हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सुंदरनगर उपमंडल के अंतर्गत आने वाले पलोहटा गांव में राज्य की पहली बागवानी मोनो रेल की शुरुआत कर दी गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वीरवार 22 अक्तूबर को बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने इसका औपचारिक शुभारंभ किया। यह पूरा ढांचा एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में तैयार किया गया है जिसकी कुल लंबाई 300 मीटर रखी गई है। इस आधुनिक परिवहन व्यवस्था के शुरू होने से पहाड़ी ढलानों पर खेती करने वाले स्थानीय किसानों और बागवानों को भारी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि अब दुर्गम इलाकों में पैदा होने वाले फल और कृषि उपकरण आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाए जा सकेंगे।
विदेशी तर्ज पर बागवानों को राहत
पलोहटा कलस्टर करीब 28 हेक्टेयर के विस्तृत क्षेत्रफल में फैला हुआ है जहां विशेष तौर पर जापानी फलों की पैदावार की जाती है। बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने इस मौके पर जानकारी दी कि जब उन्होंने कुछ समय पहले इस क्षेत्र का दौरा किया था, तब वहां की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए मोनो रेल की आवश्यकता महसूस की गई थी और तुरंत इसके निर्देश दिए गए थे। उन्होंने बताया कि एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से निचले हिमाचल के सात जिलों में कुल 1100 करोड़ रुपये की बड़ी राशि खर्च की जा रही है, जिसके दायरे में लगभग 6 हजार हेक्टेयर भूमि पर विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसमें अकेले मंडी जिले की एक हजार हेक्टेयर भूमि शामिल है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि यदि यह पायलट प्रोजेक्ट अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में पूरी तरह सफल रहता है, तो आने वाले समय में इसे राज्य के अन्य जिलों के बागवानी क्षेत्रों में भी विस्तारित किया जाएगा।
उत्पादन और किसानों का आंकड़ा
प्रशासन की ओर से दी गई जानकारियों के मुताबिक, मंडी जिले के भीतर लगभग एक हजार हेक्टेयर के दायरे में बागवानी विकास को गति देने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास जारी हैं। आने वाली फरवरी तक निर्धारित सभी भूमियों पर पौधरोपण का कार्य पूरी तरह संपन्न कर लेने का लक्ष्य रखा गया है। पलोहटा-II कलस्टर में कुल 28.44 हेक्टेयर जमीन को खास तौर पर जापानी फल यानी पर्सिमन की लोकप्रिय फ्यूयू किस्म की व्यावसायिक खेती के लिए विकसित किया गया है। इस विशेष कलस्टर में कुल मिलाकर 13,386 पौधे रोपे गए हैं, जिनका सीधा फायदा क्षेत्र के 85 किसानों को मिल रहा है। लाभान्वित होने वाले इन किसानों में 73 पुरुष किसान और 12 महिला किसान शामिल हैं, जो इस आधुनिक कृषि तकनीकी का लाभ उठा रहे हैं।
परिवहन और श्रम की बचत
जगत सिंह नेगी ने अपने संबोधन में बताया कि दुनिया के अन्य देशों में आधुनिक बागवानी को बढ़ावा देने के लिए इस प्रकार की तकनीकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। बागवानी विभाग द्वारा स्थापित की गई यह मोनोरेल अभी एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर काम कर रही है और इसके परिणामों का बारीकी से आकलन किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल साबित होता है, तो प्रदेश के बाकी हिस्सों में भी मांग के अनुसार ऐसी सुविधाएं खड़ी की जाएंगी। इस मोनोरेल के जरिए खेतों के भीतर खाद, उर्वरक और अन्य जरूरी कृषि सामग्री को आसानी से बगीचे के दूरदराज हिस्सों तक पहुंचाया जा सकेगा। इसके अलावा जब फल पूरी तरह पककर तैयार हो जाएंगे, तब उन्हें ढुलाई के माध्यम से मुख्य सड़क तक लाना बहुत सुगम हो जाएगा। इससे बागवानों को भारी वजन खुद उठाकर चलने में होने वाली शारीरिक मेहनत और कीमती समय दोनों की भारी बचत होगी।
बुनियादी ढांचे पर करोड़ों का निवेश
पलोहटा-II कलस्टर में बागवानी को सुदृढ़ करने के वास्ते विभिन्न आधारभूत ढांचागत सुविधाओं के विकास पर लगभग 1.65 करोड़ रुपये की भारी रकम खर्च की गई है। इस पूरी लागत में से परियोजना के तहत भूमि विकास पर करीब 32 लाख रुपये, सौर ऊर्जा से संचालित होने वाली बाड़बंदी पर 46.55 लाख रुपये और ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित करने पर लगभग 85.94 लाख रुपये खर्च हुए हैं। इसके अतिरिक्त किसानों की सहूलियत के लिए जरूरी कृषि सामग्री भी मुहैया कराई गई है। इस कलस्टर के भीतर 61 क्विंटल नीम खली पर 1,03,999 रुपये और मल्च शीट पर 14,46,432 रुपये खर्च किए गए हैं। पेड़ों की समय पर कटाई-छंटाई के लिए आठ सेक्येटर भी बांटे गए हैं जिनकी कुल लागत 24,000 रुपये है। जापानी फल की फ्यूयू किस्म के पौधों की खरीद और रोपण पर 20,59,544 रुपये खर्च किए गए हैं, जबकि मनरेगा योजना के अंतर्गत भी 5,32,180 रुपये लगाए गए हैं। इन तमाम व्यवस्थाओं के धरातल पर उतरने से अब किसानों को अपनी फसल की ढुलाई के लिए इंसानी श्रम पर अत्यधिक निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और उपज सुरक्षित रूप से बाजार तक पहुंच सकेगी।



















