बैंक ऑफ जापान की मौद्रिक समीक्षा पर टिकी निगाहें, काजुओ उएदा के बयानों से तय होगी जापानी येन की चालफैंटम ब्लेड ज़ीरो गेम रिव्यू: बेहतरीन कुंग-फू एक्शन और शानदार कॉम्बैट के साथ चीनी वुक्सिया गाथा की वैश्विक शुरुआतशादियों में छाया सेलिब्रिटी लुक वाली इमिटेशन ज्वेलरी का जादू, किराए पर लेने की भी सुविधालाइव: 29 अक्टूबर तक कमजोर होकर डिप्रेशन में तब्दील होगा चक्रवात अर्णब, आईएमडी का पूर्वानुमानकर्नाटक एसएसएलसी 2025 में धनलक्ष्मी ने किया कमाल, अब सीए बनकर परिवार को गरीबी से निकालने का संकल्पप्राइमटाइम रिव्यू (2026): रॉबर्ट पैटिनसन का सनसनीखेज और झकझोर देने वाला अभिनयडाकघर की पीपीएफ योजना से 15 साल में तैयार करें 40 लाख का फंड, जानें निवेश का पूरा गणितहंटर्स मून गेम रिव्यू (2026): 17वीं सदी के इंग्लैंड में डायन शिकार के खौफ की दास्तानफिटबिट एज का अधिकतम लाभ उठाने के लिए 10 स्मार्ट ट्रिक्स और छिपे हुए फीचर्सअमेरिका में विरोध की आवाज़ दबाने को डीएचएस ने झोंकी पूरी ताकत, निगरानी के लिए उतारे रीपर ड्रोन
डिजिटल सड़न और बॉट्स की बाढ़ के बीच क्या पुराने इंटरनेट का अंत ही नई शुरुआत बनेगा?पड़ताल
29 अक्तू॰ 2026, 7:29 am (6 मिनट पहले)· 0

डिजिटल सड़न और बॉट्स की बाढ़ के बीच क्या पुराने इंटरनेट का अंत ही नई शुरुआत बनेगा?

एल्गोरिदम, एआई से उपजे निरर्थक कंटेंट और मृत लिंक के दबाव में दम तोड़ती ऑनलाइन दुनिया अब स्थायी यादों के बजाय डिजिटल खाद में तब्दील हो रही है।

वर्तमान डिजिटल परिवेश और उसके इर्द-गिर्द बुना गया सामाजिक ताना-बाना अब उस शुरुआती वादे से कोसों दूर जा चुका है, जिसकी उम्मीद शुरुआती दिनों में की गई थी। सांस्कृतिक और संरचनात्मक पतन के स्पष्ट लक्षण अब किसी से छिपे नहीं हैं। ऑनलाइन तंत्र धीरे-धीरे अपनी ही बुनियाद को खोखला कर रहा है। प्रौद्योगिकी के विशाल मंचों से लेकर आम उपयोगकर्ताओं के दैनिक अनुभव तक, हर स्तर पर एक गहरा गतिरोध और बिखराव साफ नजर आ रहा है।

मेटा और गूगल जैसी दिग्गज प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपनी सेवाओं की लत लगाने वाले तौर-तरीकों, निजता उल्लंघनों तथा मानसिक स्वास्थ्य पर पड़े कथित दुष्प्रभावों के चलते भारी कानूनी मुकदमों में बड़े समझौतों के लिए विवश होना पड़ा है। दुनिया भर में कक्षा के भीतर स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं और कई देशों ने 16 वर्ष से कम उम्र के किशोरों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उपयोग पर कड़े कानूनी प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। इसके साथ ही अभिभावक इस बात को लेकर गहरे तनाव में हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई या रचनात्मक कार्यों के बजाय सोशल मीडिया सेलिब्रिटी बनने की होड़ में उलझ रहे हैं, इंटरनेट आधारित जुए के व्यापक तंत्र में फंस रहे हैं या फिर अतिवादी विचारधाराओं की गिरफ्त में आ रहे हैं।

ये भी पढ़ें

जेनरेटिव एआई की बाढ़ और ध्यान खींचने की जंग

शुरुआत में जिस जेनरेटिव एआई को एक रोचक और कौतूहल पैदा करने वाले नवाचार के रूप में देखा गया था, वह अब वेब पर निरर्थक और विकृत सामग्री का अंबार लगाने वाला सबसे तेज इंजन बन चुका है। विभिन्न सोशल प्लेटफॉर्म्स की फीड और कमेंट बॉक्स अवांछित, कृत्रिम और निम्न-स्तरीय सामग्री से भर गए हैं। कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें गड़ाए लोग नौकरियों पर मंडराते एआई के खतरे, कल्पना और हकीकत के बीच धुंधली होती सीमाओं और मानवीय संज्ञान में गिरावट से जुड़ी खबरों के बीच से गुजर रहे हैं। इस तकनीक का जो भी आकर्षण कभी उपभोक्ताओं के बीच था, वह अब घबराहट और असंतोष में बदलता जा रहा है। इन प्रणालियों को संचालित करने वाले विशाल डेटा सेंटर भी ऊर्जा खपत और पर्यावरणीय असर के चलते लगातार अलोकप्रिय और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन रहे हैं।

