जम्मू और कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था और पड़ोसी मुल्क की भूमिका को लेकर राजनीतिक बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने उत्तरी कश्मीर के ऐतिहासिक कस्बे बारामुला में आयोजित एक कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान एक विवादित टिप्पणी की। उन्होंने पड़ोसी देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मामले को उठाने की कवायद का जिक्र करते हुए कहा कि वही कश्मीरियों की रक्षा करेगा। बारामुला का इतिहास दशकों पुरानी हिंसा, दर्द और तबाही की दास्तानों से भरा पड़ा है। ऐसे में इस कस्बे की जमीन से दिए गए इस बयान ने पुराने जख्मों को कुरेद दिया है और इतिहास के उन पन्नों को चर्चा में ला दिया है जो पाकिस्तान समर्थित हिंसा की गवाही देते हैं।
फारूक अब्दुल्ला का बयान और राजनीतिक विवाद
बारामुला में 24 अक्टूबर 2026 को नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं की एक सभा आयोजित की गई थी। इस सभा को संबोधित करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि दुनिया में शोर मचने और पड़ोसी मुल्क द्वारा लगातार इस मामले को उठाने के चलते दूसरे पक्ष खामोश हैं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, 'वे आज चुप हैं क्योंकि दुनिया में शोर है और हमारा पड़ोसी लगा हुआ है, वह हर जगह पहुंचता है कि कश्मीर का फैसला नहीं हुआ है। वही हमें बचाएगा।' इस टिप्पणी के माध्यम से उन्होंने यह दर्शाने का प्रयास किया कि पड़ोसी देश द्वारा कश्मीर विवाद को वैश्विक पटल पर जीवित रखना स्थानीय लोगों के लिए एक ढाल का काम कर रहा है। हालांकि इस बयान के सामने आते ही कश्मीर घाटी और देश के अन्य हिस्सों में तीखी बहस छिड़ गई, क्योंकि बारामुला का अपना इतिहास बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है।
अक्टूबर 1947 का कबाइली हमला और बारामुला का कत्लेआम
पड़ोसी मुल्क द्वारा कश्मीर की सुरक्षा करने के दावे को समझने के लिए इतिहास के पन्ने पलटना बेहद जरूरी है। अक्टूबर 1947 में जब भारत और पाकिस्तान के बंटवारे को कुछ ही हफ्ते बीते थे, तब उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत से आए कबाइली हमलावरों ने जम्मू और कश्मीर की सीमा में घुसपैठ की थी। इस इलाके को आज खैबर पख्तूनख्वा के नाम से जाना जाता है। इन हथियारबंद हमलावरों ने बारामुला कस्बे पर धावा बोल दिया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरणों के अनुसार, हमलावरों ने पूरे कस्बे में भयंकर लूटपाट की, स्थानीय निवासियों की हत्याएं कीं और महिलाओं का अपहरण किया। शांतिपूर्ण कस्बे को कुछ ही घंटों में खंडहर और मातम में बदल दिया गया था।
सेंट जोसेफ अस्पताल और कॉन्वेंट पर खूनी हमला
इस बर्बरता का सबसे भयानक रूप 27 अक्टूबर 1947 को सामने आया, जब कबाइली लड़ाकों ने बारामुला स्थित सेंट जोसेफ अस्पताल और मिशनरी कॉन्वेंट पर हमला बोल दिया। इतिहासकार और लेखक एंड्रयू व्हाइटहेड के दस्तावेजों के मुताबिक, इस मिशन में छह बेकसूर लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया था। मरने वालों में स्पेनिश नन सिस्टर टेरेसालिना, ब्रिटिश नागरिक टॉम डाइक्स और उनकी पत्नी बिडी डाइक्स, नर्स फिलोमेना, जोस बैरेटो और अस्पताल में भर्ती मरीज मोतिया देवी कपूर शामिल थीं। हमलावरों ने मिशन परिसर की पूरी संपत्ति लूट ली और वहां मौजूद पादरियों, ननों, मरीजों और शरण लेने आए स्थानीय नागरिकों को बंधक बना लिया। फादर जॉर्ज शैंक्स की डायरी में दर्ज आंखों देखे विवरण बताते हैं कि हमलावरों ने मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर इस पवित्र स्थल पर खूनखराबा किया था।
हमलावरों की लूटपाट और भारत में विलय
इतिहासकारों का मानना है कि बारामुला में हमलावरों द्वारा की गई अनियंत्रित लूटपाट ने ही कश्मीर का भविष्य तय कर दिया। कबाइली लड़ाके लूट के माल और संपत्ति के बंटवारे में इस कदर उलझ गए कि श्रीनगर की तरफ उनकी बढ़त धीमी पड़ गई। इस देरी ने रियासत के शासक और भारत सरकार को स्थिति संभालने का महत्वपूर्ण समय दे दिया। महाराजा हरी सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके ठीक अगले दिन, यानी 27 अक्टूबर को भारतीय सेना के वीर जवान हवाई मार्ग से श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरे और मोर्चा संभाल लिया। इसके बाद भारतीय सैन्य बलों ने आगे बढ़ते हुए नवंबर के महीने में बारामुला को हमलावरों के कब्जे से पूरी तरह मुक्त करा लिया। हालांकि पाकिस्तान की सरकार ने इस पूरी घुसपैठ में अपनी सीधी भूमिका से इनकार किया था, लेकिन ऐतिहासिक शोध और उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करते हैं कि पाकिस्तानी सेना और प्रशासनिक अधिकारियों ने इन हमलावरों को साजो सामान और रणनीतिक मदद मुहैया कराई थी।
सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद के ठोस प्रमाण
अक्टूबर 1947 की उस घटना के बाद भी बारामुला जिले ने आतंकवाद और सीमा पार हिंसा का दंश झेलना जारी रखा। 18 सितंबर 2016 की सुबह बारामुला जिले के उरी में स्थित भारतीय सेना के 12 इन्फैंट्री ब्रिगेड मुख्यालय पर चार भारी हथियारों से लैस आतंकियों ने आत्मघाती हमला कर दिया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस कायराना हमले में 17 सैन्यकर्मी शहीद हो गए थे। जांच अधिकारियों ने घटनास्थल से बरामद जीपीएस उपकरणों, हथियारों, दवाओं और खाद्य पैकेटों की गहन जांच की। इन सभी वस्तुओं पर पाकिस्तानी निर्माताओं के स्पष्ट निशान और लेबल मौजूद थे। जीपीएस डेटा के फॉरेंसिक विश्लेषण से यह साबित हुआ कि आतंकियों की यात्रा की शुरुआत पड़ोसी देश के एक आतंकी ठिकाने से हुई थी। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को पड़ोसी देश में स्थित आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।
पहलगाम हमला और जांच एजेंसियों के खुलासे
घाटी में हिंसा की साजिशें हाल के वर्षों में भी लगातार बेनकाब होती रही हैं। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए एक आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी। इसके बाद दिसंबर 2025 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस मामले में अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। इस आरोप पत्र में लश्कर-ए-तैयबा, उसके सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट और कई स्थानीय गुर्गों को नामजद किया गया। जांच एजेंसी ने डिजिटल साक्ष्यों, मोबाइल कॉल डेटा, वित्तीय लेन देन और पकड़े गए आतंकियों के बयानों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि इस पूरी खूनी साजिश के तार सीमा पार बैठे आकाओं से जुड़े हुए थे। आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले आधुनिक हथियार, संचार उपकरण और घुसपैठ के रास्ते लगातार यह गवाही देते हैं कि सीमा पार से अशांति फैलाने की कोशिशें निरंतर जारी रही हैं।
आम जनता पर हिंसा का गहरा असर और सामाजिक त्रासदी
चार दशकों से जारी इस हिंसा और आतंकवाद ने बारामुला की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है। हिंसा का असर सिर्फ मौतों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हजारों परिवारों की जिंदगी बर्बाद कर दी है। जम्मू कश्मीर कोलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी द्वारा तैयार किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, बारामुला जिले में 1989 से 2006 के बीच 18 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के 3,634 युवाओं की जान गई थी। इन आंकड़ों के पीछे अनगिनत उजड़े हुए परिवार और बेबस जिंदगियां छिपी हैं। बारामुला के जोगियार गांव की रहने वाली अतीका बेगम की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है। फरवरी 1990 में उनके पति के लापता होने के बाद उन्हें अकेले ही अपने चार बच्चों का पालन पोषण करना पड़ा। कश्मीर में ऐसी अनगिनत महिलाएं हैं जिन्हें 'हाफ विडो' यानी अर्ध विधवा कहा जाता है, जो अपने पतियों की वापसी की उम्मीद में दशकों से अनिश्चितता और आर्थिक तंगी का सामना कर रही हैं।
सीमा पर गोलाबारी और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य
उरी सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पार से होने वाली तोपखाने की गोलाबारी ने सीमावर्ती गांवों के जनजीवन को अस्त व्यस्त कर रखा है। जून 2025 में उरी में हुई भारी गोलाबारी के चलते स्कूल बंद करने पड़े और बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो गई। एक 12 वर्षीय स्कूली छात्र ने आपबीती सुनाते हुए बताया था कि गोलाबारी के धमाकों की गूंज उसके सपनों में भी खौफ पैदा करती है। बारामुला और पुलवामा के संघर्ष प्रभावित इलाकों में किए गए कई स्वास्थ्य अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि निरंतर भय, बमबारी और सुरक्षा संकट के माहौल में रहने के कारण स्थानीय आबादी, खासकर महिलाओं और बच्चों में अवसाद, अनिद्रा और गंभीर तनाव जैसी मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। चथम हाउस द्वारा वर्ष 2009 और 2010 में कराए गए सर्वेक्षण में भी जिले के लोगों के राजनीतिक विचारों की जटिलता दर्ज की गई थी। ऐसे में इतिहास और वर्तमान की हकीकत यह स्पष्ट करती है कि जिस मुल्क को सुरक्षा देने वाला बताया जा रहा है, उसके द्वारा प्रायोजित हिंसा ने बारामुला को गहरे जख्मों के सिवा कुछ नहीं दिया है।



















