शनि गोचर 2024: अगले 95 दिनों तक तुला, मकर और वृषभ राशि के जातकों पर होगी धन वर्षायूपीआई पेमेंट पर नया एमडीआर नियम: 6 हजार के बिल को तीन टुकड़ों में चुकाने पर क्या होगा?किचन में मिर्च काटते समय हाथों में होती है तेज जलन, तो तुरंत आजमाएं ये आसान घरेलू नुस्खेभारतीय स्टेट बैंक की 180 दिनों वाली एफडी पर कितना मिलेगा ब्याज, वरिष्ठ और अति वरिष्ठ नागरिकों के लिए रिटर्न चार्ट देखेंगोविंदा की पत्नी सुनीता के समर्थन में उतरीं कश्मीरा शाह, कोमल रानी के बयानों पर उठाए गंभीर सवालफेफड़ों के कैंसर की शुरुआती जांच के लिए लो-डोज CT स्कैन कितना असरदार, आईएआरसी के वैज्ञानिकों की नई समीक्षा में खुलासालवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में कथित रेप की अफवाह से भारी हंगामा, सैन्य टैंक और लड़ाकू विमान पर चढ़े छात्रक्लाइमेट वीक में डेटा सेंटर के खिलाफ प्रदर्शन और पर्यावरण पर बढ़ता संकटफरीदाबाद में मौसम की मार से धान की फसल बर्बाद, किसानों के अरमानों पर फिरा पानीनई दिल्ली के भारत मंडपम में भूपेन हजारिका के शताब्दी समापन समारोह की तैयारियों का जायजा ले रहे हिमंत बिस्वा सरमा
फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती जांच के लिए लो-डोज CT स्कैन कितना असरदार, आईएआरसी के वैज्ञानिकों की नई समीक्षा में खुलासास्वास्थ्य
27 सित॰ 2026, 7:00 pm (13 मिनट पहले)· 0

फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती जांच के लिए लो-डोज CT स्कैन कितना असरदार, आईएआरसी के वैज्ञानिकों की नई समीक्षा में खुलासा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर शोध एजेंसी ने लो-डोज CT स्कैन की नई वैज्ञानिक समीक्षा जारी की है, जिसमें 50 से 80 वर्ष के जोखिम वाले लोगों में लंग कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने का प्रमाण मिला है।

दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों के आंकड़ों पर नजर डालें तो फेफड़ों का कैंसर सबसे बड़े कारणों में से एक के रूप में सामने आता है। इस जानलेवा बीमारी से बचाव और जीवन रक्षा के लिए इसे शुरुआती चरण में पहचानना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा की गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ी कैंसर अनुसंधान की अंतरराष्ट्रीय एजेंसी (IARC) ने फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग पर नया वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि अत्यधिक जोखिम वाले वर्ग में लो-डोज CT स्कैन की मदद से शुरुआती लक्षणों को पकड़ा जा सकता है, जिससे इस बीमारी के कारण होने वाली असमय मौतों में उल्लेखनीय गिरावट लाई जा सकती है।

इस वैज्ञानिक समीक्षा का सार 24 सितंबर 2026 को प्रसिद्ध चिकित्सा पत्रिका 'द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन' में प्रकाशित किया गया था। इस समीक्षा को तैयार करने में दुनिया के 17 देशों से आए 23 प्रमुख चिकित्सा विशेषज्ञों के एक दल ने भाग लिया। इस विशेषज्ञ समूह ने फेफड़ों के कैंसर की जांच से संबंधित पूर्व में हुए कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का गहराई से मूल्यांकन किया। भारत की ओर से नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के डॉक्टर अभिषेक शंकर भी इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ दल के सदस्य रहे।

ये भी पढ़ें

लो-डोज CT स्कैन की तकनीक और यह कैसे काम करता है?

लो-डोज कंप्यूटेड टोमोग्राफी या लो-डोज CT स्कैन एक ऐसी आधुनिक मेडिकल इमेजिंग तकनीक है जिसमें पारंपरिक CT स्कैन के मुकाबले काफी कम मात्रा में रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। फेफड़ों के मामले में यह तकनीक बेहद संवेदनशील साबित होती है। इसके जरिए फेफड़ों में मौजूद बहुत ही छोटे आकार की गांठों या शुरुआती ऊतकीय बदलावों को भी साफ तौर पर देखा जा सकता है। आईएआरसी की वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार, जब उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में नियमित अंतराल पर लो-डोज CT स्कैन किया जाता है, तो कैंसर ग्रंथि की पहचान तब हो जाती है जब वह बिल्कुल शुरुआती अवस्था में होती है। शुरुआती अवस्था में बीमारी का पता चलने से कैंसर को गंभीर या अंतिम चरण में पहुंचने से रोका जा सकता है, जिससे मरीजों की जान बचाने में काफी मदद मिलती है।

किन लोगों को करानी चाहिए यह विशेष स्क्रीनिंग?