ऑनलाइन सक्रिय रहने का अर्थ अब कई लोगों के लिए लगातार हेरफेर और शोषण का शिकार बनना हो गया है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा 'रेज बैट' को वर्ष का शब्द घोषित किया गया, क्योंकि पिछले 12 महीनों के दौरान इस शब्दावली के प्रयोग में तीन गुना उछाल देखा गया था। यह भाषाई बदलाव इस बात की गहरी सार्वजनिक समझ को दर्शाता है कि विज्ञापनों और रीच से कमाई करने वाले सोशल खाते जानबूझकर कटुता और अतिवादी विचार परोस रहे हैं। शत्रुतापूर्ण बातचीत से मुनाफा कमाने के लिए जेनरेटिव एआई के जरिए इस अपमानजनक व्यवहार को पूरी तरह स्वचालित कर दिया गया है। विभिन्न मंचों पर सामग्री की निगरानी में ढिलाई दिए जाने से अप्रमाणिक गतिविधियों, षड्यंत्र के सिद्धांतों और नफरत फैलाने वाले भाषणों का रास्ता पूरी तरह खुल गया है।

साल 2026 के डिजिटल माहौल में कदम रखने पर ऐसा बहुत कम दिखाई देता है जिसे सहेजने लायक माना जाए। लगभग एक दशक पहले तक यह भावना बनी हुई थी कि सामुदायिक जुड़ाव, बौद्धिक आदान-प्रदान और कलात्मक विमर्श की चमक जहरीले कचरे के प्रभाव को संतुलित करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन अब वह संतुलन पूरी तरह टूट चुका है।

डेड इंटरनेट थ्योरी और बॉट्स का बढ़ता दायरा

इस संकट की वजह केवल यह नहीं है कि इंसानों के व्यवहार में गिरावट आई है। 'डेड इंटरनेट थ्योरी', जो यह दावा करती है कि वेब पर होने वाली अधिकांश बातचीत इंसानों के बीच नहीं बल्कि आपस में बात करने वाले बॉट्स द्वारा संचालित फर्जी हलचल है, को हाल ही में और अधिक सांख्यिकीय समर्थन मिला है। एक साइबर सुरक्षा फर्म के विश्लेषण के अनुसार इस साल के शुरुआती महीनों में स्वचालित एजेंटों की संख्या आम इंसानी उपयोगकर्ताओं से आगे निकल गई, और वर्ष 2025 के दौरान उनके ट्रैफिक में 8,000 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऐसे में जब इंटरनेट पर समय बिताने वाला लगभग हर व्यक्ति खुद को घटिया और मस्तिष्क को कुंद करने वाले कंटेंट के बियाबान में पाता है, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उभरता है कि क्या आने वाले समय में भी यह व्यवस्था इसी ढर्रे पर चलती रहेगी।

हालांकि वेब की यह तस्वीर ही पूरी कहानी बयां नहीं करती। वेस्ट का तर्क है कि लोग इंटरनेट के वास्तविक विस्तार को लेकर गलतफहमी के शिकार हैं, जबकि असल में यह समूचे मानवीय अनुभव का एक नगण्य हिस्सा मात्र है। इसके अलावा, यह ढांचा अप्रत्याशित रूप से बेहद नाजुक है। वर्ष 2001 में बाल्टीमोर की एक सुरंग में मालगाड़ी के पटरी से उतरने की घटना ने ऑप्टिकल फाइबर केबलों के एक बड़े जाल को पूरी तरह तबाह कर दिया था, जिसके चलते पूरे अमेरिका में इंटरनेट की गति ठप पड़ गई थी। इस तरह की स्वाभाविक अस्थिरता के कारण डिजिटल दुनिया निरंतर मिटने और दोबारा आकार लेने के चक्रों से गुजरती रहती है।

