अमेरिका में 3 नवंबर को संसद की सीटों के लिए नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सत्ता संभाले हुए अभी केवल 22 महीने का समय बीता है, ऐसे में इस चुनावी प्रक्रिया को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। यह मुकाबला मध्यावधि चुनाव कहलाता है, जो चार साल के राष्ट्रपति कार्यकाल के ठीक आधे सफर पर अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की दशा और दिशा तय करने के लिए आयोजित किया जाता है।
मध्यावधि चुनाव और राष्ट्रपति की ताकत का समीकरण
इस पूरी लोकतांत्रिक कवायद में राष्ट्रपति पद पर कोई सीधा संकट नहीं होता है। डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल जारी रहेगा, परंतु संसद के दोनों सदनों में उनके दल का बहुमत बना रहता है या विपक्षी दल हावी होता है, इसी पर उनकी विधायी शक्तियां निर्भर करेंगी। यदि उनकी पार्टी संसद में नियंत्रण गंवा देती है, तब भी वे अपने कार्यकारी अधिकारों के जरिए बड़े नीतिगत फैसले लेने में सक्षम रहेंगे। वोटिंग समाप्त होते ही मतगणना की प्रक्रिया तत्काल आरंभ कर दी जाएगी और अंतिम परिणाम 4 नवंबर को सामने आ सकते हैं।
भारतीय चुनाव व्यवस्था से कितना अलग है अमेरिकी मॉडल
भारत में संसदीय व्यवस्था लागू है, जहां संसद के निचले सदन में बहुमत हासिल करने वाला दल ही प्रधानमंत्री चुनता है और सरकार चलाता है। इसके विपरीत, अमेरिका की अध्यक्षात्मक प्रणाली में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता के इलेक्टोरल कॉलेज से होता है, जो संसद के दोनों सदनों से अलग काम करता है। यही कारण है कि मध्यावधि में जनता के फैसले से संसद का संतुलन बदल सकता है, जबकि राष्ट्रपति अपने तय कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों तक व्हाइट हाउस में बने रहते हैं।



















