प्रयोगशालाओं की पेट्री डिश में विकसित किए जा रहे कुछ मिलियन न्यूरॉन्स वाले जैविक ऊतक अब केवल चिकित्सा अनुसंधान तक सीमित नहीं रहे हैं। मानव मस्तिष्क के इन छोटे नमूनों को वैज्ञानिक ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स कहते हैं। जब इन सूक्ष्म संरचनाओं को आठ महीनों तक ठीक 98.6 डिग्री फ़ारेनहाइट के तापमान पर सहेजा जाता है, तो वे वैसी ही लयबद्ध विद्युत तरंगें उत्पन्न करने लगते हैं जैसी किसी समय से पहले जन्मे नवजात शिशु के मस्तिष्क में दर्ज की जाती हैं। मौजूदा समय में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की दुनिया में बड़े लैंग्वेज मॉडल्स और भारी सिलिकॉन कंप्यूटिंग का बोलबाला है, वहीं जीव विज्ञान से जुड़े शोधकर्ता सीधे बुद्धिमत्ता के जैविक स्रोत की ओर रुख कर रहे हैं। वे जीवित तंत्रिका कोशिकाओं को संवर्धित कर रहे हैं और उन्हें विद्युत संकेतों तथा डोपामाइन की मदद से प्रोग्राम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
जीवित कोशिकाओं से उभरती सोच और नेटवर्क
मानव मस्तिष्क की कोशिकाएं चाहे खोपड़ी के भीतर हों या कांच की किसी डिश में, उनका सबसे बुनियादी स्वभाव आपस में संपर्क स्थापित करना है। जब अलग-थलग न्यूरॉन्स को एक साथ लाया जाता है, तो वे तेजी से संख्या बढ़ाते हैं और आपस में जुड़कर स्वायत्त ऊतकीय संरचना का रूप ले लेते हैं। उनके धागे जैसे सिरे, जिन्हें एक्सॉन कहा जाता है, विद्युत आवेगों को एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचाने के लिए एक-दूसरे की ओर खिंचते चले जाते हैं। इन्हीं विद्युत तरंगों और कोशिकाओं के संवाद से किसी भी मस्तिष्क में विचार का निर्माण होता है। जीवित कोशिकाओं का यह स्वाभाविक गुण ही उन्हें एक दूसरे के साथ मिलकर खुद को व्यवस्थित करने की ताकत देता है।
सैन डिएगो स्थित सैनफोर्ड स्टेम सेल इंस्टीट्यूट में विकासात्मक जीवविज्ञानी एलिसन मुओत्री और उनकी टीम हजारों की संख्या में ऐसे ही ऑर्गेनॉइड्स तैयार कर रहे हैं। उनका मानना है कि इन कोशिकाओं को किसी भी वातावरण में रखा जाए, वे सबसे पहले संपर्क स्थापित करने की कोशिश करती हैं। वे डिश की सतह से जुड़ती हैं, इलेक्ट्रोड से जुड़ती हैं और अंततः आपस में सघन ताना-बाना बुन लेती हैं। मुओत्री की प्रयोगशाला ने पिछले एक दशक के दौरान इस तकनीक को बेहद अनोखे क्षेत्रों तक पहुंचाया है। प्राचीन मानव प्रजातियों के जीवाश्म रिकॉर्ड से जेनेटिक सामग्री हासिल कर नियंडरथल जैसे ऑर्गेनॉइड्स बनाए गए हैं। इसके अलावा अंतरिक्ष में जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग पर कॉस्मिक रेडिएशन के असर को समझने के लिए इन ऑर्गेनॉइड्स को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक भी भेजा गया है।
ऑटिज्म की गुत्थी सुलझाने की कोशिश
