ईसाई धर्मगुरु पोप लियो के फेफड़ों में एडिनोकार्सिनोमा ट्यूमर की पहचान के बाद रोम स्थित जेमेली अस्पताल में उनके दाहिने फेफड़े के निचले हिस्से यानी लोअर लोब की सफल सर्जरी की गई है। इस खबर के सामने आने के बाद फेफड़ों के कैंसर और विशेष रूप से एडिनोकार्सिनोमा के उपचार को लेकर दुनिया भर में चर्चा शुरू हो गई है। यह बीमारी नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर का एक रूप है, जो फेफड़ों के भीतर मौजूद बारीक वायु कोष्ठकों यानी एल्वियोलाई और बलगम बनाने वाली ग्रंथियों की कोशिकाओं से पनपना शुरू होती है। पोप लियो के उपचार के संदर्भ में जब इस प्रक्रिया की समीक्षा की जाती है, तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि एक सामान्य व्यक्ति के लिए इस तरह की बीमारी की पहचान, सर्जरी की भूमिका और आगे का उपचार किस तरह काम करता है। मैक्स हेल्थकेयर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. श्रीनिकेत मोहन राघवन ने इस जटिल बीमारी, फेफड़ों की आंतरिक बनावट और आधुनिक सर्जिकल तकनीकों की बारीकियों को स्पष्ट किया है।
मानव श्वसन तंत्र में लंग एडिनोकार्सिनोमा का प्रभाव
मानव शरीर के भीतर श्वसन प्रक्रिया को संचालित करने के लिए दो फेफड़े होते हैं। संरचनात्मक रूप से दाहिने फेफड़े को तीन हिस्सों यानी लोब्स में बांटा जाता है, जिन्हें सुपीरियर यानी ऊपरी, मिडिल यानी मध्य और इन्फीरियर यानी निचला लोब कहा जाता है। जब किसी मेडिकल रिपोर्ट में यह दर्ज होता है कि लोअर लोब में ट्यूमर विकसित हो गया है, तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि घातक गांठ फेफड़े के सबसे निचले हिस्से में पनप रही है। फेफड़े के इस हिस्से में बेहद सूक्ष्म आकार के लगभग 5 से 10 करोड़ एल्वियोलाई मौजूद होते हैं। ये वायु कोष्ठक शरीर के ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के लेन-देन का मुख्य केंद्र होते हैं। जब कोई व्यक्ति सांस भीतर खींचता है, तो वायु इन कोष्ठकों में भरती है, जहां से शुद्ध ऑक्सीजन रक्त प्रवाह में घुलकर हृदय तक पहुंचती है। ठीक इसी समय, शरीर के विभिन्न अंगों से रक्त के जरिए लाया गया दूषित कार्बन डाइऑक्साइड इन्हीं कोष्ठकों के माध्यम से श्वास नली और नाक के रास्ते बाहर निकल जाता है।
जब निचले लोब में एडिनोकार्सिनोमा का ट्यूमर आकार लेने लगता है, तो यह आसपास के स्वस्थ ऊतकों यानी टिश्यूज को धीरे-धीरे नष्ट करने लगता है। ट्यूमर के बढ़ते दबाव के कारण रक्त की बेहद बारीक नलियां और वायुमार्ग सिकुड़ने लगते हैं। इस संकुचन का सीधा असर फेफड़ों की गैस विनिमय क्षमता पर पड़ता है। ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है और व्यक्ति को लगातार खांसी, सीने में भारीपन, जकड़न अथवा दर्द का सामना करना पड़ता है। समय रहते यदि इस ट्यूमर का समुचित चिकित्सीय समाधान न निकाला जाए, तो यह कैंसर आसपास मौजूद लिंफ नोड्स और रक्त वाहिकाओं के माध्यम से शरीर के अन्य दूरस्थ अंगों तक फैल सकता है।
रोबोटिक लोबेक्टोमी सर्जरी की कार्यप्रणाली
फेफड़ों के ट्यूमर को निकालने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली रोबोटिक लोबेक्टोमी एक आधुनिक और मिनिमल इनवेसिव सर्जिकल तकनीक है। डॉ. श्रीनिकेत मोहन राघवन के अनुसार, पोप लियो के मामले में रोग किस चरण में था और उनकी शारीरिक स्थिति कैसी थी, इसका पूरा ब्योरा उनके प्राथमिक चिकित्सक ही दे सकते हैं, लेकिन सामान्य मरीजों के लिए भी यह एक स्थापित सर्जिकल प्रक्रिया है। इस मिनिमल इनवेसिव तकनीक में मरीज के सीने पर बड़े चीरे लगाने के बजाय बेहद बारीक छेद किए जाते हैं। इन्हीं बारीक छेदों के रास्ते उच्च क्षमता वाले कैमरे और अत्याधुनिक सर्जिकल उपकरण शरीर के भीतर उतारे जाते हैं। सर्जन इन रोबोटिक उपकरणों की मदद से स्क्रीन पर अत्यधिक स्पष्ट दृश्य देखते हुए फेफड़े के केवल उसी प्रभावित हिस्से यानी लोअर लोब को काटकर शरीर से सुरक्षित बाहर निकाल लेते हैं, जहां कैंसर का ट्यूमर मौजूद होता है।
