कर देता है। आवश्यकता पड़ने पर भोजन के उपरांत थोड़ा गुनगुना पानी ही घूंट-घूंट करके पीना स्वास्थ्य के अनुकूल माना गया है।
बिना परामर्श गैस की गोलियां लेने से बचें
अक्सर लोग पेट में तनिक भी अफरा या गैस का अहसास होते ही दवा की दुकानों से गैस निवारक गोलियां लाकर निगल लेते हैं। बिना चिकित्सीय आवश्यकता के ऐसी गोलियों का लगातार सेवन करने की आदत नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। दवाओं पर तुरंत निर्भर होने से पहले व्यक्ति को अपने सोने-जागने के चक्र और खान-पान की गुणवत्ता को सुधारना चाहिए। यदि इन प्राथमिक बदलावों के बावजूद पेट की समस्या लंबे समय तक यथावत बनी रहे, तो स्वयं दवा लेने के स्थान पर किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लेकर ही उपचार शुरू करना चाहिए।
आयुर्वेद में उपलब्ध पारंपरिक औषधियां और चूर्ण
उदर विकारों और आंतों की सुस्ती को दूर करने के लिए आयुर्वेद में विभिन्न गुणकारी औषधियों का वर्णन मिलता है। चिकित्सक के अनुसार, पाचन की कमजोरी और कब्ज को शांत करने के लिए अग्नितुंडी वटी, हिंग्वाष्टक चूर्ण, त्रिफला तथा अभयारिष्ट जैसी शास्त्रीय औषधियां अत्यंत प्रभावी मानी जाती हैं। मध्यम उम्र के लोगों में नियमित पेट साफ रखने हेतु इसबगोल की भूसी और त्रिफला के प्रयोग का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन सभी औषधियों की मात्रा और प्रयोग विधि व्यक्ति के शारीरिक बल, उम्र और रोग की स्थिति पर निर्भर करती है, अतः इनका सेवन हमेशा योग्य आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
रसोई के सुरक्षित घरेलू नुस्खे और विशेष सावधानियां
घर की रसोई में उपलब्ध साधारण सामग्री से भी पाचन विकारों में उल्लेखनीय राहत प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए थोड़ी सी अजवाइन और काला नमक मिलाकर हल्के गुनगुने पानी के साथ ग्रहण किया जा सकता है। इसी क्रम में जीरा, सौंफ और धनिया के दानों को पानी में अच्छी तरह उबालकर, उस जल को गुनगुना पीने से भी पाचन संस्थान को शांति मिलती है और गैस का दबाव घटता है। बच्चों के विषय में विशेष सावधानी बरतते हुए बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा अथवा घरेलू नुस्खा प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। खासकर अरंडी के तेल का विरेचक के रूप में उपयोग केवल उचित चिकित्सीय मार्गदर्शन और बच्चे की शारीरिक अवस्था को परखने के बाद ही किया जाना चाहिए।
खतरनाक लक्षणों की स्थिति में कराएं चिकित्सीय जांच
कब्ज और उदर व्याधियों से स्थाई मुक्ति पाने का वास्तविक मार्ग सिर्फ गोलियों में नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी आदतों के सुधार में निहित है। मैदे से बने व्यंजनों और बाजार के चटपटे खान-पान को सीमित करना, रेशेदार संतुलित आहार अपनाना, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन और अनुशासित दिनचर्या ही स्वस्थ उदर की बुनियाद है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार गंभीर कब्ज बनी रहे, पेट में असहनीय दर्द उठे, उल्टी की समस्या हो, शौच के साथ रक्त आने की शिकायत दिखे या बीमारी लंबे अंतराल तक खिंच जाए, तो घरेलू नुस्खों पर समय गंवाने के बजाय अविलंब संपूर्ण चिकित्सीय जांच करानी चाहिए।



















