महाराष्ट्र के बदलापुर में सामने आए एक अवैध एग एक्सट्रैक्शन नेटवर्क की जांच के दौरान बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने बदलापुर के कई ठिकानों पर दबिश देकर इस गैरकानूनी धंधे की पड़ताल शुरू की है। जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस गिरोह ने 40 से अधिक जरूरतमंद महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर उनका गंभीर शारीरिक और आर्थिक शोषण किया। इस पूरे मामले में सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि एक ही महिला से कथित तौर पर 33 बार अंडे यानी ओओसाइट्स निकाले गए। इस महिला को हर बार प्रक्रिया से गुजरने के एवज में ₹25,000 से लेकर ₹30,000 का भुगतान किया गया, जिससे उसने कुल मिलाकर करीब ₹10 लाख की कमाई की। यह घटना न सिर्फ देश के सहायक प्रजनन तकनीक कानूनों का खुला उल्लंघन दर्शाती है, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य पर मंडराने वाले जानलेवा खतरों की ओर भी ध्यान खींचती है।
बदलापुर में कैसे संचालित हो रहा था यह अवैध नेटवर्क
इस पूरे मामले की शुरुआती पड़ताल से पता चला है कि महिलाओं को पैसों का लालच देकर इस काम के लिए तैयार करने वाला एक संगठित एजेंट नेटवर्क सक्रिय था। बदलापुर पूर्व स्थित एक आवासीय परिसर में इन महिलाओं को प्रजनन क्षमता बढ़ाने वाले हॉर्मोनल इंजेक्शन लगाए जाने का संदेह है। इसके बाद महिलाओं को सोनोग्राफी जांच के लिए ले जाया जाता था ताकि यह देखा जा सके कि उनके अंडाशय में अंडे तैयार हुए हैं या नहीं। जब प्रक्रिया पूरी तरह परिपक्व हो जाती थी, तब उन्हें विभिन्न चिकित्सा केंद्रों या आईवीएफ क्लीनिकों में ले जाकर उनके शरीर से अंडे निकाल लिए जाते थे।
जांच अधिकारी फिलहाल इस पूरे चक्र में शामिल बिचौलियों, आवासीय फ्लैट में अवैध रूप से इंजेक्शन लगाने वाले लोगों और उन आईवीएफ केंद्रों की भूमिका की गहराई से जांच कर रहे हैं जहां ये मेडिकल प्रोसीजर अंजाम दिए गए। मानव अंडा निकालने की प्रक्रिया कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है; इसके लिए गहन हार्मोनल दवाओं, सख्त मेडिकल स्क्रीनिंग, प्रशिक्षित विशेषज्ञों और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की निगरानी जरूरी होती है। जांच एजेंसी यह पड़ताल कर रही है कि क्या इन प्रक्रियाओं के दौरान देश के सहायक प्रजनन तकनीक से जुड़े वैधानिक नियमों का पालन किया गया था या मोटी कमाई के चक्कर में सब कुछ ताक पर रख दिया गया।
एग डोनेशन क्या है और यह मेडिकल प्रक्रिया कैसे काम करती है
एग डोनेशन एक ऐसी स्वीकृत चिकित्सा पद्धति है जिसमें एक स्वस्थ महिला किसी अन्य महिला की मदद के लिए अपने अंडे दान करती है, ताकि वह मां बन सके। यह प्रक्रिया आमतौर पर उन महिलाओं के लिए वरदान साबित होती है जो चिकित्सीय कारणों, समय से पहले डिम्बग्रंथि विफलता या गंभीर बीमारियों के चलते अपने खुद के अंडों से गर्भधारण करने में असमर्थ होती हैं।
इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में डोनर महिला को कुछ विशेष दवाएं और हॉर्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं, जिससे उसके अंडाशय सामान्य से अधिक संख्या में परिपक्व अंडे बना सकें। इस दौरान विशेषज्ञ डॉक्टर लगातार अल्ट्रासाउंड स्कैन और आवश्यकता पड़ने पर रक्त परीक्षणों के जरिए महिला के शारीरिक बदलावों और हॉर्मोन स्तर पर नजर रखते हैं। जब अंडे पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तो एक छोटी सर्जिकल प्रक्रिया की जाती है। इसमें महिला को बेहोशी या एनेस्थीसिया देकर, अल्ट्रासाउंड गाइडेड सुई की मदद से योनि मार्ग के जरिए अंडाशय से अंडे सुरक्षित रूप से बाहर निकाल लिए जाते हैं।
इसके बाद इन निकाले गए अंडों को प्रयोगशाला में पुरुष के शुक्राणुओं के साथ इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ तकनीक के जरिए निषेचित कराया जाता है। निषेचन से तैयार भ्रूण को बाद में संतान चाहने वाली महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद डोनर को कुछ समय तक दर्द, ऐंठन या बेचैनी का सामना करना पड़ सकता है, जिसके लिए डॉक्टरों की निगरानी में फॉलो-अप देखभाल बेहद जरूरी होती है। कानूनन यह पूरी प्रक्रिया केवल मान्यता प्राप्त मेडिकल सेंटर में और डोनर की पूर्ण लिखित सहमति से ही होनी चाहिए।
बार-बार अंडे निकलवाने से महिला की सेहत पर होने वाले जानलेवा खतरे