इस सर्जिकल प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा आसपास के लिंफ नोड्स की सफाई और उनकी जांच करना होता है। केवल ट्यूमर को निकाल देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि प्रभावित लोब से जुड़े सभी संभावित लिंफ नोड्स को सावधानीपूर्वक काटा जाता है ताकि कैंसर का कोई भी अंश शरीर के अन्य हिस्सों में न पहुंचे। सर्जरी के दौरान ही निकाले गए लिंफ नोड्स के सैंपल पैथोलॉजी लैब में तत्काल जांच के लिए भेजे जाते हैं। यदि पैथोलॉजिकल परीक्षण में यह पाया जाता है कि लिंफ नोड्स पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनमें कैंसर की कोई कोशिका नहीं पहुंची है, तो सर्जरी को ही संपूर्ण और अंतिम उपचार मान लिया जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज को अतिरिक्त दवाओं की आवश्यकता नहीं पड़ती और उसे केवल नियमित फॉलो-अप जांचों के लिए आना होता है। इसके विपरीत, यदि लिंफ नोड्स के नमूनों में कैंसर के अंश मिलते हैं, तो मरीज को कीमोथेरेपी अथवा टार्गेटेड थेरेपी जैसे अतिरिक्त उपचार दिए जाते हैं।
स्टेज 1 और 2 में सर्जिकल विकल्प और लिंफ नोड्स की भूमिका
डॉ. श्रीनिकेत मोहन राघवन स्पष्ट करते हैं कि रोबोटिक लोबेक्टोमी की सिफारिश आमतौर पर तभी की जाती है जब बीमारी शुरुआती चरणों यानी स्टेज 1 अथवा स्टेज 2 में हो। इन शुरुआती चरणों में ट्यूमर का आकार प्रायः 4 सेंटीमीटर से छोटा होता है। जब भी फेफड़े का कैंसर अपने मूल स्थान से आगे बढ़ता है, तो वह सबसे पहले नजदीकी लिंफ नोड्स को अपनी गिरफ्त में लेता है। यही कारण है कि ऑन्कोलॉजिस्ट लिंफ नोड्स में बीमारी फैलने के जोखिम को सबसे गंभीर मानते हैं। ऑपरेशन के दौरान सबसे संभावित लिंफ नोड्स की जांच से यह तय होता है कि बीमारी स्थानीय स्तर तक ही सीमित थी या शरीर में आगे फैलने का रास्ता बना रही थी।
यदि पैथोलॉजिकल विश्लेषण में लिंफ नोड्स साफ निकलते हैं, तो सर्जरी के माध्यम से कैंसर को पूरी तरह समाप्त मान लिया जाता है। वहीं अगर लिंफ नोड्स में ट्यूमर कोशिकाएं मौजूद मिलती हैं, तो सर्जरी के बाद ऑन्कोलॉजिस्ट बीमारी को दोबारा पनपने से रोकने के लिए आगे का मेडिकल प्रोटोकॉल शुरू करते हैं। इसलिए किसी मरीज की सर्जरी के बाद कैंसर से पूरी तरह मुक्ति इस एकल तथ्य पर टिकी होती है कि उसके लिंफ नोड्स में ट्यूमर का विस्तार हुआ है या नहीं।
एडिनोकार्सिनोमा के खतरे, लक्षण और शुरुआती पहचान की चुनौतियां
कैंसर की प्रकृति को समझाते हुए डॉ. श्रीनिकेत कहते हैं कि ऑन्कोलॉजी में ऐसा कोई निरपेक्ष नियम नहीं है कि कौन सा व्यक्ति शत-प्रतिशत सुरक्षित रहेगा या किसे अनिवार्य रूप से कैंसर होगा। फेफड़ों के अन्य रूपों की तुलना में एडिनोकार्सिनोमा की एक अनूठी बात यह है कि यह आमतौर पर उन लोगों में अधिक देखा जाता है जो धूम्रपान नहीं करते। हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि धूम्रपान करने वाले लोग इस खतरे से पूरी तरह मुक्त हैं। तंबाकू और सिगरेट का सेवन फेफड़ों के अन्य सभी प्रकार के कैंसरों के लिए सबसे बड़ा और प्रमुख कारण बना हुआ है।
इस बीमारी की सबसे गंभीर चुनौती इसके लक्षणहीन होने में छिपी है। अधिकांश मामलों में एडिनोकार्सिनोमा बिना किसी स्पष्ट संकेत के शरीर के भीतर बढ़ता रहता है। जब कुछ मरीजों में इसके लक्षण प्रकट भी होते हैं, तो वे बेहद सामान्य लगते हैं, जैसे कि हल्की सूखी खांसी, सांस लेने में हल्की तकलीफ या सामान्य गति से चलने-फिरने में भारीपन महसूस होना। इन हल्के लक्षणों के कारण शुरुआती चरण में इसका पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है। डॉ. श्रीनिकेत बताते हैं कि शुरुआती स्टेज में कैंसर का पता अक्सर तभी चलता है जब मरीज किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या अथवा जांच के सिलसिले में फेफड़ों का परीक्षण करवा रहे होते हैं।



















