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दीवाली के बाद सीजेपी की रणनीति पर संशय, अभिजीत दिपके के बयान ने नेतृत्व ढांचे पर खड़े किए सवालपड़ताल
24 अक्तू॰ 2026, 7:46 am (6 दिन पहले)· 3

दीवाली के बाद सीजेपी की रणनीति पर संशय, अभिजीत दिपके के बयान ने नेतृत्व ढांचे पर खड़े किए सवाल

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद पुलिस कार्रवाई और दीवाली तक आंदोलन स्थगित होने के बीच अभिजीत दिपके के बयान ने सीजेपी के अंदरूनी नेतृत्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित गड़बड़ियों को लेकर सीजेपी का विरोध प्रदर्शन इस समय एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा द्वारा सीजेपी के दो प्रमुख नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास को 22 अक्टूबर को पूछताछ के लिए तलब किया गया था, लेकिन वे दोनों जांच अधिकारियों के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। इससे ठीक एक दिन पहले संगठन के संस्थापक अभिजीत दिपके का एक सार्वजनिक बयान सामने आया था, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उनका काम केवल आशुतोष और सौरव के निर्देशों का पालन करना था। इन बयानों और कानूनी कार्रवाइयों के बीच संगठन ने त्योहारों को देखते हुए अपने आंदोलन को दीवाली के बाद तक के लिए रोक दिया है, जिससे इस आंदोलन की दिशा और वास्तविक नेतृत्व को लेकर व्यापक सवाल उठ रहे हैं।

आंदोलन के इस पड़ाव पर कानूनी जटिलताएं, नेतृत्व की भूमिकाएं और भविष्य की रणनीति ऐसे बिंदु बन गए हैं, जिन पर राजनीतिक हलकों में लगातार चर्चा हो रही है। जंतर-मंतर पर 13 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के बाद से उपजे हालात ने पूरे घटनाक्रम को नया आकार दे दिया है।

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जंतर-मंतर का प्रदर्शन और सात दिनों की न्यायिक हिरासत

इस पूरे विवाद की हालिया कड़ी 13 अक्टूबर को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ी है। सीजेपी के कार्यकर्ता और समर्थक पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स के बावजूद जंतर-मंतर परिसर में दाखिल होने का प्रयास कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने वहां राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया और निर्वाचन आयोग के शीर्ष अधिकारी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए जमकर नारेबाजी की। इस प्रदर्शन का मुख्य आधार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित तौर पर हुई अनियमितताएं थीं, जिन्हें लेकर संगठन लगातार विरोध दर्ज करा रहा है।

प्रशासनिक स्तर पर जंतर-मंतर को एक निर्दिष्ट विरोध स्थल के रूप में पहले ही गैर-अधिसूचित किया जा चुका था। इसी कारण से दिल्ली पुलिस ने वहां अनधिकृत प्रवेश और नियमों के उल्लंघन को लेकर सख्त रुख अपनाया। पुलिस ने मौके पर कार्रवाई करते हुए कई लोगों को हिरासत में लिया और इस घटना के सिलसिले में कानूनी मामले दर्ज किए। आशुतोष रांका और सौरव दास को पुलिस कार्रवाई के बाद हिरासत में लेकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

दोनों नेताओं को तिहाड़ या संबंधित जेल में सात दिन बिताने पड़े। इसके बाद 21 अक्टूबर को उन्हें न्यायिक हिरासत से रिहा किया गया। अदालत और प्रशासन द्वारा उनकी रिहाई के लिए सख्त शर्तें तय की गई थीं। दोनों नेताओं को लिखित रूप से यह वचन देना पड़ा कि वे शांति बनाए रखेंगे और जब तक जंतर-मंतर गैर-अधिसूचित रहेगा, तब तक वे वहां किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे। इसके अलावा उन्हें पचास-पचास हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के जमानती बांड भी जमा करने पड़े।

अपराध शाखा के समन पर गैर-हाजिरी और कानूनी दांव-पेंच

रिहाई के अगले ही दिन यानी 22 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने आशुतोष रांका और सौरव दास को पूछताछ के लिए बुलाया था। जांच एजेंसी 13 अक्टूबर की घटना और उससे जुड़ी संगठनात्मक तैयारियों को लेकर पूछताछ करना चाहती थी। हालांकि दोनों नेता जांच अधिकारियों के समक्ष पेश नहीं हुए। इस गैर-हाजिरी ने पुलिस और संगठन के बीच तनातनी को और बढ़ा दिया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि समन पर उपस्थित न होने से जांच एजेंसी आगे कड़े कदम उठा सकती है। चूंकि दोनों नेताओं ने पचास हजार रुपये के मुचलके पर शांति बनाए रखने और कानून का पालन करने का वचन पत्र दिया है, इसलिए पुलिस की हर अगली कार्रवाई पर उनकी नजर रहेगी। संगठन के कानूनी सलाहकारों के सामने अब यह चुनौती है कि वे अदालती शर्तों का उल्लंघन किए बिना अपने नेताओं का बचाव कैसे सुनिश्चित करते हैं।

