उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला पौष्टिक फल पांगर इन दिनों राजधानी देहरादून के फल बाजारों में भारी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। फेगेसी वनस्पति परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस दुर्लभ फल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चेस्टनट कहा जाता है, जबकि स्थानीय पहाड़ी क्षेत्रों में लोग इसे अज्ञैर के नाम से भी जानते हैं। देहरादून के प्रमुख बाजारों में इस मौसम में पांगर की आवक काफी बढ़ गई है, जिसे खरीदने के लिए स्थानीय खरीदारों और बाहर से आने वाले पर्यटकों के बीच काफी उत्साह देखने को मिल रहा है।
कांटों भरे आवरण के पीछे छिपा है अनोखा स्वाद
पांगर का इतिहास और इसका पारंपरिक महत्व उत्तराखंड की पहाड़ियों में सदियों पुराना रहा है। यह फल पेड़ पर एक सख्त और तीखे हरे कांटों से भरे बाहरी आवरण के अंदर सुरक्षित विकसित होता है। कांटों की इस घनी परत के कारण पेड़ की शाखाओं से पांगर को तोड़ना और उसके बाद बिना हाथ जख्मी किए फल को बाहर निकालना बेहद सावधानी और कड़े परिश्रम का काम माना जाता है। इस जटिल और मेहनत भरी प्रक्रिया के बावजूद लोग इसके अनूठे स्वाद और औषधीय गुणों के चलते इसे बहुत चाव से खरीदते हैं।
इम्यूनिटी बढ़ाने के साथ दिल की सेहत के लिए रामबाण
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार औषधीय तत्वों से भरपूर पांगर मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में अचूक औषधि की तरह कार्य करता है। यह फल हृदय की कार्यप्रणाली को सुचारू बनाए रखने और दिल से जुड़ी विभिन्न बीमारियों के जोखिम को कम करने में भी बेहद असरदार माना गया है। नियमित रूप से इसका सेवन करने वाले व्यक्तियों की इम्यूनिटी में काफी सकारात्मक सुधार दर्ज किया जाता है।
जरूरी पोषक तत्वों और खनिजों का समृद्ध स्रोत
पहाड़ी चेस्टनट में शरीर के लिए आवश्यक कई महत्वपूर्ण पोषक तत्वों का खजाना मौजूद रहता है। इसमें मुख्य रूप से कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम, मैग्नीशियम और प्रचुर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। इन समृद्ध पोषक तत्वों के कारण ही यह फल आधुनिक समय की दो सबसे प्रमुख जीवनशैली संबंधी समस्याओं, यानी डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे मरीजों के लिए अत्यंत लाभदायक साबित होता है। यह खून में शुगर के स्तर और ब्लड प्रेशर दोनों को सामान्य और नियंत्रित रखने में प्रभावी मदद प्रदान करता है।
उबालने और भूनने की पारंपरिक खाने की विधि
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पांगर को कभी भी सीधे कच्चे रूप में नहीं खाया जाता है, बल्कि इसे पकाकर खाने की पुरानी परंपरा है। इसे तैयार करने का सबसे पसंदीदा और प्रचलित तरीका पानी में उबालना या फिर धीमी आंच पर भूनना है। जब इस फल को उबलते पानी में डाला जाता है या आग पर भुना जाता है, तो इसका कांटों वाला सख्त बाहरी छिलका बेहद आसानी से अलग हो जाता है। छिलका हटने के बाद अंदर मौजूद मुलायम, स्वादिष्ट और पौष्टिक हिस्सा खाने के लिए पूरी तरह तैयार होता है, जिसे लोग बड़े चाव से खाते हैं।
पेड़ के फूलने से लेकर फल पकने का समय चक्र
इस अनूठे पहाड़ी वृक्ष का प्राकृतिक जीवन चक्र भी बेहद दिलचस्प है। हर साल मई और जून के महीनों में पांगर के पेड़ों पर खूबसूरत फूल खिलने शुरू होते हैं। इसके बाद पूरी गर्मी के मौसम में फल धीरे-धीरे आकार लेता है और विकास की प्रक्रिया से गुजरता है। अगस्त से सितंबर के महीनों तक यह फल पूरी तरह से पककर तैयार हो जाता है। जैसे ही मानसून का मौसम समाप्त होने लगता है, यह बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाता है।
स्थानीय किसानों की आय और पर्यटन को मिला बढ़ावा
वर्तमान समय में देहरादून के फल बाजारों में पांगर 600 रुपये से लेकर 800 रुपये प्रति किलो तक की कीमत पर बेचा जा रहा है। बाजार में पांगर की भारी मांग और इसके उच्च विक्रय मूल्यों ने उत्तराखंड के पर्वतीय किसानों के लिए स्वरोजगार का एक बेहतरीन और आकर्षक आर्थिक जरिया तैयार कर दिया है। देहरादून और कुमाऊं मंडल की यात्रा पर आने वाले सैलानी इस दुर्लभ पहाड़ी फल का स्वाद चखना बिल्कुल नहीं भूलते। स्थानीय निवासियों और पर्यटकों दोनों के बीच पांगर की लगातार बढ़ती लोकप्रियता ने इसके कारोबार को एक नई ऊंचाई दी है, जिससे यह राज्य की अर्थव्यवस्था और जनस्वास्थ्य दोनों के लिए चमकता सितारा बन गया है।



