अस्थिर यादें और हाइपरलिंक का विलोपन

यदि इंटरनेट अपनी वास्तविक स्थिति में लोगों की कल्पना की तुलना में बहुत छोटा और कम ठोस है, तो वेस्ट की पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि वे कौन से कारक हैं जो इसके हिस्सों के नष्ट होने या सुरक्षित रहने का फैसला करते हैं। बाजार ने इस व्यवस्था को संचित मानवीय ज्ञान के एक संपूर्ण और अटूट पुस्तकालय के रूप में प्रचारित किया है, जिसके कारण इस वैश्विक नेटवर्क का हर अस्थायी दौर वर्तमान को अच्छे और बुरे दोनों रूपों में प्रभावित करता है। आज हर तरफ एल्गोरिदम द्वारा भड़काऊ सामग्री को बढ़ावा दिए जाने से उपजा जड़त्व दिखाई दे रहा है। अपना पूरा समय देने वाले इनफ्लुएंसर ध्यान खींचने की इस दौड़ में उन चैनलों से पिछड़ रहे हैं जो अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर के सहारे बहुत कम मेहनत में भारी मात्रा में सामग्री तैयार कर रहे हैं।

वेस्ट ने कमाई पर केंद्रित इस कृत्रिम वातावरण और पुराने जियोसिटीज से लेकर टम्बलर तक फैले आत्मीय, व्यक्तिगत इंटरनेट के बीच एक गहरा अंतर रेखांकित किया है, जहां कभी मौलिक समुदायों का बोलबाला था जिन्हें धीरे-धीरे मिटा दिया गया। इनमें से कुछ मंच आज बेहद विकृत और अर्ध-जीवित रूप में मौजूद हैं, जबकि कई पूरी तरह गायब हो चुके हैं। अपने स्कूल के दिनों में वेस्ट ने एनीमे के प्रति अपने लगाव को समर्पित एक वेब पेज बनाया था और बाद में कॉलेज के वर्षों का विवरण दर्ज करने के लिए एक ब्लॉग भी संचालित किया। एक वयस्क के रूप में जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उन दोनों की नियति उन्हें विचलित करती है।

वेस्ट ने बताया, “मैं सचमुच अपनी एनीमे साइट को हटाना चाहता था।”

एओएल खाते तक पहुंच खत्म हो जाने की वजह से वे उस पुराने पेज को हटा नहीं सके, और वह आज भी स्पैम विज्ञापनों और काम न करने वाले लिंक्स के साथ एक प्रेत पेज की तरह मौजूद है। कॉलेज ब्लॉग के मामले में, वे अपने लेखन के अंतिम दौर में डोमेन शुल्क चुकाना भूल गए थे, जिसके परिणामस्वरूप उनके पूरे एक साल के पोस्ट हमेशा के लिए नष्ट हो गए। इस अनुभव ने उन्हें इस विचार की ओर खींचा कि जिन चीजों को लोग हमेशा बनाए रखना चाहते हैं वे अक्सर टिक नहीं पातीं, जबकि जिन चीजों को वे मिटाना चाहते हैं वे लंबे समय तक मौजूद रहती हैं।

यह लगातार बदलता डिजिटल परिदृश्य उस स्थायी और निर्दोष सामूहिक स्मृति से कोसों दूर है जिसे उपयोगकर्ता कभी तैयार करने का दावा कर रहे थे। वेस्ट का मानना है कि हमेशा के लिए शब्द का इस्तेमाल इस दुनिया के लिए पूरी तरह गलत है। इंटरनेट पर मौजूद मंच ठीक वैसे ही नश्वर हैं जैसे वहां खुद का प्रचार करने वाले लोग, जिनमें दीर्घायु की चाह रखने वाले बायोहाकर्स भी शामिल हैं। एक समय था जब किसी प्रसिद्ध हस्ती को वर्षों पुराने अशोभनीय पोस्ट सामने आने पर सार्वजनिक आलोचना का सामना करना पड़ता था, लेकिन 2026 में अपने एआई संचालित जीमेल खाते में किसी खास पुराने संदेश को खोज निकालना भी आसान नहीं रह गया है। वाइन जैसे सांस्कृतिक रूप से प्रभावी प्लेटफॉर्म पलक झपकते ही खत्म हो सकते हैं, जिसका प्रमाण जनवरी 2025 में तब दिखा जब अमेरिका में संभावित प्रतिबंध से पहले लोगों ने टिकटॉक पर विदाई संदेशों की झड़ी लगा दी थी।

इस अप्रत्याशित क्षणभंगुरता ने उन सभी संदर्भों और हाइपरलिंक्स के प्रति भरोसे को तोड़ दिया है जो साझा सहमति और साक्ष्यों का आधार बनते थे। द न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट पर 1996 से 2019 के मध्य तक प्रकाशित लेखों में शामिल हाइपरलिंक्स के एक विश्लेषण से सामने आया कि उनमें से 25 प्रतिशत लिंक अब खुलते ही नहीं हैं। इसी तरह वर्ष 2016 के एक अध्ययन के अनुसार शोध पत्रों में दिए गए चार में से तीन उद्धरण अपनी मूल सामग्री से भटक चुके हैं, यानी वे वेबसाइटें अब वह बात नहीं कहतीं जो उद्धृत की गई थी। इसके अलावा एक प्यू रिपोर्ट में पाया गया कि विकिपीडिया के आधे से अधिक प्रविष्टियों के संदर्भ अनुभाग में कम से कम एक ऐसा लिंक जरूर है जो निष्प्रभावी हो चुका है।