अभिजीत दिपके का वीडियो संदेश और नेतृत्व पर उठते सवाल

जेल से रिहाई से ठीक एक दिन पहले 20 अक्टूबर को सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने एक वीडियो संदेश जारी किया था। इस वीडियो में उन्होंने संगठन के भीतर अपनी भूमिका को लेकर बेहद चौंकाने वाला बयान दिया। दिपके ने कहा कि आंदोलन को खड़ा करने और सभी बड़े रणनीतिक फैसले लेने का मुख्य श्रेय आशुतोष रांका और सौरव दास को जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका अपना काम सिर्फ इन दोनों नेताओं के आदेशों का पालन करना था कि उन्हें कब कहां जाना है और क्या करना है।

दिपके ने दोनों नेताओं की क्षमताओं की खुलकर सराहना की और उन्हें खुद से बड़ा नेता बताया। 21 अक्टूबर को जब रांका और दास जेल से बाहर आए, तब भी दिपके ने सोशल मीडिया पर एक सार्वजनिक पोस्ट साझा करते हुए अपने इसी रुख को दोहराया। उन्होंने लिखा कि वे इन दोनों के मार्गदर्शन में काम करके बेहद संतुष्ट हैं और उनके निर्देशों का सम्मान करते हैं।

इस बयान के सामने आने के बाद राजनीतिक विश्लेषक यह सवाल उठाने लगे हैं कि क्या अभिजीत दिपके केवल संगठन का सार्वजनिक चेहरा हैं, जबकि वास्तविक नियंत्रण और फैसले लेने की ताकत किसी अन्य धड़े के पास है। एक संस्थापक द्वारा खुद को केवल आदेशों का पालन करने वाला सिपाही बताना किसी भी राजनीतिक या सामाजिक संगठन में असामान्य माना जाता है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि आंदोलन के भीतर निर्णय लेने की कोई स्पष्ट या पारदर्शी औपचारिक व्यवस्था शायद मौजूद नहीं है।

आंदोलन में समन्वय की कमी और विश्लेषकों का नजरिया

इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने अपनी विस्तृत राय रखी है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि इस आंदोलन का उद्देश्य सरकार बदलना नहीं है, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगना है। किसी एक विशिष्ट प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति के इस्तीफे की मांग को लेकर चलाए जाने वाले आंदोलन की अपनी सीमाएं होती हैं।

नीरजा चौधरी ने आंदोलन की निरंतरता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हजारों दिनों तक लगातार प्रदर्शन नहीं चलाए जा सकते। आयोजकों को यह भली-भांति तय करना होता है कि कब सड़क पर उतरना है और कब आंदोलन को विराम देना है। कोई भी प्रदर्शन अनिश्चितकाल तक स्थायी रूप से नहीं चल सकता। उनका यह भी कहना था कि विरोध प्रदर्शनों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आयोजकों के पास मुद्दों के चयन और सहयोगी समूहों के साथ काम करने की स्पष्ट योजना हो।

विश्लेषक के अनुसार इस आंदोलन में शामिल विभिन्न घटकों के बीच पर्याप्त तालमेल का अभाव साफ दिखाई देता है। सभी समूह पूरी तरह से एकमत नहीं हैं और आंदोलन चलाने या नीतिगत निर्णय लेने के लिए कोई मजबूत संस्थागत ढांचा नहीं है। जब किसी अभियान में विभिन्न राजनीतिक दल और छात्र या युवा संगठन जैसे जेन जी शामिल होते हैं, तो आपसी समन्वय सबसे जरूरी कड़ी बन जाता है। नीरजा चौधरी का मानना है कि सीजेपी और युवा संगठनों को इस आंदोलन का नेतृत्व आगे रहकर करना चाहिए, जबकि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को अग्रिम पंक्ति में आने के बजाय पीछे से समर्थन देना चाहिए।

दीवाली का अवकाश और भविष्य की अनिश्चित राह

अभिजीत दिपके ने 20 अक्टूबर को यह घोषणा की थी कि सीजेपी दीवाली के त्योहार तक कोई नया प्रदर्शन आयोजित नहीं करेगी। उन्होंने अपने सभी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अपील की कि वे इस दौरान अपने परिवारों के साथ त्योहार मनाएं और कुछ समय के लिए सड़कों से हट जाएं। दूसरी तरफ रिहाई के बाद आशुतोष रांका ने यह बयान दिया कि दीवाली बीत जाने के बाद उनका आंदोलन फिर से पूरी ताकत के साथ शुरू होगा।

