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हिमाचल के जनजातीय इलाकों में नौतोड़ भूमि आवंटन पर आंदोलन शुरू, शिमला कूच की तैयारीहिमाचल प्रदेश
21 सित॰ 2026, 7:44 am (2 घंटे पहले)· 0

हिमाचल के जनजातीय इलाकों में नौतोड़ भूमि आवंटन पर आंदोलन शुरू, शिमला कूच की तैयारी

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और लाहौल-स्पीति में नौतोड़ भूमि अधिकारों को लेकर आंदोलन शुरू हो गया है, जिसे कैबिनेट प्रस्ताव पर राजभवन की मंजूरी न मिलने के बाद अब शिमला तक बढ़ाने की चेतावनी दी गई है।

हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में नौतोड़ भूमि अधिकार का सवाल एक बार फिर बड़े जनांदोलन की शक्ल ले चुका है। किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिलों में जमीन के कानूनी हक को लेकर स्थानीय लोगों ने सड़कों पर उतरने की शुरुआत कर दी है। कांग्रेस ने इस अभियान को नौतोड़ अधिकार यात्रा का नाम दिया है, जिसके जरिए ग्रामीण और जरूरतमंद परिवारों को खेती और बागवानी के लिए सरकारी भूमि देने के पुराने नियम बहाल करने की मांग उठाई जा रही है। घाटी के सुदूर हिस्सों से शुरू हुई यह सुगबुगाहट अब राजधानी तक पहुंचने की कगार पर है।

राज्य के राजस्व, बागवानी, जनजातीय विकास एवं जन शिकायत निवारण मंत्री जगत सिंह नेगी ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि जनजातीय इलाकों के बाशिंदों के सब्र की सीमा अब समाप्त हो चुकी है। उनके अनुसार, पहले चरण के तहत किन्नौर और लाहौल-स्पीति में व्यापक अभियान शुरू किया गया है, जिसका विस्तार जल्द ही सूबे के अन्य जनजातीय क्षेत्रों तक किया जाएगा। स्पीति घाटी में इस मुहिम की कमान स्थानीय विधायक अनुराधा राणा संभाल रही हैं, जहां बड़ी तादाद में लोग अपने अधिकारों के समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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राजभवन में तीन साल से अटका है कैबिनेट का प्रस्ताव

जगत सिंह नेगी ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि जनजातीय समाज की यह मांग वर्षों से अधर में लटकी हुई है। उन्होंने कहा कि लगभग 3 साल पहले प्रदेश मंत्रिमंडल ने नौतोड़ अधिकारों की बहाली से जुड़ा एक विस्तृत प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया था। इस प्रस्ताव को नियमानुसार राज्यपाल की औपचारिक मंजूरी के लिए भेजा गया था, लेकिन लंबा समय बीत जाने के बाद भी फाइल पर अंतिम मुहर नहीं लग पाई है।

मंत्री के मुताबिक, राज्य सरकार अपनी तरफ से लगातार राजभवन से संपर्क साधे हुए है। प्रस्ताव भेजे जाने के बाद से अब तक राज्यपाल के साथ करीब 10 बार औपचारिक बैठकें हो चुकी हैं। इन मुलाकातों में से 8 बैठकें पूर्व राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल के साथ हुईं, जबकि 2 बैठकें वर्तमान राज्यपाल कविंद्र गुप्ता के साथ की गईं। जगत सिंह नेगी का कहना है कि इन तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों को कोरे आश्वासनों के अलावा कोई ठोस नतीजा देखने को नहीं मिला है।

भाजपा की रुकावटों पर तीखा हमला और आखिरी मुलाकात की चेतावनी

नौतोड़ प्रस्ताव पर हो रही देरी के राजनीतिक पहलुओं को उजागर करते हुए जगत सिंह नेगी ने विपक्षी दल भाजपा की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी राज्य सरकार की ओर से राज्यपाल से मुलाकात की गई, उसके तुरंत बाद भाजपा के नेताओं ने भी राजभवन जाकर इस प्रस्ताव को रोके रखने के लिए दबाव बनाया होगा। नेगी ने आशंका जताई कि विपक्षी नेताओं की संकीर्ण राजनीतिक सोच के कारण ही जनजातीय हितों से जुड़ी इस महत्वपूर्ण फाइल को मंजूरी मिलने में रुकावटें आ रही हैं, और संभव है कि इसके चलते राज्यपाल भी किसी दबाव में हों।