मुओत्री के लिए यह अध्ययन एक व्यक्तिगत मिशन भी है। उनका 18 वर्षीय बेटा ऑटिस्टिक है और उसे 24 घंटे निरंतर देखभाल की जरूरत होती है। मुओत्री ऑटिस्टिक डोनर्स और अपने बेटे की कोशिकाओं से विकसित ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स के जरिए यह बारीकी से समझने में जुटे हैं कि ऑटिस्टिक बच्चों के न्यूरल विकास की प्रक्रिया सामान्य विकास से कहां और कैसे भिन्न हो जाती है। यह पूरी प्रक्रिया किसी भी तरह से दर्दनाक या जटिल नहीं है। इसके लिए केवल त्वचा के एक छोटे से नमूने की जरूरत होती है, हालांकि बाल, रक्त या दांतों की कोशिकाओं से भी यह काम किया जा सकता है। इन वयस्क कोशिकाओं में विशेष प्रोटीन डालकर उन्हें उनकी शुरुआती भ्रूणीय अवस्था में वापस मोड़ दिया जाता है, जिन्हें इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल्स कहा जाता है।
एक बार इस भ्रूणीय अवस्था में लौटने के बाद, इन स्टेम कोशिकाओं को किसी भी जैविक अंग का रूप दिया जा सकता है। इनसे आंसू बहाने वाली अश्रु ग्रंथियां, धड़कने वाले सूक्ष्म दिल या फिर विद्युत तरंगें पैदा करने वाले मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड्स तैयार हो सकते हैं। गर्भाशय के भीतर इंसानी मस्तिष्क का विकास विज्ञान के लिए हमेशा से एक अनसुलझी पहेली रहा है। पारंपरिक रूप से इसका अधिकांश ज्ञान चूहों पर किए गए प्रयोगों से अनुमान लगाकर हासिल किया गया था। लेकिन ऑर्गेनॉइड्स की बदौलत कोशिकाओं से न्यूरॉन्स और फिर जटिल ऊतक बनने का पूरा सफर अब पारदर्शी कांच के नीचे सीधे देखा जा सकता है। एक डिश में तैरते हुए ऑर्गेनॉइड आकार में चिया बीज जितने और लगभग पांच मिलियन कोशिकाओं वाले होते हैं, जिनमें से करीब 2.5 मिलियन सक्रिय न्यूरॉन्स और बाकी सहायक ग्लियल कोशिकाएं होती हैं। यह आकार लगभग एक मधुमक्खी के मस्तिष्क के बराबर बैठता है।
प्रोग्रामिंग, चेतना और नैतिक सीमाएं
जब इन जीवित न्यूरॉन्स को ग्रेफीन की सुचालक शीट पर रखा जाता है और उन्हें विद्युत संकेत दिए जाते हैं, तो वे इन झटकों पर प्रतिक्रिया करते हैं। वे इन संकेतों को याद रखते हैं और समय बीतने के साथ आने वाले विद्युत आवेगों का पूर्वानुमान भी लगाने लगते हैं। यह क्षमता दर्शाती है कि जीवित पदार्थ को भी किसी कंप्यूटर हार्डवेयर की तरह विद्युत संकेतों से निर्देशित या प्रोग्राम किया जा सकता है। हालांकि, प्रयोगशाला में इन ऊतकों के साथ काम करते समय चेतना और संवेदनशीलता का सवाल भी उठता है। किसी कांच की नली या डिश में बंद ऊतक के पास बाहरी दुनिया का कोई शारीरिक संवेदी अनुभव नहीं होता।
दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के बीच यह बहस लगातार जारी है कि क्या बिना शरीर या वास्तविक दुनिया के अनुभवों के किसी संरचना में चेतना संभव है। वर्तमान वैज्ञानिक और कानूनी ढांचे में इन सूक्ष्म ऊतकों को लेकर कोई कड़े पशु कल्याण नियम लागू नहीं होते, क्योंकि ये न तो स्वतंत्र जानवर हैं और न ही इंसान। फिर भी जैसे-जैसे इनकी जटिलता बढ़ रही है, सीमाओं को परिभाषित करना कठिन होता जा रहा है। अगर इन्हें किसी दिन मधुमक्खी के स्तर से बढ़ाकर चूहे के मस्तिष्क जितना बड़ा कर दिया जाए, तो इनके नैतिक दर्जे पर नई बहस छिड़ सकती है।
