भारत की आतंकवाद विरोधी एजेंसी एनआईए द्वारा छह महीने पहले गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक 24 सितंबर की रात तिहार जेल से रिहा होने के तुरंत बाद अमेरिका के लिए रवाना हो गए। उन पर पूर्वोत्तर भारत और म्यांमार की सीमाओं पर आतंकवादी साजिश रचने, उग्रवादियों को हथियार देने और ड्रोन वॉरफेयर का प्रशिक्षण देने के बेहद गंभीर आरोप लगे थे। कड़े गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज होने के बावजूद एक विदेशी नागरिक का इस तरह भारत छोड़कर चले जाना कई कानूनी और रणनीतिक सवाल खड़े कर रहा है।
कौन हैं मैथ्यू वैनडाइक और क्या है उनका पुराना रिकॉर्ड?
वर्ष 1981 में अमेरिका के बाल्टीमोर में जन्मे मैथ्यू वैनडाइक खुद को एक पेशेवर भाड़े का सैनिक (मर्सिनरी) बताते हैं। उनके अपने दावे के अनुसार, वे पैसों के बदले किसी भी देश या संगठन के लिए युद्ध लड़ने को तैयार रहते हैं। मैथ्यू 'सन ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल' (SOLI) नामक एक निजी सैन्य कंपनी के संस्थापक हैं। इसके अलावा वे युद्ध पत्रकारिता और डॉक्यूमेंट्री निर्माण से भी जुड़े रहे हैं और इराक व सीरिया जैसे अशांत देशों में बंदी भी बनाए जा चुके हैं।
पिछले दो दशकों के दौरान मैथ्यू दुनिया के विभिन्न युद्ध क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं। वर्ष 2007 से 2010 के बीच उन्होंने मोटरसाइकिल से उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों की अकेले यात्रा की और एक पत्रकार के रूप में वहां की कवरेज की। इस दौरान इराक में उन्हें कई बार पकड़ा गया, लेकिन वे हर बार बच निकलने में सफल रहे। वर्ष 2011 में लीबिया के गृहयुद्ध के दौरान वे तानाशाह मुअम्मर अल-गद्दाफी के खिलाफ लड़ रहे विद्रोही गुट में शामिल हो गए। गद्दाफी की सेना ने उन्हें बंदी बनाकर लगभग पांच महीने तक एकांत कारावास में रखा, जहां से वे 24 अगस्त 2011 को अन्य कैदियों के साथ जेल तोड़कर भाग निकले।
इसके बाद मैथ्यू सीरिया पहुंचे, जहां उन्होंने सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोह करने वाले समूहों पर 'नॉट एनीमोर: ए स्टोरी ऑफ रिवोल्यूशन' और अपनी यात्रा पर 'पॉइंट एंड शूट' नामक दो फिल्में बनाईं। वर्ष 2014 में जब आतंकवादी संगठन आईएसआईएस ने उनके दो पत्रकार दोस्तों जेम्स फोली और स्टीवन सोटलॉफ का अपहरण कर कैमरे के सामने उनका सिर कलम कर दिया, तो इस घटना ने मैथ्यू को झकझोर दिया। इसके बाद ही उन्होंने अपनी निजी सैन्य कंपनी 'सन ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल' की स्थापना की।
उनकी यह संस्था दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में स्थानीय लोगों को मुफ्त सैन्य प्रशिक्षण देने का दावा करती है। इसके तहत उन्होंने इराक में आईएसआईएस से लड़ने के लिए असीरियन ईसाइयों को प्रशिक्षित किया। वर्ष 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने के बाद वे यूक्रेन पहुंचे और वहां आम नागरिकों से बनी 'टेरिटोरियल डिफेंस फोर्सेस' को युद्ध का प्रशिक्षण दिया।
भारत में गिरफ्तारी और एनआईए के आरोप
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने 13 मार्च को कोलकाता हवाई अड्डे से मैथ्यू वैनडाइक को गिरफ्तार किया था। उसी अभियान के तहत दिल्ली और लखनऊ हवाई अड्डों से छह यूक्रेनी नागरिकों को भी पकड़ा गया था। जांच एजेंसी के अनुसार, ये सभी सातों विदेशी नागरिक वैध टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे।
भारत पहुंचने के बाद इन लोगों ने बिना आवश्यक अनुमति के गुवाहाटी से मिजोरम की ओर यात्रा शुरू की। उल्लेखनीय है कि मिजोरम के अधिकांश हिस्सों में जाने के लिए 'संरक्षित क्षेत्र परमिट' (प्रोटेक्टेड एरिया परमिट) लेना अनिवार्य होता है। इसके बाद वे मिजोरम से सीमा पार करके म्यांमार के 'कैंप विक्टोरिया' पहुंचे, जो चिन नेशनल आर्मी (CNA) का एक प्रमुख सैन्य ठिकाना है। चिन नेशनल आर्मी म्यांमार की सैन्य सरकार (सैन्य जुंटा) के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर रही है और यह भारत-म्यांमार सीमा के पास बेहद सक्रिय है।
