संसद के मानसून सत्र के दौरान पेपर लीक विरोधी विधेयक पर चर्चा के समय लोकसभा में एक अनोखा भाषाई नजारा देखने को मिला। 56 साल की औसत उम्र वाले सांसदों के भाषणों में युवाओं की बोलचाल यानी जन-जी स्लैंग की गूंज सुनाई दी। संसद की कार्यवाही में एमआईए, फोमो, डेलूलू, वास्तेगुणा-हुइया, कुचू-पुचू और क्लॉकड इट जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल किया गया। आमतौर पर 14 से 29 साल के युवाओं द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस्तेमाल किए जाने वाले ये शब्द संसद में उस समय गूंजे, जब राजनेता युवाओं के मुद्दों पर अपनी बात रख रहे थे।
मानसून सत्र की चर्चा में छाए युवाओं के ये 6 खास शब्द
पेपर लीक से जुड़ी बहस के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपने विरोधियों पर हमला बोलने और सरकारी नीतियों को सही ठहराने के लिए इंटरनेट की भाषा का सहारा लिया। शिवसेना के सांसद श्रीकांत शिंदे ने विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को जन-जी की भाषा में समझाते हुए कहा कि विपक्षी नेता 37 दिनों तक जंतर-मंतर नहीं गए, जिससे वे एमआईए हो गए। एमआईए का सैन्य अर्थ 'मिसिंग इन एक्शन' होता है, जो युद्ध के दौरान लापता सैनिकों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, जन-जी इस शब्द का उपयोग उस व्यक्ति के लिए करते हैं जिसके बारे में कोई खबर न हो। इसके साथ ही श्रीकांत शिंदे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर विपक्ष का प्रदर्शन केवल फोमो के कारण हुआ। फोमो का मतलब 'फियर ऑफ मिसिंग आउट' होता है, यानी किसी आयोजन या गतिविधि से छूट जाने का डर। युवाओं के प्रदर्शन को देखकर विपक्ष को लगा कि कहीं वे पीछे न छूट जाएं।
बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने पेपर लीक विधेयक की आलोचना करने पर विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष डेलूलू में रहकर इस विधेयक का विरोध कर रहा है। जन-जी की दुनिया में काल्पनिक या काल्पनिक दुनिया में जीने वाले को डेलूलू कहा जाता है। तेजस्वी सूर्या का तर्क था कि विपक्षी नेता जमीनी हकीकत से दूर रहकर बयानबाजी कर रहे हैं।
कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने संसद में प्रदर्शनकारी छात्रों की आवाज उठाते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवा वास्तेगुणा-हुइया के नारे लगा रहे थे। वास्तेगुणा-हुइया एक ऐसा शब्द है जिसका कोई शाब्दिक अर्थ नहीं है। यह सड़क पर किसी को चिढ़ाने के लिए बोले गए एक वीडियो से वायरल हुआ था, जिसे बाद में युवाओं ने अपने आंदोलन का हिस्सा बना लिया। इसके अलावा दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि प्रदर्शनकारी छात्र प्यार से सरकार से इस्तीफा मांगते हुए कुचू-पुचू कह रहे थे और कह रहे थे कि आज हमारा जन्मदिन है, इसलिए इस्तीफा दे दीजिए। कुचू-पुचू भी बच्चों या किसी प्रिय व्यक्ति को प्यार से पुकारने वाला एक बेमतलब शब्द है।
बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने सरकार की नीतियों की तारीफ करते हुए क्लॉकड इट शब्द का इस्तेमाल किया। बांसुरी स्वराज ने कहा कि जहां यूपीए सरकार ने परीक्षा प्रणाली में एक नीतिगत शून्यता पैदा की थी, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या को क्लॉकड इट किया और इसका एक मजबूत कानूनी समाधान दिया। जन-जी की भाषा में क्लॉकड इट का मतलब किसी छिपे हुए तथ्य या सच्चाई को पहचानना और सामने लाना होता है।
सोशल मीडिया से संसद के गलियारों तक कैसे पहुंचे ये शब्द
इंस्टाग्राम और स्नैपचैट की भाषा का संसद तक पहुंचना भारतीय राजनीति में आ रहे बड़े बदलावों की ओर इशारा करता है। इसके पीछे 3 प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण कॉकरोच जनता पार्टी का बेहद सफल सोशल मीडिया आंदोलन है। 16 मई को बने कॉकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम अकाउंट ने महज 90 घंटों के भीतर बीजेपी और कांग्रेस जैसे बड़े दलों से भी ज्यादा फॉलोअर्स हासिल कर लिए थे। वर्तमान में इसके 2.6 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हैं। कॉकरोच जनता पार्टी का पूरा संवाद, मीम्स और कैप्शंस जन-जी की भाषा में थे, जिससे देश के युवा बड़ी संख्या में इससे जुड़े। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई में कई युवा छात्र घायल हो गए थे, जिसके बाद विपक्ष खुलकर उनके समर्थन में आ गया। सरकार पर दबाव बढ़ा तो पेपर लीक मामले में कई त्वरित फैसले लिए गए। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भले ही आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन जन-जी की भाषा और उनके तरीकों की चर्चा संसद में बनी रही।
