हीर सारा फिल्म रिव्यू: सड़कों पर रफ्तार भरती कहानी, मगर दिल में उतरने से रह गई फिल्ममूवी रिव्यू
13 घंटे पहले· 2

हीर सारा फिल्म रिव्यू: सड़कों पर रफ्तार भरती कहानी, मगर दिल में उतरने से रह गई फिल्म

इंदौर से पोंडिचेरी तक की रोड ट्रिप पर निकलीं दो बिल्कुल अलग मिजाज की लड़कियों की कहानी, जिसमें पत्रलेखा और मानवी गागरू की अदाकारी जान फूंकती है, लेकिन निर्देशन गहराई में उतरने से चूक जाता है।

परदे की दुनिया में ‘रोड ट्रिप’ महज एक सफर का नाम नहीं, बल्कि खुद से रूबरू होने का बहाना होता है। जब कोई शख्स गाड़ी की चाबी घुमाकर हाईवे की तरफ बढ़ता है, तो वह सिर्फ किलोमीटर नहीं नापता, बल्कि अपने भीतर छिपे किसी जख्म या किसी अधूरी हसरत का पीछा कर रहा होता है। लेखक और निर्देशक कार्तिक चौधरी की फिल्म ‘हीर सारा’ भी इसी वादे के साथ परदे पर अपनी जगह बनाती है। इसमें दो एकदम जुदा मिजाज की लड़कियां (पत्रलेखा-मानवी गागरू) हैं, एक वजनदार बुलेट मोटरसाइकिल है और इंदौर से पोंडिचेरी तक फैली खुली सड़कें हैं। सफर में मनोरंजन के सारे गियर मौजूद हैं, मगर अफसोस कि फिल्म अपनी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही न्यूट्रल पर आ जाती है।

कार्तिक चौधरी ने कहानी का जो ताना-बाना बुना है, उसमें नयापन नहीं है। शुरुआत थोड़ी ढीली है, जहां किरदारों के ‘इमोशनल बैगेज’ को समझाने में जरूरत से ज्यादा समय खर्च कर दिया गया है। लेकिन जैसे ही बुलेट हाईवे पर सरपट दौड़ती है, फिल्म की चाल भी गियर बदल लेती है। फिल्म सिर्फ टाइमपास भर नहीं करती, बल्कि उन नजरों पर भी कटाक्ष करती है जो हाईवे पर अकेली लड़की को भारी बाइक चलाते देख अजीब कयास लगाने लगती हैं। समाज लड़कियों पर ‘सलीके’ से रहने और समय पर शादी कर लेने का जो पुराना प्रेशर कुकर थोपता है, उसकी सीटी भी फिल्म में रुक-रुककर बजती रहती है। दिक्कत बस यह है कि निर्देशक इन गंभीर मुद्दों को छूकर आगे बढ़ जाते हैं, उनकी तह तक उतरने का जोखिम नहीं उठाते। रोड ट्रिप फिल्मों की असली जान उनकी अनप्रेडिक्टेबिलिटी होती है, मगर यहां कहानी इतनी सीधी सड़क पर चलती है कि आप पॉपकॉर्न चबाते हुए ही अंदाजा लगा लेते हैं कि अगले टोल नाके पर क्या होने वाला है। जब सब कुछ पहले से तय-सा लगने लगे, तो सफर का रोमांच आधा रह जाता है।

पत्रलेखा का ठहराव, मानवी का स्पार्क

अगर किसी चीज ने फिल्म को बिखरने से बचाया है, तो वह है इसकी दोनों मुख्य अभिनेत्रियों की जुगलबंदी। पत्रलेखा ने सारा के किरदार में गजब का ठहराव और दर्द उतारा है। उनकी आंखों में मां को ढूंढने की बेचैनी साफ झलकती है। एक ऐसी लड़की जो अपनी ‘सोलो राइडिंग कंपनी’ खोलना चाहती है, उसकी जिद को पत्रलेखा ने बिना किसी शोर-शराबे के परदे पर उतारा है। दूसरी ओर, मानवी गागरू इस सफर में ‘एनर्जी ड्रिंक’ की तरह काम करती हैं। जब-जब फिल्म अपनी सुस्त रफ्तार से बोर करने लगती है, मानवी अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग और बेबाक संवादों से परदे पर जान फूंक देती हैं। उनका यह बेफिक्र अंदाज कई जगह इम्तियाज अली की ‘जब वी मेट’ की ‘गीत’ जैसी वाइब्स देता है। बाकी सहायक किरदारों के हिस्से कुछ खास करने को नहीं था, इसलिए वे महज फ्रेम भरने के काम आए हैं।