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि फेफड़ों के कैंसर की नियमित स्क्रीनिंग की आवश्यकता सामान्य आबादी के हर व्यक्ति को नहीं होती है। इस जांच का वास्तविक स्वास्थ्य लाभ केवल उन्हीं लोगों में देखा गया है जिनमें धूम्रपान या अन्य कारणों से कैंसर विकसित होने का जोखिम अत्यंत अधिक होता है। अमेरिका की यूनाइटेड स्टेट्स प्रिवेंटिव सर्विसेज टास्क फोर्स (USPSTF) द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, 50 से 80 वर्ष की आयु वाले उन व्यक्तियों को प्रतिवर्ष लो-डोज CT स्कैन कराने की सलाह दी जाती है जिनका धूम्रपान का लंबा इतिहास रहा है।

दिशानिर्देशों के अनुसार, ऐसे व्यक्ति जिन्होंने कम से कम 20 'पैक-ईयर' धूम्रपान किया है और जो वर्तमान में भी धूम्रपान कर रहे हैं या फिर जिन्होंने पिछले 15 वर्षों के भीतर सिगरेट छोड़ दी है, वे इस नियमित जांच के योग्य माने जाते हैं। 'पैक-ईयर' शब्द का उपयोग किसी व्यक्ति द्वारा जीवनभर में पी गई सिगरेट की कुल मात्रा को मापने के लिए किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति लगातार 20 वर्षों तक रोजाना एक पैकेट (लगभग 20 सिगरेट) पीता है, तो उसकी कुल धूम्रपान मात्रा को 20 पैक-ईयर गिना जाएगा। इसी तरह अगर कोई रोज दो पैकेट 10 साल तक पीता है तो वह भी 20 पैक-ईयर कहलाएगा। डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि किसी व्यक्ति को यह जांच करानी चाहिए या नहीं, इसका निर्णय केवल धूम्रपान के इतिहास पर नहीं, बल्कि उसकी आयु और संपूर्ण स्वास्थ्य स्थिति को देखकर ही किया जाता है। इसलिए खुद से कोई जांच कराने के बजाय चिकित्सक की सलाह लेना अनिवार्य है।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों में सामने आए सकारात्मक परिणाम

लो-डोज CT स्कैन की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए कई बड़े वैज्ञानिक अध्ययन आयोजित किए गए हैं। अमेरिका में आयोजित नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल (NLST) के दौरान लो-डोज CT तकनीक की तुलना छाती के सामान्य एक्स-रे से की गई। लगभग सात वर्षों तक चले इस अध्ययन के अनुवर्ती मूल्यांकन में यह पाया गया कि जिन लोगों ने लो-डोज CT स्कैन से जांच कराई थी, उनमें सामान्य एक्स-रे कराने वालों की तुलना में फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौत का जोखिम 16 प्रतिशत तक घट गया था।

इसी प्रकार यूरोप में चलाए गए प्रसिद्ध 'नेल्सन' (NELSON) ट्रायल के नतीजे भी काफी उत्साहजनक रहे। लगभग 10 वर्षों तक चले इस अध्ययन में देखा गया कि लो-डोज CT स्कैन से स्क्रीनिंग कराने वाले पुरुष प्रतिभागियों में फेफड़ों के कैंसर से मृत्यु का खतरा लगभग 24 प्रतिशत तक कम दर्ज किया गया। दुनिया के अन्य देशों में किए गए छोटे और मध्यम अध्ययनों में भी इस जांच के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अलग-अलग अध्ययनों के परिणामों में स्थानीय भौगोलिक और जनसांख्यिकीय कारणों से थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए सभी आंकड़ों को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

स्क्रीनिंग से जुड़े संभावित नुकसान और ओवरडायग्नोसिस की चुनौती

जहां लो-डोज CT स्कैन के कई फायदे हैं, वहीं इस जांच प्रक्रिया से जुड़े कुछ संभावित नुकसान भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। कई बार स्कैन में फेफड़ों के अंदर कोई गांठ या धब्बा नजर आता है, जो वास्तव में कैंसर नहीं होता बल्कि पुरानी सूजन या किसी अन्य सामान्य इन्फेक्शन का निशान होता है। इसे चिकित्सा भाषा में 'फॉल्स पॉजिटिव' परिणाम कहा जाता है। ऐसे मामलों में मरीजों को बेवजह मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है और पुष्टि के लिए बार-बार स्कैन या बायोप्सी जैसी आक्रामक जांच प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जिनकी बाद में कोई आवश्यकता नहीं निकलती।

स्क्रीनिंग का दूसरा बड़ा जोखिम 'ओवरडायग्नोसिस' का होता है। इसका अर्थ यह है कि स्कैन के जरिए फेफड़ों में बहुत धीमी गति से बढ़ने वाले ऐसे कैंसर का पता चल जाता है जो मरीज के स्वाभाविक जीवनकाल में कभी भी कोई गंभीर शारीरिक समस्या या लक्षण उत्पन्न नहीं करता। इसके अलावा हालांकि लो-डोज CT में रेडिएशन बहुत कम होता है, लेकिन जब हर साल लगातार यह जांच कराई जाती है तो बार-बार होने वाले रेडिएशन का एक छोटा सा जोखिम शरीर पर बना रहता है।

सीने का सामान्य एक्स-रे क्यों नहीं है कारगर?