एनआईए के शुरुआती आरोपों के मुताबिक, मैथ्यू और उनके यूक्रेनी साथियों ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय विद्रोही गुटों को हथियारों की आपूर्ति की थी। उन्होंने म्यांमार के विद्रोही समूहों को युद्ध में ड्रोन चलाने, उन्हें असेंबल करने, संचालित करने और ड्रोन सिग्नल को जाम करने की तकनीक सिखाई। इसके अलावा इन लोगों पर यूरोप से ड्रोन की एक बड़ी खेप को अवैध रूप से भारत के रास्ते म्यांमार भेजने का भी आरोप है। 16 मार्च को अदालत में एनआईए ने दावा किया था कि इन सभी आरोपियों ने पूर्वोत्तर में उग्रवादी गतिविधियों में मदद करने की बात स्वीकार की है।
कानूनी पेंच: यूएपीए से इमिग्रेशन एक्ट तक का सफर
गिरफ्तारी के वक्त एनआईए ने इन आरोपियों के खिलाफ यूएपीए की धारा 18 के तहत मामला दर्ज किया था, जो आतंकवादी साजिश, प्रयास, सहायता और उकसावे से संबंधित है। यूएपीए के कड़े प्रावधानों के तहत किसी भी आरोपी के खिलाफ जांच पूरी करके 180 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करना अनिवार्य होता है। मैथ्यू के मामले में यह समयावधि 8 सितंबर को समाप्त हो रही थी।
एनआईए ने 8 सितंबर को अदालत में चार्जशीट तो दाखिल की, लेकिन उसमें यूएपीए की धाराओं के बजाय 'इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025' की धारा 21 और 23 को शामिल किया। धारा 21 बिना वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेजों के भारत में प्रवेश करने से संबंधित है, जबकि धारा 23 वीजा अवधि समाप्त होने के बाद रहने या वीजा नियमों के उल्लंघन से जुड़ी है। एनआईए ने तर्क दिया कि यूएपीए के तहत अपराध साबित करने के लिए जांच अभी जारी है और उसे और अधिक समय की आवश्यकता है।
इसी कानूनी बिंदु ने आरोपियों को अदालत से राहत पाने का रास्ता दे दिया। कानून के अनुसार, यूएपीए की धारा 43(D)(5) के तहत सामान्य परिस्थितियों में जमानत पाना बेहद मुश्किल होता है। लेकिन यदि जांच एजेंसी 180 दिनों के भीतर पर्याप्त साक्ष्यों के साथ मुख्य धाराओं में चार्जशीट दाखिल करने में विफल रहती है, तो आरोपी डिफॉल्ट जमानत का हकदार हो जाता है।
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष एनआईए न्यायाधीश प्रशांत शर्मा ने टिप्पणी की कि चूंकि यूएपीए के तहत जांच अधूरी है और एनआईए ने एक अपूर्ण चार्जशीट दाखिल की है, इसलिए आरोपी मैथ्यू को डिफॉल्ट जमानत से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके बाद 18 सितंबर को अदालत ने मैथ्यू को 1 लाख रुपये के मुचलके और जमानतदार की शर्त पर जमानत दे दी, हालांकि उन्हें दिल्ली में ही रहने का निर्देश दिया गया था।
इसी बीच, विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) ने प्रत्येक आरोपी पर 5.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाकर इमिग्रेशन कानून के तहत उनके मामले का निपटारा कर दिया। 23 सितंबर को अदालत ने छह यूक्रेनी नागरिकों को भी 1 लाख रुपये के नकद मुचलके पर डिफॉल्ट जमानत दे दी। इसके साथ ही मैथ्यू की जमानत शर्तों में संशोधन करते हुए जमानतदार की शर्त हटा दी गई और उन्हें केवल नकद मुचलका जमा करने की अनुमति दी गई, क्योंकि भारत में उनका कोई ऐसा परिचित नहीं था जो उनकी ज़मानत ले सके।
24 सितंबर को अदालत ने सभी आरोपियों को अपने गृह देश जाने की अनुमति दे दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। एनआईए ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि फिलहाल आरोपियों की तुरंत उपस्थिति आवश्यक नहीं है।
विदेश जाने के लिए तय की गई कड़ी शर्तें
अदालत ने मैथ्यू और अन्य आरोपियों को स्वदेश लौटने की अनुमति देते हुए कुछ विशिष्ट शर्तें भी लागू की हैं
- भारत छोड़ने से पहले आरोपियों को 24 घंटे के भीतर अपना विदेशी पता, फोन नंबर और ईमेल आईडी एनआईए को देना होगा।
