महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कई गंभीर मामलों में जागरूकता का अभाव स्थिति को जानलेवा बना देता है। गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स में पनपने वाली घातक बीमारी को सर्वाइकल कैंसर कहा जाता है, जिसे लेकर आज भी बड़ी संख्या में महिलाओं में बुनियादी जानकारी की कमी देखी जाती है। सर्विक्स दरअसल गर्भाशय का सबसे निचला सिरा होता है, जो योनि मार्ग से जुड़ता है। जागरूकता की इसी कमी के चलते खतरे की पहचान बहुत देर से होती है, जबकि समय पर सही जानकारी और सतर्कता जीवन की रक्षा कर सकती है।
बीमारी का मूल कारण और वायरस का असर
आरजी हॉस्पिटल्स में महिला स्वास्थ्य और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पलक दीवान बताती हैं कि इस घातक बीमारी के अधिकांश मामलों के पीछे ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी का संक्रमण मुख्य कारण होता है। जब यह वायरस शरीर के भीतर लंबे समय तक अपनी जगह बनाए रखता है, तब कोशिकाओं में असामान्य बदलाव शुरू होते हैं। यह वायरस मुख्य रूप से यौन संपर्क के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे में पहुंच सकता है। हालांकि, एचपीवी संक्रमण की चपेट में आने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं होता कि कैंसर होना तय है। अधिकतर मामलों में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इस वायरस को खुद ही समाप्त कर देती है, मगर कुछ विशेष हाई-रिस्क प्रकार शरीर में टिके रहकर धीरे-धीरे कैंसर का रूप अख्तियार कर लेते हैं।
किन स्थितियों में बढ़ जाता है खतरे का स्तर
डॉ. पलक दीवान के अनुसार, बीमारी से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जीवनशैली और स्वास्थ्य इतिहास पर नजर रखना जरूरी है। यदि किसी महिला के शरीर में हाई-रिस्क एचपीवी लंबे समय तक बना रहे, तो जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त एचआईवी संक्रमण या किसी अन्य वजह से कमजोर हुई रोग प्रतिरोधक क्षमता, तंबाकू अथवा धूम्रपान का सेवन और नियमित समय पर चिकित्सकीय जांच न करवाना भी महिलाओं को खतरे के दायरे में ले आता है। एक से अधिक यौन साथी होने से वायरस संक्रमण फैलने की आशंका में इजाफा होता है, परंतु मात्र इसी तथ्य के आधार पर कैंसर होने का सीधा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। दैनिक जीवन में व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इस बीमारी के होने का एकमात्र कारण स्वच्छता की कमी को मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
स्क्रीनिंग के विकल्प और लक्षणों की समय पर पहचान
इस बीमारी को शुरुआती दौर में ही पकड़ने के लिए नियमित जांच को सबसे कारगर माध्यम माना गया है। इसके लिए मुख्य रूप से दो परीक्षण उपलब्ध हैं, जिनमें पहला पैप स्मीयर और दूसरा एचपीवी डीएनए टेस्ट शामिल है। पैप स्मीयर परीक्षण के माध्यम से गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में आने वाले सूक्ष्म बदलावों को परखा जाता है, जिससे कैंसर पूर्व स्थिति का पता चल जाता है। वहीं दूसरी ओर एचपीवी डीएनए जांच से उन वायरस किस्मों की सीधी पहचान की जा सकती है जो कैंसर पैदा करने की क्षमता रखते हैं।
यह जांच कब करवानी चाहिए और दो परीक्षणों के बीच कितना अंतर होना चाहिए, इसका निर्धारण महिला की आयु, पिछली मेडिकल हिस्ट्री और पूर्व में हुई जांचों की रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सक करते हैं। इसलिए बिना डॉक्टरी परामर्श के कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। इसके अलावा कुछ विशेष शारीरिक संकेतों पर तत्काल ध्यान देना अनिवार्य है। इनमें माहवारी के चक्र के बीच में अचानक खून आना, यौन संबंध के पश्चात रक्तस्त्राव महसूस होना, असामान्य रूप से अधिक ब्लीडिंग या लगातार बदबूदार डिस्चार्ज की समस्या शामिल हैं। यदि ऐसे लक्षण सामने आएं, तो जांच की तय आयु का इंतजार किए बगैर फौरन स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलना चाहिए।
टीकाकरण की भूमिका और उपलब्ध सुरक्षा
डॉ. पलक के अनुसार, रोकथाम की दिशा में एचपीवी वैक्सीन बेहद असरदार हथियार साबित होती है। यह टीका उन चुनिंदा एचपीवी प्रकारों के खिलाफ शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है जो कैंसर के सबसे बड़े कारण बनते हैं। यौन जीवन की शुरुआत से पहले अगर यह टीका लगा लिया जाए, तो इसका सुरक्षात्मक असर सबसे अधिक देखने को मिलता है। हालांकि, टीकाकरण करवा लेने के बाद भी नियमित अंतराल पर जांच करवाते रहना जरूरी रहता है, क्योंकि कोई भी वैक्सीन वायरस के सभी रूपों से संपूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं देती।
भारत में इस टीके को लेकर धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है। वर्तमान में स्वास्थ्य तंत्र में गार्डासिल-4 और गार्डासिल-9 के साथ-साथ देश में ही निर्मित सर्वावैक टीका भी उपलब्ध है। किस उम्र में कौन सा टीका लगवाना चाहिए, उसकी कितनी खुराक आवश्यक होगी और वह कहां उपलब्ध होगा, इसकी सटीक जानकारी के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह लेना ही सबसे उचित कदम है।
सतर्कता और त्वरित कदम ही सबसे बड़ा बचाव
गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से मुकाबले का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि महिलाएं अपने शरीर में होने वाले किसी भी बदलाव को नजरअंदाज न करें। उचित आयु में वैक्सीन की खुराक लेना, नियमित समय पर क्लीनिकल जांच करवाना और किसी भी असामान्य संकेत पर तुरंत चिकित्सीय सलाह लेना बीमारी के जोखिम को न्यूनतम कर सकता है। समय पर उठाए गए सचेत कदम महिलाओं को इस गंभीर संकट से सुरक्षित रखने में पूरी तरह सक्षम हैं।



