अक्सर लोग सोचते हैं कि जब चेस्ट एक्स-रे आसानी से और सस्ते में उपलब्ध है, तो फिर महंगे CT स्कैन की क्या जरूरत है। समीक्षा में इस बात को पूरी तरह खारिज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार सामान्य छाती के एक्स-रे से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों को रोकने का कोई स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है। अमेरिका के पीएलसीओ (PLCO) अध्ययन में लंबे समय तक हजारों लोगों पर शोध किया गया। इस अध्ययन के नतीजों में पाया गया कि नियमित एक्स-रे कराने वाले समूह और बिल्कुल जांच न कराने वाले समूह के बीच कैंसर मृत्यु दर में कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं था। इसलिए लो-डोज CT और सामान्य चेस्ट एक्स-रे को कभी भी एक समान विकल्प नहीं माना जा सकता।

जांच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और धूम्रपान छोड़ने का महत्व

वर्तमान समय में फेफड़ों की जांच और नोड्यूल्स की सटीक पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करने पर तेजी से शोध हो रहा है। एआई तकनीक की मदद से CT स्कैन में दिखने वाली बहुत सूक्ष्म गांठों का आकार और उनका प्रकार आंकने में रेडियोलॉजिस्ट की सहायता ली जा सकती है। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान में एआई को अकेले डॉक्टर के स्थान पर प्राथमिक जांच का जरिया बनाने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। बिना मानवीय निगरानी के एआई का इस्तेमाल करने से गलत रिपोर्ट बनने और अनावश्यक परीक्षणों का खतरा बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों ने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया है कि फेफड़ों के कैंसर से बचने का सबसे अचूक और बुनियादी तरीका धूम्रपान से दूरी बनाना ही है। लो-डोज CT स्कैन बीमारी की समय पर पहचान तो कर सकता है, लेकिन यह तंबाकू से फेफड़ों को पहुंचे नुकसान को ठीक या समाप्त नहीं कर सकता। इसीलिए सभी स्वास्थ्य एजेंसियों का सुझाव है कि कैंसर स्क्रीनिंग प्रोग्राम को तंबाकू मुक्ति अभियानों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें व्यवहारिक परामर्श और दवाओं के माध्यम से लोगों को सिगरेट छोड़ने में मदद की जाए।

सवाल-जवाब

लो-डोज CT स्कैन और सामान्य CT स्कैन में क्या अंतर है?
लो-डोज CT स्कैन में सामान्य CT स्कैन की तुलना में काफी कम रेडिएशन का उपयोग होता है, जिससे शरीर को नुकसान पहुंचाए बिना फेफड़ों की छोटी से छोटी गांठों का पता लगाया जा सकता है।
लंग कैंसर की स्क्रीनिंग किसे करानी चाहिए?
यह जांच मुख्य रूप से 50 से 80 वर्ष के उन लोगों के लिए है जिनका कम से कम 20 'पैक-ईयर' धूम्रपान का इतिहास रहा है और जो वर्तमान में धूम्रपान करते हैं या पिछले 15 साल में सिगरेट छोड़ चुके हैं।
स्मोकिंग में 'पैक-ईयर' का क्या मतलब होता है?
पैक-ईयर धूम्रपान की मात्रा मापने का तरीका है। अगर कोई व्यक्ति 20 साल तक रोजाना 1 पैकेट सिगरेट पीता है, तो उसका इतिहास 20 पैक-ईयर माना जाएगा।
क्या छाती का सामान्य एक्स-रे फेफड़ों के कैंसर को पकड़ सकता है?
नहीं, अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि सामान्य चेस्ट एक्स-रे फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों को रोकने में कारगर नहीं है। इसके लिए लो-डोज CT की आवश्यकता होती है।
क्या लो-डोज CT स्कैन के कुछ नुकसान भी हैं?
हां, इसके कुछ संभावित नुकसान हैं जैसे फॉल्स पॉजिटिव रिपोर्ट आना (कैंसर न होने पर भी गांठ दिखना) जिससे अनावश्यक बायोप्सी करानी पड़ सकती है, और हल्का रेडिएशन जोखिम होना।
क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अकेले CT स्कैन रिपोर्ट तैयार कर सकता है?
नहीं, वर्तमान में एआई का इस्तेमाल केवल डॉक्टरों की सहायता के लिए किया जा सकता है। अकेले एआई से जांच कराने पर गलत रिपोर्ट का खतरा रहता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp