अक्सर रास्तों के किनारों, खुले मैदानों और खेतों की मेड़ों पर उगने वाली वनस्पतियों को लोग बेकार खरपतवार मानकर उखाड़ फेंकते हैं। इन्हीं में एक ऐसा पौधा भी शामिल है जिसे ग्रामीण इलाकों में लहचिचरा और आयुर्वेद में अपामार्ग के नाम से जाना जाता है। लोक परंपराओं और प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति में इस साधारण से दिखने वाले पौधे को विभिन्न शारीरिक समस्याओं के समाधान के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। हालांकि इसके पारंपरिक महत्व के बावजूद इसके उपयोग को लेकर पूरी सावधानी बरतना भी उतना ही आवश्यक माना जाता है।
पौधे के विभिन्न अंगों का पारंपरिक उपयोग और पहचान
वैद्य डॉ. अभिषेक कुमार मिश्र के अनुसार, अपामार्ग के विभिन्न हिस्से जैसे जड़, पत्तियां और तना पारंपरिक नुस्खों में अलग-अलग ढंग से उपयोग में लाए जाते रहे हैं। इस पौधे की एक विशेष शारीरिक संरचना यह होती है कि इसमें फूल और फल एक साथ दिखाई देते हैं। पुराने जमाने में कई क्षेत्रों में इसके बीजों का प्रयोग आहार के रूप में भी किया जाता था। लोक मान्यताओं में यह दावा किया जाता रहा है कि इसके बीज पाचन क्रिया को धीमा कर लंबे समय तक भूख का अहसास नहीं होने देते, यद्यपि इस तरह के दावों की आधुनिक वैज्ञानिक पुष्टि होना अभी आवश्यक है। किसी भी तरह के प्रयोग से पूर्व पौधे की प्रामाणिक पहचान सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है।
मुख स्वास्थ्य और दातुन की परंपरा
पारंपरिक दिनचर्या में लहचिचरा की टहनियों को दातुन की तरह इस्तेमाल करने का पुराना चलन रहा है। वैद्य डॉ. अभिषेक कुमार मिश्र बताते हैं कि लोक विश्वास के आधार पर लोग दांतों को साफ रखने तथा मसूड़ों की हल्की तकलीफों से बचाव के लिए इसकी दातुन करते आए हैं। इसके बावजूद यदि किसी व्यक्ति को मसूड़ों से खून आने, तेज दांत दर्द अथवा पायरिया जैसी गंभीर शिकायत हो, तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय योग्य दंत चिकित्सक से विधिवत परीक्षण कराना अनिवार्य है।
पथरी, पाचन और वजन नियंत्रण से जुड़ी मान्यताएं
पारंपरिक चिकित्सा की विविध पद्धतियों में लहचिचरा का उल्लेख पेट संबंधी विकारों और गुर्दे की पथरी जैसी तकलीफों में भी मिलता है। कुछ घरेलू उपचारों में इसे वजन घटाने के सहायक साधन के तौर पर भी आजमाया जाता रहा है। इसके साथ ही प्राचीन समय में जब आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं सुलभ नहीं थीं, तब बिच्छू के डंक मारने पर इसकी जड़ का लेप लगाने का प्रचलन भी देखा जाता था। वैद्य डॉ. अभिषेक कुमार मिश्र स्पष्ट करते हैं कि बिच्छू के दंश जैसी आपात स्थिति में घरेलू उपचारों के सहारे नहीं बैठना चाहिए, बल्कि बिना समय गंवाए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर तत्काल चिकित्सकीय उपचार प्राप्त करना चाहिए। साथ ही, वजन नियंत्रण और पथरी संबंधी इन पारंपरिक प्रयोगों के पक्ष में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
किन लोगों को रखनी चाहिए विशेष सावधानी
यद्यपि लहचिचरा एक जाना-पहचाना औषधीय पौधा है, परंतु इसका अनियंत्रित अथवा बिना सोचे-समझे किया गया सेवन शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकता है। गर्भवती महिलाओं को इस पौधे के किसी भी अंग के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए। इसके अतिरिक्त छोटे बच्चों, वृद्धजनों और पहले से किसी पुरानी बीमारी का इलाज करा रहे व्यक्तियों को इसका प्रयोग करने से पूर्व किसी योग्य आयुर्वेदाचार्य या चिकित्सक की राय अवश्य लेनी चाहिए। इस पौधे से जुड़े कई लाभ केवल पारंपरिक मान्यताओं पर टिके हैं, इसलिए इसे किसी प्रमाणित दवा का विकल्प मानकर बिना चिकित्सीय परामर्श ग्रहण नहीं करना चाहिए।



