हालांकि आंदोलन कब, कहां और किस स्वरूप में दोबारा शुरू होगा, इसे लेकर सीजेपी की तरफ से कोई आधिकारिक तारीख या स्थान तय नहीं किया गया है। जंतर-मंतर के गैर-अधिसूचित होने और अदालत में दिए गए हलफनामे के कारण संगठन अब वहां प्रदर्शन नहीं कर सकता। अगर वे दोबारा जंतर-मंतर पर जाने का प्रयास करते हैं, तो यह सीधे तौर पर जमानत की शर्तों और शांति बनाए रखने के मुचलके का उल्लंघन होगा, जिससे उनकी रिहाई खतरे में पड़ सकती है।

ऐसी स्थिति में संगठन को दिल्ली में किसी वैकल्पिक स्थल की तलाश करनी होगी या फिर अपने आंदोलन को देश के अन्य राज्यों में ले जाने की योजना बनानी होगी। लेकिन देशव्यापी स्तर पर आंदोलन का विस्तार करने के लिए जिस संगठनात्मक क्षमता, संसाधनों और साझेदारियों की आवश्यकता होती है, क्या सीजेपी इस समय उसके लिए तैयार है, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

आगे की संभावित चुनौतियां

सीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की होगी कि उनका आंदोलन केवल कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ नहीं है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में कथित अनियमितताओं का मुद्दा तकनीकी और प्रक्रियात्मक है, जिसे आम जनता तक आसान भाषा में पहुंचाना और उस पर लंबा जनसमर्थन जुटाना आसान काम नहीं है।

इसके साथ ही दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की जांच आगे बढ़ने पर संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर कानूनी दबाव और बढ़ सकता है। आशुतोष रांका और सौरव दास के पेश न होने के बाद पुलिस का अगला कदम क्या होगा, यह आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जब तक सीजेपी अपने आंतरिक निर्णय लेने के तंत्र को स्पष्ट नहीं करती और एक ठोस कार्ययोजना जनता के सामने नहीं रखती, तब तक दीवाली के बाद आंदोलन को दोबारा खड़ा करना एक बेहद कठिन चुनौती बना रहेगा।

सवाल-जवाब

सीजेपी के विरोध प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा क्या है?
संगठन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं का विरोध कर रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है।
आशुतोष रांका और सौरव दास को जेल क्यों भेजा गया था?
उन्होंने 13 अक्टूबर को गैर-अधिसूचित स्थल जंतर-मंतर पर बैरिकेड्स लांघकर अनधिकृत प्रदर्शन किया था, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर उन्हें सात दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा था।
जेल से रिहाई के लिए दोनों नेताओं को किन शर्तों का पालन करना पड़ा?
उन्हें पचास-पचास हजार रुपये के निजी और जमानती बांड भरने पड़े और लिखित आश्वासन दिया कि वे शांति बनाए रखेंगे तथा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं बुलाएंगे।
अभिजीत दिपके ने संगठन में अपनी भूमिका के बारे में क्या कहा?
दिपके ने एक वीडियो संदेश में कहा कि उनका काम केवल आशुतोष रांका और सौरव दास के आदेशों का पालन करना था और आंदोलन खड़ा करने का श्रेय उन्हीं दोनों को जाता है।
दिल्ली पुलिस अपराध शाखा ने नेताओं को कब तलब किया था और क्या वे पेश हुए?
अपराध शाखा ने आशुतोष रांका और सौरव दास को 22 अक्टूबर को पूछताछ के लिए बुलाया था, लेकिन वे दोनों उपस्थित नहीं हुए।
दीवाली के बाद सीजेपी की रणनीति को लेकर क्या जानकारी सामने आई है?
रांका ने कहा है कि आंदोलन दीवाली के बाद जारी रहेगा, लेकिन संगठन ने अभी तक अगली तारीख, स्थान या राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Nyra Kaif@nyra-kaif·5 दिन पहले

मुसीबत आते ही लीडर अपनी ही टीम पर टालने लगे, तो ऐसे प्रोटेस्ट का भगवान ही मालिक है।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·5 दिन पहले

न्यारा, तुम्हारी बात सही है। जब मैं वॉशिंगटन में ऐसी रैलियों को कवर करता था, तब भी देखा है कि मुश्किल वक्त आते ही बड़े चेहरे कैसे पीछे हट जाते हैं।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·5 दिन पहले

नेता खुद जेल से बाहर आ गए हैं और अब दीवाली के बाद की बात कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने की कलह साफ दिख रही है।

Li Wei@li-wei·5 दिन पहले

उमर, बिल्कुल सही पकड़े हैं! चीन में भी जब संगठन बड़े होते हैं, तो ऐसे ही अंदरूनी मतभेद सामने आने लगते हैं।

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