मस्तिष्क कोशिकाओं से बने कंप्यूटर: सीएल-1
मेलबर्न स्थित बायोटेक स्टार्टअप कॉर्टिकल लैब्स इस जैविक क्षमता को सीधे कंप्यूटिंग हार्डवेयर में बदल रहा है। यह कंपनी अपने संस्थापक द्वारा दान की गई स्टेम कोशिकाओं से न्यूरल कल्चर तैयार करती है और उन्हें सीएल-1 नामक स्लीक सफेद जैविक कंप्यूटरों में स्थापित करती है। एक लंबे टोस्टर के आकार की यह मशीन भीतर एक संपूर्ण जीवन रक्षक प्रणाली रखती है, जो लगभग दस लाख न्यूरॉन्स को छह महीने तक जीवित रख सकती है। कंपनी का लक्ष्य न्यूरल कंप्यूटिंग के क्षेत्र में हार्डवेयर और सब-मिलीसेकंड लेटेंसी वाली सेवाएं प्रदान करने वाला प्रमुख मंच बनना है।
कॉर्टिकल लैब्स के मुख्य परिचालन अधिकारी ब्रेट कागन का तर्क है कि आधुनिक एआई जिस अनुकूलनशीलता और कम ऊर्जा खपत की तलाश कर रहा है, वह प्रकृति ने पहले से ही जीव विज्ञान में उपलब्ध कराई है। जैविक प्रणालियां खुद की मरम्मत करने में सक्षम होती हैं, लंबे समय तक चलती हैं और बहुत कम ऊर्जा में जटिल गणनाएं करती हैं। वर्ष 2022 में कागन और उनकी टीम ने एक सिलिकॉन चिप पर न्यूरॉन्स उगाकर उन्हें 1972 के मशहूर अटारी वीडियो गेम पोंग को खेलना सिखाया था। जब न्यूरॉन्स सही फैसला लेते थे, तो उन्हें सुव्यवस्थित विद्युत संकेत दिए जाते थे, और गलत चाल चलने पर उन्हें बेतरतीब विद्युत झटके मिलते थे। न्यूरोवैज्ञानिक कार्ल फ्रिस्टन के सिद्धांत के अनुसार जैविक प्रणालियां अप्रत्याशित झटकों से बचने की कोशिश करती हैं। इसी सिद्धांत के तहत न्यूरॉन्स ने खेल में अपनी गलतियों को सुधारना शुरू कर दिया।
पोंग खेल में इन कोशिकाओं ने वास्तविक समय में अपना प्रदर्शन सुधारा और लगातार 10 सटीक शॉट्स की सफल रैली की। अब ये न्यूरॉन्स और भी आगे बढ़कर डूम जैसे जटिल वीडियो गेम को खेलने का अभ्यास कर रहे हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि चूंकि एक डिश में मौजूद न्यूरॉन्स को वास्तविक दुनिया का सीधा शारीरिक अनुभव नहीं मिलता, इसलिए एक वीडियो गेम उनके लिए उस दुनिया का आभासी विकल्प बन जाता है जिसके साथ वे सक्रिय प्रतिक्रिया चक्र स्थापित करते हैं।
दवा परीक्षण और 95 प्रतिशत असफलता दर का समाधान
जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर अल्टरनेटिव्स टू एनिमल टेस्टिंग से जुड़े टॉक्सिकोलॉजिस्ट थॉमस हार्टुंग और उनकी न्यूरोटॉक्सिकोलॉजिस्ट पत्नी लीना स्मिर्नोवा पिछले एक दशक से अधिक समय से इस दिशा में काम कर रहे हैं। वर्ष 2023 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के साथ मिलकर ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस यानी ओआई नामक एक नए वैज्ञानिक क्षेत्र की घोषणा की थी। हालांकि ऑर्गेनॉइड कंप्यूटिंग एक दीर्घकालिक लक्ष्य है, लेकिन चिकित्सा क्षेत्र में इसका तात्कालिक उपयोग क्रांतिकारी साबित हो रहा है।