फिल्म का निर्देशन कार्तिक चौधरी ने किया है।

फिल्म की कहानी दो ऐसी लड़कियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो अपनी-अपनी जिंदगी की उलझी डोर सुलझाने के लिए एक अनजाने सफर पर निकलती हैं। सारा (पत्रलेखा) इंदौर में अपने पिता (आरिफ जकारिया) के साथ रहती है। दोनों के बीच एक अजीब-सी खामोशी और फासला पसरा हुआ है। सारा के मन में बचपन का एक ऐसा जख्म है जो आज भी हरा है। जब वह महज दस साल की थी, तभी उसकी मां (श्वेता साल्वे) उसे छोड़कर चली गई थी। सारा को अपनी मां की यादों का सहारा सिर्फ उस पुरानी मोटरसाइकिल में मिलता है, जिसे कभी उसकी मां चलाया करती थी। एक दिन सारा को कुछ ऐसे सुराग हाथ लगते हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि उसकी मां पोंडिचेरी में हो सकती है। वह बिना ज्यादा सोचे अपनी मां की बाइक उठाती है और इंदौर से पोंडिचेरी के लंबे सफर पर निकल पड़ती है।

इस सफर की शुरुआत में ही सारा की मुलाकात हीर (मानवी गागरू) से होती है। हीर एक रईस, बिंदास और कुछ चुलबुले मिजाज की लड़की है, जिसमें बड़े शहर की अमीरी का रंग साफ झलकता है। हीर के पोंडिचेरी जाने की वजह बिल्कुल जुदा है। उसे वहां पहुंचकर अपने बॉयफ्रेंड तन्मय (निशांक वर्मा) की शादी रुकवानी है। दो एकदम उलट स्वभाव की अजनबी लड़कियां एक ही मोटरसाइकिल पर सवार होती हैं और यहीं से शुरू होता है ‘हीर-सारा’ का सफर, जो उन्हें न सिर्फ पोंडिचेरी की ओर ले जाता है, बल्कि दोस्ती, हीलिंग और खुद को पहचानने के एक नए रास्ते पर भी ला खड़ा करता है।

सफर ठीकठाक है, बस मंजिल थोड़ी फीकी रह गई

कुल मिलाकर ‘हीर सारा’ एक ऐसी संडे-वॉच फिल्म है, जिसे आप चाय की चुस्कियों के साथ आराम से देख सकते हैं। यह दो लड़कियों की दोस्ती, उनके बीच के अपनेपन और खूबसूरत रास्तों की एक प्यारी-सी रील है। पत्रलेखा और मानवी की अदाकारी आपका दिल जीत लेगी, लेकिन अगर आप इस सफर से किसी बहुत बड़े लाइफ-चेंजिंग अनुभव या गहरे इमोशन की उम्मीद बांधे बैठे हैं, तो शायद पोंडिचेरी पहुंचते-पहुंचते आपको हल्का खालीपन महसूस होगा। यानी सफर तो ठीकठाक है, बस मंजिल थोड़ी फीकी रह गई।

ट्रेंडकिया रिवॉर्ड्स

खबरें पढ़ें, असली रिवॉर्ड कमाएँ

हर लेख पढ़ने पर पॉइंट्स — ₹10,000 तक के गिफ्ट रिडीम करें। शामिल होना फ्री है।

फ्री रजिस्टर करें और कमाना शुरू करें
250मोबाइल रिचार्ज
12,500 · ≈ 12,500 रीड्स
कमाना शुरू करें
500गिफ्ट वाउचर
25,000 · ≈ 25,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
1,000गिफ्ट कार्ड
50,000 · ≈ 50,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
2,000गिफ्ट कार्ड
1,00,000 · ≈ 1,00,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
3,000शॉपिंग वाउचर
1,50,000 · ≈ 1,50,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
5,000कैश / UPI
2,50,000 · ≈ 2,50,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
प्रीमियम7,500कैश / UPI
3,75,000 · ≈ 3,75,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
प्रीमियम10,000कैश / UPI
5,00,000 · ≈ 5,00,000 रीड्स
कमाना शुरू करें
प्रीमियम15,000मेगा कैश
7,50,000 · ≈ 7,50,000 रीड्स
कमाना शुरू करें

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

नागरिक पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
नागरिक पत्रकारनागरिक पत्रकार
नागरिक पत्रकार
नागरिक पत्रकार