भारत निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक तंत्र के भीतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और डेटाबेस प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में शामिल दो निर्वाचन आयुक्तों ने दस महीनों के दौरान मतदाता पंजीकरण, नियमों और तकनीकी बदलावों से जुड़े मामलों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप में अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इनमें से चार महत्वपूर्ण आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गईं। इन आपत्तियों में मुख्य रूप से मतदाता पहचान से जुड़े फॉर्म 6 में बिना नियम संशोधन किए नया कॉलम जोड़ना, मतदाता डेटाबेस का केंद्रीयकरण और फील्ड अफसरों के तकनीकी अधिकार सीमित करना शामिल रहा है। हालांकि निर्वाचन आयोग का आधिकारिक रुख यह है कि किसी बहुसदस्यीय संस्था में आंतरिक विमर्श के दौरान अलग राय आना एक सामान्य प्रक्रिया है और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए थे।
मतदाता सूची पुनरीक्षण और फॉर्म 6 विवाद की मुख्य वजहें
इस पूरे संस्थागत विवाद का मुख्य केंद्र मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और तीन सदस्यीय आयोग के भीतर निर्णय लेने की कार्यप्रणाली है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 मौकों पर अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं। इन आपत्तियों का दायरा काफी व्यापक था, जिसमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, नामों को हटाना तथा दोबारा जोड़ना, फॉर्म 6 के कानूनी प्रारूप में बदलाव, मतदाता सूची का डेटा और इस पूरी व्यवस्था को संचालित करने वाला सॉफ्टवेयर शामिल था।
एक बेहद गंभीर मामला फॉर्म 6 से जुड़ा था, जिसका उपयोग पात्र नागरिक नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए करते हैं। जुलाई 2026 में इस ऑनलाइन फॉर्म में एक नया घोषणा पत्र जोड़ा गया। इस कॉलम में आवेदक से अनिवार्य रूप से पूछा गया कि क्या उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में शामिल था। इस सवाल का जवाब दिए बिना कोई भी आवेदक फॉर्म में आगे नहीं बढ़ सकता था। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस बदलाव पर कड़ा ऐतराज जताते हुए दर्ज किया कि वैधानिक फॉर्म 6 में आवश्यक नियमों में संशोधन किए बिना कोई फेरबदल नहीं किया जा सकता। बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया। संधु ने आगे चलकर इस बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी करार दिया और इसे तत्काल हटाने की मांग रखी।
डेटाबेस का केंद्रीयकरण और राज्यों में तकनीकी गड़बड़ियों के उदाहरण
दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीयकरण को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताईं। उन्होंने इस बात पर सवाल खड़े किए कि राज्य और जमीनी स्तर पर तैनात चुनाव अधिकारियों की पहुंच इस सिस्टम तक क्यों सीमित की जा रही है। मतदाता रिकॉर्ड को प्रबंधित करने वाली नई तकनीक और सॉफ्टवेयर से जुड़े बदलावों पर भी आयोग के भीतर तीखी चर्चा हुई।
तकनीकी बदलावों के जमीनी असर के तौर पर गोवा का मामला सामने आया। गोवा में सॉफ्टवेयर से जुड़ी एक खामी के कारण 97 पात्र मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल होने से वंचित रह गए, क्योंकि स्थानीय अधिकारी निर्धारित समय सीमा खत्म होने से पहले सॉफ्टवेयर में संशोधन दर्ज करने में विफल रहे थे। इसी तरह पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नामों से जुड़ी अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया पर भी आंतरिक स्तर पर गंभीर मतभेद सामने आए। इन सभी गंभीर असहमतियों के बीच, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने 9 सितंबर को चार महीने बाद अपनी पहली पूर्ण बैठक आयोजित की। आयोग ने इस धारणा को पूरी तरह खारिज किया कि इन आपत्तियों से संस्था में कोई विभाजन हुआ है। निर्वाचन आयोग का कहना है कि लिखित टिप्पणियां और अलग विचार आंतरिक चर्चा का स्वाभाविक हिस्सा हैं और आयोग के सभी निर्णय अंततः सर्वसम्मति से ही अमल में आए।
तीन सदस्यीय आयोग में निर्णय लेने का कानूनी अधिकार और नियम
मुख्य निर्वाचन आयुक्त यानी सीईसी निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष जरूर होते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वे अन्य दो चुनाव आयुक्तों के बहुमत के फैसले को खारिज या दरकिनार कर सकते हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम 2023 की धारा 18 के अनुसार, आयोग को यथासंभव अपने सभी निर्णय सर्वसम्मति से लेने चाहिए। यदि सदस्यों के बीच किसी विषय पर असहमति होती है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर तय किया जाता है।
यदि तीनों सदस्य किसी फैसले पर एकमत हैं, तो निर्णय सर्वसम्मत माना जाता है। यदि दो सदस्य एक तरफ हैं और एक सदस्य असहमत है, तो दो सदस्यों का बहुमत ही आयोग का आधिकारिक फैसला बन जाता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त होने के नाते किसी व्यक्ति को अलग से वीटो का अधिकार प्राप्त नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1995 के प्रसिद्ध टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में भी मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की शक्तियों पर विस्तार से व्याख्या की थी। अदालत ने बहुसदस्यीय ढांचे को बरकरार रखते हुए इस दलील को साफ तौर पर खारिज कर दिया था कि अन्य चुनाव आयुक्त केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के सलाहकार मात्र हैं। हालांकि, दर्ज की गई 14 आपत्तियों के संबंध में राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने रेखांकित किया कि सबसे अहम सवाल यह है कि इन 14 मामलों में से कितने उदाहरणों में सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी दोनों ने मिलकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के रुख से असहमति जताई थी, क्योंकि किसी एक आयुक्त की असहमति का मतलब पूरे आयोग का विरोध नहीं होता।
गंभीर मतभेद के बावजूद सार्वजनिक मंचों पर साथ दिखने का अर्थ