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, एग डोनेशन की प्रक्रिया पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं होती है। हालांकि सामान्य परिस्थितियों में गंभीर जटिलताएं बहुत कम देखने को मिलती हैं, लेकिन बार-बार और बिना पर्याप्त अंतराल के हार्मोनल दवाओं का इस्तेमाल शरीर के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। बार-बार प्रक्रिया दोहराए जाने से महिला के शरीर को बार-बार भारी हार्मोनल दवाओं और सर्जिकल हस्तक्षेप से गुजरना पड़ता है।
इस प्रक्रिया से जुड़े प्रमुख स्वास्थ्य जोखिमों को समझना बेहद आवश्यक है। सबसे पहले, हार्मोनल दवाओं के कारण अंडाशय का आकार सामान्य से काफी बड़ा हो जाता है, जिससे पेट में भारीपन, सूजन और तेज दर्द की समस्या हो सकती है। इसके अलावा प्रजनन दवाओं के सेवन के दौरान महिलाओं को लगातार गंभीर सिरदर्द, जी मिचलाना और उल्टी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हॉर्मोन के असंतुलन से कई महिलाओं में मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और मूड स्विंग्स के गंभीर लक्षण भी देखे जाते हैं।
सबसे बड़ा चिकित्सकीय जोखिम ओवेरियन हाइपरस्टिम्यूलेशन सिंड्रोम यानी ओएचएसएस का होता है। इसमें अंडाशय फर्टिलिटी दवाओं के प्रति अत्यधिक प्रतिक्रिया देने लगता है। गंभीर मामलों में पेट और छाती के भीतर तरल पदार्थ जमा होने लगता है, जिससे सांस लेने में भारी तकलीफ होती है, रक्त के थक्के जमने का खतरा बढ़ जाता है और मरीज को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है। इसके अलावा, सुई से अंडे निकालते समय आंतरिक रक्तस्राव, संक्रमण या आसपास के आंतरिक अंगों और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचने का जोखिम भी बना रहता है। जब कोई महिला 33 बार इस प्रक्रिया से गुजरती है, तो उसके शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव कई गुना बढ़ जाते हैं।
भारतीय कानून में एग डोनेशन के क्या हैं सख्त नियम
भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा और मानव अंगों या कोशिकाओं के बाजारीकरण को रोकने के लिए सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021 लागू है। इस कानून के तहत एग डोनेशन को लेकर बेहद कड़े और स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं, जिनका उल्लंघन करना गैरकानूनी माना गया है।
कानून के मुताबिक कोई भी महिला अपने पूरे जीवनकाल में केवल एक ही बार अंडे दान कर सकती है। इसके अलावा, एक प्रक्रिया के दौरान किसी भी डोनर महिला के शरीर से सात से अधिक ओओसाइट्स यानी अंडे निकालने की अनुमति नहीं है। प्रक्रिया शुरू करने से पहले डोनर की पूरी मेडिकल जांच और शारीरिक स्क्रीनिंग अनिवार्य है, और उसकी स्पष्ट लिखित सहमति होना आवश्यक है। कानून यह भी अनिवार्य करता है कि बच्चे की चाह रखने वाले दम्पति या महिला को एग डोनर के लिए 12 महीने का स्वास्थ्य बीमा करवाना होगा, ताकि प्रक्रिया के बाद होने वाली किसी भी चिकित्सीय समस्या या जटिलता का खर्च उठाया जा सके।
गैरकानूनी खरीद-फरोख्त पर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान
सहायक प्रजनन तकनीक कानून देश के सभी एआरटी क्लीनिकों और बैंकों के संचालन को कड़ाई से नियंत्रित करता है। यह कानून स्पष्ट करता है कि एग डोनेशन का काम केवल पंजीकृत बैंकों और मान्यता प्राप्त क्लीनिकों के माध्यम से ही हो सकता है, और इसके लिए किसी भी तरह का व्यावसायिक सौदा पूरी तरह अवैध है।
अधिनियम की धारा 29 किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा मानव युग्मकों (गैमीट्स), युग्मनजों (जाइगोट्स) और भ्रूणों की खरीद, बिक्री, हस्तांतरण या व्यावसायिक उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। वहीं, धारा 33 के तहत मानव गैमीट्स के अवैध व्यापार, रैकेट चलाने और डोनर महिलाओं का शोषण करने वालों के लिए सख्त सजा तय की गई है। कानून के पहले उल्लंघन पर ₹5 लाख से लेकर ₹10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था दोबारा इस अपराध में लिप्त पाई जाती है, तो दोषियों को 3 से 8 साल तक की कठोर कैद और ₹10 लाख से लेकर ₹20 लाख तक के भारी जुर्माने की सजा हो सकती है। बदलापुर मामले में प्रवर्तन निदेशालय इसी बात की तफ्तीश कर रहा है कि महिलाओं को फंसाने, इंजेक्शन लगाने और अस्पतालों में प्रक्रिया कराने वालों ने कानून का कितना गंभीर उल्लंघन किया है।





