- सभी आरोपियों को एक महीने के भीतर अनिवार्य रूप से भारत वापस लौटना होगा।
- भारत लौटने के 72 घंटे के भीतर अदालत को सूचित करना होगा।
- आरोपियों को एनआईए की जांच में पूरा सहयोग करना होगा और समन भेजे जाने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा।
इन अदालती आदेशों के बाद मैथ्यू और छह अन्य आरोपी 24 सितंबर की रात तिहार जेल से रिहा होकर अपने देश रवाना हो गए।
मामले पर गरमाई राजनीति और कूटनीतिक सवाल
इस पूरे मामले पर भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्षी दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 23 से 26 मई के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा के समय अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी के सामने मैथ्यू वैनडाइक का मुद्दा उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी दबाव के कारण ही आरोपी को इतनी आसानी से राहत मिल गई। उन्होंने सवाल उठाया कि इन विदेशी संदिग्धों को भारत का वीजा कैसे मिला और वे बिना रोक-टोक पूर्वोत्तर से म्यांमार तक कैसे चले गए?
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि सर्जियो गोर ही यह तय करते हैं कि किसे यूएपीए के तहत आरोपी बनाया जाए और किसे नहीं। उन्होंने कहा कि भारत के आम नागरिक बिना किसी मजबूत कूटनीतिक मदद के यूएपीए के तहत वर्षों तक जेलों में बंद रहते हैं।
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि भारत सरकार कूटनीतिक और रणनीतिक दबाव में विदेशी नागरिकों या संस्थाओं के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों को अक्सर कमजोर कर देती है या उन्हें वापस ले लेती है।
क्या भारत वापस लौटेंगे मैथ्यू वैनडाइक?
अदालत के आदेश के मुताबिक मैथ्यू और उनके साथियों को एक महीने के भीतर भारत लौटकर अदालत में हाजिरी देनी है। एनआईए की यूएपीए के तहत जांच अभी भी जारी है। यदि जांच एजेंसी को भविष्य में पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो वह पूरक चार्जशीट (सप्लीमेंट्री चार्जशीट) दाखिल कर सकती है, जिसके बाद मैथ्यू पर दोबारा मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
हालांकि, इतिहास को देखते हुए उनके भारत लौटने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। अतीत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब गंभीर आरोपों में घिरे विदेशी नागरिक जमानत मिलने के बाद भारत से चले गए और कभी वापस नहीं आए
- वॉरेन एंडरसन: दिसंबर 1984 के भोपाल गैस हादसे के बाद यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वॉरेन एंडरसन को भारत में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन जमानत मिलने के बाद वे अमेरिका चले गए और कभी भारतीय अदालत का सामना करने वापस नहीं लौटे।
- ओटावियो क्वात्रोची: वर्ष 1986 के बोफोर्स घोटाले में सीबीआई ने इतालवी व्यापारी ओटावियो क्वात्रोची को आरोपी बनाया था। वे 1993 में भारत छोड़कर चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए।
- इतालवी मरीन मामला: फरवरी 2012 में केरल तट के पास 'एनरिका लेक्सी' नामक इतालवी तेल टैंकर पर सवार दो इतालवी नौसैनिकों ने दो भारतीय मछुआरों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। भारत में गिरफ्तार होने के बाद उन्हें इटली जाने की अनुमति मिली, जिसके बाद वे भारत वापस नहीं आए।
यद्यपि ये पुराने मामले मैथ्यू के भविष्य के कदम की गारंटी नहीं देते, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मैथ्यू तय समय सीमा के भीतर भारत वापस नहीं लौटते हैं, तो अदालत उनकी जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी कर सकती है। इसके अलावा, भारत सरकार भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि के तहत उनके प्रत्यर्पण की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू कर सकती है।




