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी उठाया कि यदि दोनों चुनाव आयुक्तों को लिए जा रहे प्रशासनिक और तकनीकी फैसलों पर इतनी गंभीर आपत्तियां थीं, तो वे लगातार मुख्य निर्वाचन आयुक्त के साथ सार्वजनिक बैठकों और प्रेस सम्मेलनों में क्यों शामिल होते रहे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 7 अगस्त 2025 को पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वोट चोरी के आरोप लगाए थे और आरोप लगाया था कि सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त को कानून से ऊपर रख दिया है। इसके दस दिन बाद 17 अगस्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मीडिया को संबोधित किया और इन आरोपों का जवाब देते हुए आयोग का बचाव किया। उस समय चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी भी मंच पर उपस्थित थे।
सार्वजनिक कार्यक्रमों में उपस्थिति यह साबित नहीं करती कि दोनों आयुक्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त के हर एक बयान से पूरी तरह सहमत थे। न ही एक साथ दिखने से आंतरिक असहमति खत्म मानी जा सकती है। एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था आंतरिक स्तर पर गहरे मतभेद रख सकती है, जबकि बाहर जनता के सामने एक संस्थागत और संगठित चेहरा पेश करती है। यही सिलसिला वर्ष 2026 में भी जारी रहा। 22 जनवरी को ईसीआईनेट के शुभारंभ के बाद, जब मतदाता सूची प्रक्रियाओं पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की जा रही थीं, तब भी तीनों आयुक्त सार्वजनिक कार्यक्रमों में एक साथ नजर आए। वे मार्च के कार्यक्रमों में भी साथ दिखे, जिसमें 10 मार्च की प्रेस वार्ता और 15 मार्च को घोषित विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम शामिल था।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का नजरिया और प्रक्रिया का महत्व
संस्थागत प्रक्रियाओं के पालन पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी अपनी राय दी है। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत ने फॉर्म 6 से जुड़े मतभेदों को अत्यंत गंभीर बताया। उनका कहना था कि किसी भी वैधानिक फॉर्म के स्वरूप में बदलाव उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं किया जाना चाहिए।
इसी तरह पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी.एस. कृष्णमूर्ति ने भी कहा है कि आयोग के भीतर मतभेद होना सामान्य है और जब सदस्यों की राय बंटी हो, तो बहुमत का निर्णय ही वैध माना जाता है। वहीं पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने इस बात पर जोर दिया है कि आयोग के फैसलों में इस बात की स्पष्ट पारदर्शिता होनी चाहिए कि कौन सा निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया और कौन सा बहुमत के जरिए तय हुआ।
विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मांगें
आयोग के भीतर सामने आई इन आपत्तियों के बाद विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधे तौर पर निशाना साधा। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए और कुमार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।
विपक्ष के कई नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग उठाई, जबकि अन्य नेताओं ने विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान लिए गए विवादास्पद फैसलों और दर्ज आपत्तियों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी तक की मांग कर डाली। दूसरी ओर, सीजेपी जैसे नागरिक अधिकार संगठन ने भी निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और निष्पक्षता पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
संविधान के अनुच्छेद 324 से मिली असीम ताकत और न्यायिक सीमाएं
भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत की गई थी। अनुच्छेद 324 आयोग को संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का व्यापक अधिकार प्रदान करता है। संविधान आयोग को मतदाता सूचियां तैयार कराने की भी जिम्मेदारी सौंपता है।
शुरुआत में निर्वाचन आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद होता था। आयोग की भूमिका और उसका असर 1990 के दशक में तब अधिक मुखर हुआ, जब टी.एन. शेषन ने दिसंबर 1990 से दिसंबर 1996 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्य किया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, शेषन के कार्यकाल में आदर्श आचार संहिता को बेहद कड़ाई से लागू किया गया और चुनाव पर्यवेक्षकों की भूमिका में बड़ा इजाफा हुआ। इसके अलावा निर्वाचन प्रतीक आरक्षण और आवंटन आदेश 1968 जैसे चुनावी कानूनों ने राजनीतिक दलों की मान्यता और चुनाव चिन्ह आवंटन का अधिकार आयोग को दिया। हालांकि, 1995 के टी.एन. शेषन मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि अनुच्छेद 324 के तहत मिली संवैधानिक स्थिति आयोग को सरकारी प्रशासन के हर पहलू पर असीमित नियंत्रण नहीं देती।
संवैधानिक फैसलों की कानूनी समीक्षा और अदालती दखल
यद्यपि निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है, फिर भी उसके कार्य और निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं हैं। संसद चुनावों से जुड़े कानून बनाती है और आयोग संविधान और उन्हीं कानूनों के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करता है। जहां भी संवैधानिक उल्लंघन दिखता है, अदालतें आयोग के फैसलों की वैधता की जांच कर सकती हैं।
वर्तमान में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखा जा सकता है। उच्चतम न्यायालय पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन और मतदाताओं के दावों व आपत्तियों के निपटारे से जुड़े मामलों पर सुनवाई कर रहा है। निर्वाचन आयोग ने स्वयं शीर्ष अदालत को सूचित किया कि पश्चिम बंगाल में 38.31 लाख अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें 22 लाख से अधिक अपीलें मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने या बहाल करने से संबंधित थीं। किसी भी सामान्य मतदाता के लिए चुनावी कानूनों के तहत निर्धारित अधिकारियों के समक्ष अपील करने का वैधानिक रास्ता खुला रहता है, जबकि आयोग के व्यापक प्रशासनिक और कानूनी फैसलों की वैधता को न्यायपालिका में चुनौती दी जा सकती है।



