मंत्री ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल अब राज्यपाल से इस सिलसिले में आखिरी बार मुलाकात करेगा। यदि इस अंतिम वार्ता के बाद भी कोई सकारात्मक निर्णय सामने नहीं आया, तो पूरे आंदोलन को निर्णायक और आक्रामक दिशा दी जाएगी। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि पहाड़ों से शुरू हुआ यह संघर्ष अब शिमला के राजभवन तक पहुंचेगा और जनजातीय समाज अपने अधिकारों के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटेगा।

सीमित निजी जमीन और नौतोड़ व्यवस्था की आवश्यकता

पहाड़ी और जनजातीय इलाकों में नौतोड़ व्यवस्था की जरूरत को समझना बेहद जरूरी है। नौतोड़ योजना के तहत पात्र और भूमिहीन अथवा बेहद कम जमीन वाले परिवारों को निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत बंजर अथवा सरकारी जमीन आवंटित की जाती है, ताकि वे अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए खेती और बागवानी कर सकें। किन्नौर तथा लाहौल-स्पीति जैसे विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले जिलों में निजी मिल्कियत की कृषि योग्य भूमि बेहद कम है।

स्थानीय निवासियों का लंबे अरसे से यह तर्क रहा है कि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों की वजह से नई पीढ़ी के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। खेती-बाड़ी का रकबा न बढ़ने से युवाओं के लिए अपने ही गृहक्षेत्र में रोजगार के रास्ते बंद हो रहे हैं। हालांकि, नौतोड़ की प्रक्रिया में सबसे बड़ी वैधानिक बाधा वन भूमि का पहलू है। जब भी कोई सरकारी जमीन वन संरक्षण कानूनों के दायरे में आती है, तो केंद्र सरकार के कड़े दिशा-निर्देशों और कानूनी पेचीदगियों के कारण भूमि आवंटन की प्रक्रिया उलझ जाती है।

अतीत की नीतियां और पांचवीं अनुसूची की संवैधानिक ताकत

ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए जगत सिंह नेगी ने 2014 से 2017 के दौर का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने केंद्र के वन संरक्षण नियमों से जुड़े प्रावधानों में विशेष राहत हासिल कर जनजातीय क्षेत्रों के कई जरूरतमंद परिवारों को नौतोड़ के तहत भूमि के पट्टे वितरित किए थे। हालांकि, 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद बनी सरकार के कार्यकाल में यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ गई। वर्ष 2022 में कांग्रेस के दोबारा सत्ता में आने के बाद मंत्रिमंडल ने पुराने अधिकारों को बहाल करने के लिए नए सिरे से संकल्प पारित कर आगे की कार्रवाई शुरू की थी।

इस पूरे मामले में संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए जगत सिंह नेगी ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत शेड्यूल 5 के क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों के हितों की हिफाजत के लिए राज्यपाल के पास असाधारण और विशेष शक्तियां निहित हैं। राज्यपाल को यह कानूनी अधिकार प्राप्त है कि वे संसद अथवा राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी सामान्य कानून को जनजातीय हितों के अनुरूप संशोधित अथवा अनुकूलित कर लागू कर सकते हैं। मंत्री का तर्क है कि इसी संवैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए राजभवन को नौतोड़ से संबंधित प्रस्ताव को तत्काल अपनी स्वीकृति देनी चाहिए, जिससे यह विषय अब केवल सामान्य राजस्व का न रहकर एक व्यापक संवैधानिक और प्रशासनिक टकराव का रूप ले चुका है।