मानव क्लिनिकल परीक्षणों में न्यूरोसाइकियाट्रिक दवाओं की असफलता दर लगभग 95 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। डिप्रेशन, अल्जाइमर और मिर्गी जैसी बीमारियों की दवाएं अक्सर प्रयोगशाला में जानवरों पर असरदार दिखती हैं, लेकिन मानव शरीर में विफल हो जाती हैं। पारंपरिक रूप से शोधकर्ता बंदरों जैसे प्राइमेट्स पर परीक्षण करते हैं, जहां एक साथ पांच या छह बंदरों पर ही इलेक्ट्रोड लगाकर प्रयोग संभव हो पाता है। इसके विपरीत, वैज्ञानिक एक ही सिक्स-वेल प्लेट में चार हजार तक इंसानी ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स तैयार कर सकते हैं। यह तकनीक न केवल जानवरों पर निर्भरता घटाती है बल्कि सीधे इंसानी न्यूरॉन्स पर दवा के सीखने और याददाश्त से जुड़े प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने जुलाई 2025 में घोषणा की थी कि वह केवल जानवरों पर आधारित परीक्षणों के लिए दिए जाने वाले अनुदानों को सीमित करेगी और ऑर्गेनॉइड्स जैसे नए दृष्टिकोणों को प्राथमिकता देगी। इसके तुरंत बाद सितंबर में संस्थान ने एक मानकीकृत ऑर्गेनॉइड मॉडलिंग केंद्र स्थापित करने के लिए 87 मिलियन डॉलर के भारी निवेश की घोषणा की। चूंकि ये ऑर्गेनॉइड वयस्क दाताओं की सहमति से ली गई प्लुरिपोटेंट स्टेम कोशिकाओं से बनते हैं, इसलिए इनके साथ 1990 के दशक के भ्रूणीय विवाद या पशु अधिकार से जुड़े कानूनी रोड़े भी नहीं आते।
रक्त वाहिकाओं की कमी और पांच मिलीमीटर की सीमा
मौजूदा समय में ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स के सामने सबसे बड़ी भौतिक सीमा उनकी बनावट की है। बिना रक्त वाहिकाओं के एक निश्चित आकार, लगभग 5 मिलीमीटर, तक पहुंचने के बाद उनके केंद्र तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते, जिससे उनका भीतरी हिस्सा मृत होने लगता है। इस समस्या से पार पाने के लिए जॉन हॉपकिन्स में नैनोटेक्नोलॉजिस्ट डेविड ग्रेसियास कृत्रिम धमनियां विकसित कर रहे हैं, जबकि अन्य शोधकर्ता एंडोथेलियल कोशिकाओं से रक्त वाहिकाओं का नेटवर्क तैयार करने में जुटे हैं। इन सुधारों की बदौलत ऑर्गेनॉइड्स को अब लंबे समय तक जीवित रखा जा रहा है, जिसमें प्रयोगशालाओं में इन्हें तीन साल तक सुरक्षित रखने के कीर्तिमान भी बने हैं।
जैसे-जैसे सिलिकॉन हार्डवेयर और जैविक न्यूरॉन्स के बीच का अंतर कम हो रहा है, यह सवाल और गहरा हो रहा है कि भविष्य की कृत्रिम बुद्धिमत्ता किस दिशा में जाएगी। सिलिकॉन आधारित मॉडल भारी ऊर्जा और कंप्यूटिंग संसाधनों की खपत करते हैं, लेकिन वे कभी भी जैविक लचीलेपन की पूरी बराबरी नहीं कर सकते। दूसरी ओर, जीवित न्यूरॉन्स भले ही धीमी और जटिल प्रक्रिया से गुजरते हों, लेकिन पृथ्वी पर बुद्धिमत्ता का वास्तविक विकास इसी जैविक आधार पर हुआ है। वैज्ञानिक पेट्री डिश में तैरते इन सूक्ष्म न्यूरॉन्स को जोड़कर भविष्य की कंप्यूटिंग और चिकित्सा दोनों को एक नई परिभाषा देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।



