दूसरा कारण बड़े नेताओं का डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय होना है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक सेल्फी वीडियो जारी किया था, जिसे युवाओं के बीच काफी पसंद किया गया। इसके बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं और युवाओं से सीधे जुड़ रहे हैं।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण 2029 के चुनावों में जन-जी मतदाताओं की निर्णायक भूमिका है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1997 से 2012 के बीच जन्मे जन-जी युवाओं की कुल आबादी 37.7 करोड़ है। वहीं संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के आंकड़ों के मुताबिक, 10 से 24 वर्ष की आयु वाले लोगों की संख्या लगभग 38.2 करोड़ है। हालांकि, 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी 1988 के 38.3 प्रतिशत से घटकर 2024 में 30.1 प्रतिशत रह गई है और 2029 तक इसके 27.8 प्रतिशत होने का अनुमान है। इसके बावजूद, देश में हर चौथा वोटर जन-जी है, जिसे कोई भी राजनीतिक दल नजरअंदाज नहीं कर सकता।
संसद में पहले भी गूंज चुके हैं ऐसे चर्चित संवाद और नारे
संसद में लोकप्रिय संस्कृति के शब्दों या गानों का इस्तेमाल होना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई मौकों पर राजनेताओं ने ऐसे शब्दों का सहारा लिया है
- हाउ इज द जोश: 2019 में आई फिल्म उरी के अभिनेता विक्की कौशल का यह संवाद बेहद लोकप्रिय हुआ था। फरवरी 2019 में वार्षिक बजट पेश करते समय केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में इसका जिक्र किया था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई बड़े नेता अपनी सभाओं में इसका इस्तेमाल करते रहे हैं।
- जय हो: फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में ए. आर. रहमान के ऑस्कर विजेता गाने जय हो का कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के दौरान जमकर इस्तेमाल किया था। आज भी राजनीतिक रैलियों में इसकी धुन अक्सर सुनाई देती है।
- खेला होबे: यह मूल रूप से बांग्लादेश का एक बंगाली शब्द है, जिसे 2013 में अवामी लीग के सांसद शमीम ओसमान ने इस्तेमाल किया था। इसके बाद 2021 में तृणमूल कांग्रेस के नेता देबांग्शु भट्टाचार्य ने इस पर एक गाना बनाकर यूट्यूब पर अपलोड किया जो काफी वायरल हुआ। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने इसे अपना मुख्य नारा बनाया और देखते ही देखते यह नारा संसद से लेकर पूरे देश की राजनीति में छा गया।
संसदीय भाषणों में अपनी भाषा के प्रयोग पर क्या सोचते हैं युवा
नेताओं द्वारा अपनी बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किए जाने पर जन-जी युवाओं की प्रतिक्रिया मिली-जुली और आलोचनात्मक है। युवाओं का मानना है कि नेता उनकी भाषा का गलत संदर्भ में इस्तेमाल कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, युवा डेलूलू शब्द का इस्तेमाल सकारात्मक अर्थ में करते हैं, जैसे डेलूलू इज सोतूलू यानी अपने सपनों को सच करने के लिए सकारात्मक सोच बनाए रखना। लेकिन नेता इसका इस्तेमाल एक-दूसरे को नीचा दिखाने या तंज कसने के लिए कर रहे हैं, जिससे युवा उनसे खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते।
इसके अलावा, युवाओं का कहना है कि सिर्फ उनकी भाषा की नकल करने से नेताओं को उनका समर्थन नहीं मिलेगा। युवाओं का स्पष्ट रूप से मानना है कि नेताओं को भाषा की नकल करने के बजाय अपने काम और नीतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर सरकार युवाओं के लिए बेहतर अवसर, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और रोजगार के नए साधन तैयार करेगी, तो युवा ज्यादा खुश होंगे।



