सवाल-जवाब

नौतोड़ योजना क्या है और इसका क्या उद्देश्य है?
नौतोड़ योजना के तहत हिमाचल के जनजातीय और ग्रामीण इलाकों में पात्र व जरूरतमंद लोगों को खेती और बागवानी के लिए सरकारी भूमि आवंटित की जाती है।
वर्तमान में आंदोलन किन जिलों में शुरू हुआ है?
यह आंदोलन मुख्य रूप से किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिलों में शुरू हुआ है, जहां स्पीति में विधायक अनुराधा राणा इसका नेतृत्व कर रही हैं।
नौतोड़ का प्रस्ताव कब से और कहां लंबित है?
कैबिनेट द्वारा पारित यह प्रस्ताव पिछले 3 वर्षों से राज्यपाल की मंजूरी के लिए राजभवन में लंबित है।
इस प्रस्ताव को लेकर राज्यपाल से कितनी बार मुलाकात हो चुकी है?
प्रस्ताव भेजे जाने के बाद से करीब 10 बार मुलाकात हो चुकी है, जिसमें 8 बैठकें पूर्व राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल से और 2 वर्तमान राज्यपाल कविंद्र गुप्ता से हुईं।
मंत्री जगत सिंह नेगी ने संविधान की किस अनुसूची का हवाला दिया है?
उन्होंने संविधान की पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल के पास जनजातीय हितों के लिए कानूनों में बदलाव करने की विशेष शक्तियां हैं।
यदि राजभवन से मंजूरी नहीं मिली तो आंदोलन की अगली योजना क्या है?
मंत्री ने चेतावनी दी है कि एक अंतिम मुलाकात के बाद आंदोलन को शिमला तक ले जाया जाएगा और राजभवन के स्तर पर आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Meera Joshi@meera-joshi·45 मिनट पहले

जनजातीय क्षेत्रों में भूमि अधिकारों का यह गतिरोध केवल प्रशासनिक या राजनीतिक खींचतान नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों पर रहने वाले समुदायों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान पर सीधा असर डाल रहा है। जब मूल निवासियों को अपनी आजीविका और जमीन के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है, तो इससे समाज में अकेलापन, गहरी अनिश्चितता और व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना पनपती है। यदि यह तनावपूर्ण स्थिति जल्द नहीं सुलझी, तो यह मानसिक और भावनात्मक वेलनेस के मोर्चे पर इन क्षेत्रों के पारिवारिक ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

यह गतिरोध हिमाचल प्रदेश में राजभवन और चुनी हुई सरकार के बीच बढ़ते टकराव का एक और गंभीर संकेत है। नौतोड़ भूमि के इस तीन साल पुराने प्रस्ताव पर फंसी फाइल केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों की आजीविका और राजनीतिक ध्रुवीकरण का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। यदि मंत्री की चेतावनी के बाद यह आंदोलन शिमला की ओर बढ़ता है, तो सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर आने वाले चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

यह गतिरोध केवल राजनीतिक खींचतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पर्वतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। बागवानी और कृषि आधारित आजीविका से जुड़े जनजातीय इलाकों में अनिश्चितता बढ़ने से स्थानीय निवेश और विकास परियोजनाओं पर नकारात्मक प्रभाव तय है। यदि यह भू-अधिकार विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक असुरक्षा का माहौल गहराएगा, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

राजभवन और राज्य सरकार के बीच पिछले तीन वर्षों से अटका यह विवाद अब प्रशासनिक गतिरोध से आगे बढ़कर सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक संवेदनशील चुनौती बनता जा रहा है। जनजातीय क्षेत्रों में आंदोलन के उग्र होने और शिमला कूच की चेतावनी से राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र पर भारी दबाव बढ़ेगा। यदि इस राजनीतिक और प्रशासनिक रस्साकशी का समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह गतिरोध दूरदराज के पर्वतीय इलाकों में बड़े पैमाने पर सामाजिक अशांति और हिंसक टकराव का रूप ले सकता है, जिससे प्रशासन के लिए स्थिति संभालना मुश्किल होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

नौतोड़ भूमि के इस लंबे विवाद और शिमला कूच की चेतावनी से पहाड़ी क्षेत्रों में प्रशासनिक और खुफिया तंत्र पर सीधा असर पड़ेगा। यदि यह टकराव बढ़ता है, तो दूरदराज के जनजातीय जिलों में जनजीवन ठप होने के साथ-साथ गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे सरकार और राजभवन दोनों के लिए नियंत्रण पाना चुनौतीपूर्ण होगा।

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