सड़ांध से खाद बनने की नई संभावना

एंगेजमेंट और आंकड़ों की इस भूख ने आम उपयोगकर्ताओं की मानसिकता को भी गहराई से प्रभावित किया है। वेस्ट ने गौर किया कि जब उन्होंने मर्लिन रॉबिन्सन के पसंदीदा उपन्यास 'गिलियड' को चौथी या पांचवीं बार पढ़ा, तो उनके मन में यह ख्याल आया कि इस आत्मीय पठन को वे गुडरीड्स के अपने वार्षिक पठन आंकड़ों में नहीं जोड़ पाएंगे। खोखली मान्यताओं और डिजिटल प्रोफाइल के इस तनाव ने ही उस खालीपन को जन्म दिया है जिसे अब गैर-मानवीय बॉट्स द्वारा भरा जा रहा है।

यदि बड़े प्लेटफॉर्म्स द्वारा थोपी गई प्राथमिकताओं को दरकिनार कर दिया जाए, तो इंटरनेट के वे उपेक्षित कोने सामने आते हैं जिन्हें मुख्यधारा से जानबूझकर छिपाया गया था। यूट्यूब पर मौजूद ऐसे वीडियो स्ट्रीम्स जहां शायद ही कोई व्यूज होते हैं, इस बात का प्रमाण हैं कि लोग बिना किसी आर्थिक लाभ के केवल अपनी खुशी और मौज-मस्ती के लिए गाते और जुड़ते हैं। इसके साथ ही बिना किसी राजस्व के वेब पत्रिकाओं में चलने वाला कविताओं का दायरा साबित करता है कि जब तक वित्तीय लालच हावी नहीं होता, तब तक इंटरनेट पर वास्तविक सार्थकता गढ़ी जा सकती है।

मौजूदा स्थिति में इंटरनेट पर बिना किसी बड़े अचानक संकट या तकनीकी तबाही के तुरंत ताला नहीं लगने वाला है। लेकिन इसके चमकते ढांचे में पड़ती दरारें नए और अलग तरह के जैविक स्वरूपों के लिए जगह जरूर बना रही हैं। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वर्तमान तकनीकी साम्राज्यवाद अगली सदी पर भी इसी तरह राज करेगा।

सड़ते हुए इंटरनेट की तुलना कंपोस्ट यानी जैविक खाद से करते हुए वेस्ट रेखांकित करते हैं कि सड़ांध को यदि सही दिशा दी जाए तो वह खाद बन सकती है। यह सवाल अब भी खुला हुआ है कि क्या यह सड़ती हुई डिजिटल व्यवस्था किसी बेहतर और जीवंत तंत्र के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर सकेगी, या फिर यह पूरी तरह बंजर होकर बिखर जाएगी।

सवाल-जवाब

डेड इंटरनेट थ्योरी क्या है?
यह एक अवधारणा है जिसके अनुसार इंटरनेट पर अधिकांश बातचीत और ट्रैफिक इंसानों के बजाय स्वचालित बॉट्स द्वारा संचालित होता है।
वर्ष 2025 में बॉट ट्रैफिक में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई?
एक साइबर सुरक्षा फर्म के अनुसार वर्ष 2025 के दौरान स्वचालित एजेंटों के ट्रैफिक में 8,000 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई।
हाइपरलिंक के विलोपन पर अध्ययनों में क्या पाया गया है?
द न्यूयॉर्क टाइम्स के 1996 से 2019 के 25 प्रतिशत लिंक बंद हो चुके हैं, और शोध पत्रों के 75 प्रतिशत संदर्भ अपनी मूल सामग्री से बदल चुके हैं।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने किसे वर्ष का शब्द चुना था?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने 'रेज बैट' को वर्ष का शब्द घोषित किया, जिसका इस्तेमाल एक वर्ष में तीन गुना बढ़ गया था।
इंटरनेट के बुनियादी ढांचे की कमजोरी का क्या उदाहरण सामने आया था?
वर्ष 2001 में बाल्टीमोर की सुरंग में ट्रेन दुर्घटना के कारण फाइबर केबल कटने से पूरे अमेरिका में इंटरनेट की गति धीमी हो गई थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp