अमेरिकी प्रशासन और चीनी नेतृत्व के बीच उच्च स्तरीय वार्ताओं के समानांतर दोनों देशों के बीच एक गंभीर कूटनीतिक और सैन्य तनाव भी सामने आ रहा है। वाशिंगटन ने बीजिंग से यह सवाल पूछा है कि क्या वह अपने सुदूर इलाकों में बनी नमक की प्राकृतिक या कृत्रिम गुफाओं के भीतर गुप्त रूप से परमाणु बमों का परीक्षण कर रहा है। दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच हाल के हफ्तों में तीन गुप्त बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया है। यह विषय चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भावी बैठकों के दौरान भी मुख्य चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
अमेरिका के आरोप और 2020 का संदिग्ध भूकंपीय झटका
चीन पर लगे इन आरोपों की नींव लगभग सात साल पहले पड़ी थी। वर्ष 2019 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक विस्तृत आकलन में कहा था कि चीन और रूस कम क्षमता वाले निम्न उपज (लो-यिल्ड) परमाणु परीक्षणों को अंजाम दे रहे हैं। उस रिपोर्ट में विशेष रूप से दावा किया गया था कि चीन ने शिनजियांग प्रांत में स्थित लॉप नूर परमाणु स्थल पर वर्ष 2018 में बड़े पैमाने पर खुदाई का काम शुरू किया था, जो कि बेहद गुप्त परीक्षणों की पूर्व तैयारी प्रतीत होती थी।
इसके बाद 22 जून 2020 को एक ऐसी घटना घटी जिसने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का ध्यान खींचा। कज़ाकिस्तान स्थित एक निगरानी स्टेशन ने महज 12 सेकंड के भीतर 2.75 तीव्रता के दो झटके दर्ज किए। यह निगरानी केंद्र व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (CTBTO) का हिस्सा है, जिसका मुख्य काम दुनिया भर में कहीं भी होने वाले परमाणु विस्फोटों का पता लगाना है। वाशिंगटन का मानना है कि ये झटके लॉप नूर में चीन द्वारा किए गए छोटे परमाणु धमाकों का परिणाम थे।
इस गतिरोध को आगे बढ़ाते हुए 29 अक्टूबर 2025 को डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अन्य देशों के परीक्षण कार्यक्रमों को देखते हुए उन्होंने युद्ध विभाग को अमेरिकी परमाणु हथियारों का परीक्षण तुरंत शुरू करने का निर्देश दिया है। ट्रंप ने कहा कि रूस परीक्षण कर रहा है और चीन भी परीक्षण कर रहा है, इसलिए अमेरिका अकेला ऐसा देश बनकर नहीं रहना चाहता जो परीक्षण न करे। इसके बाद फरवरी 2026 में जेनेवा में अमेरिकी शस्त्र नियंत्रण विभाग के सचिव थॉमस डिनानो ने खुलकर बयान दिया कि अमेरिकी सरकार को पुख्ता जानकारी है कि चीन ने 22 जून 2020 को परमाणु परीक्षण किया था। उन्होंने यह भी कहा कि चीन सैकड़ों टन विस्फोटकों वाले आगामी परीक्षणों की तैयारी में लगा है और इन धमाकों को छिपाने के लिए 'डीकपलिंग' तकनीक का सहारा ले रहा है।
गुफाओं में डीकपलिंग तकनीक कैसे काम करती है?
पारंपरिक परमाणु परीक्षण आमतौर पर सीधी भूमिगत सुरंगों में किए जाते थे, जिससे पैदा होने वाली शक्तिशाली भूकंपीय तरंगें दुनिया भर के निगरानी केंद्रों में तुरंत पकड़ में आ जाती थीं। इसके विपरीत, डीकपलिंग एक ऐसी वैज्ञानिक विधि है जो धमाके से उत्पन्न ऊर्जा और उसकी भूकंपीय तरंगों की तीव्रता को दबा देती है।
इस तकनीक में परमाणु उपकरण को किसी सीधी सुरंग में फोड़ने के बजाय जमीन के काफी नीचे खोदे गए एक विशाल खाली स्थान या गुफा के ठीक बीच में रखा जाता है। जब इस तरह की गुफा नमक की चट्टानों (साल्ट रॉक) को काटकर बनाई जाती है, तो इसका असर और भी ज्यादा बदल जाता है। नमक की चट्टानें धमाके के झटके और शॉकवेव्स को अपने भीतर ही सोख लेती हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी भारी चीज को सख्त फर्श पर फेंकने के बजाय किसी मोटे गद्दे या तकिए पर फेंका जाए, जिससे उसकी आवाज बाहर बहुत कम आती है।
यदि किसी सामान्य सुरंग में किया गया विस्फोट 10 गुना तेज भूकंपीय संकेत भेजता है, तो वही विस्फोट नमक की गुफा में किए जाने पर बेहद कमजोर तरंगें छोड़ता है। बाहर स्थित निगरानी उपकरणों पर यह किसी मामूली खदान विस्फोट या बहुत हल्के प्राकृतिक भूकंप जैसा प्रतीत होता है। चीन का लॉप नूर क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से एक सूखी हुई नमक की झील पर स्थित है, इसलिए इस क्षेत्र को डीकपलिंग तकनीक के उपयोग के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है।
इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1996 से पहले अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ ने भी इस तकनीक का प्रयोग किया था। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने 3 दिसंबर 1966 को मिसिसिपी के टैटम साल्ट डोम में 'स्टर्लिंग' नाम से एक परमाणु परीक्षण इसी डीकपलिंग विधि से सफलतापूर्वक अंजाम दिया था।
साक्ष्य, उपग्रह तस्वीरें और चीन का रुख
अमेरिकी प्रशासन का दावा 22 जून 2020 को कज़ाकिस्तान के स्टेशन द्वारा रिकॉर्ड किए गए डेटा पर केंद्रित है। हडसन इंस्टीट्यूट थिंक टैंक द्वारा 17 फरवरी को आयोजित एक कार्यक्रम में अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री क्रिस्टोफर ने कहा कि अतिरिक्त डेटा से यह साफ होता है कि वह एक एकल विस्फोट था जो किसी खदान के धमाके या प्राकृतिक भूकंप से मेल नहीं खाता। हालांकि, CTBTO ने अपने बयान में कहा है कि दर्ज किए गए आंकड़े निश्चित तौर पर यह साबित नहीं करते कि वह परमाणु परीक्षण ही था।
दूसरी ओर, फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के परमाणु रणनीति विशेषज्ञ जेफरी लुईस ने पिछले पांच वर्षों की उपग्रह तस्वीरों का अध्ययन किया है। लॉप नूर के पहाड़ी इलाकों के सैटेलाइट चित्र दर्शाते हैं कि वहां नई सुरंगें, सड़कें और आधुनिक भंडारण सुविधाएं बनाई गई हैं। वर्ष 2022 और 2023 की तस्वीरों की तुलना करने पर पता चलता है कि सुरंगों से निकाली गई मिट्टी और मलबे के ढेर लगातार बड़े होते जा रहे हैं, जिसका मतलब है कि भूमिगत नेटवर्क का विस्तार जारी है।
चीन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि अमेरिकी दावे पूरी तरह से बेबुनियाद हैं और अमेरिका इनका इस्तेमाल केवल अपने खुद के परमाणु परीक्षणों को दोबारा शुरू करने के बहाने के रूप में कर रहा है।
छोटे परमाणु बम क्यों बन रहे हैं ज्यादा खतरनाक?
उपयोग और क्षमता के आधार पर परमाणु हथियारों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है
- सामरिक या रणनीतिक परमाणु हथियार (स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर वेपन्स): ये बड़े आकार के परमाणु हथियार होते हैं जिनका उपयोग लंबी दूरी के हमलों और व्यापक तबाही के लिए किया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य दुश्मन में खौफ पैदा करना और बड़े शहरों या सैन्य मुख्यालयों को नष्ट करना होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर इसी श्रेणी के बम गिराए थे।
- रणक्षेत्रीय या सामरिक परमाणु हथियार (टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स): ये कम क्षमता वाले हथियार होते हैं जिन्हें युद्ध के मैदान में सीमित सैन्य लक्ष्यों, जैसे सैनिकों की टुकड़ियों, बंकरों, नौसैनिक जहाजों या मिसाइल ठिकानों को तबाह करने के लिए बनाया जाता है। इनका मकसद पूरे शहर को तबाह करना नहीं होता और अभी तक किसी भी युद्ध में इनका प्रत्यक्ष इस्तेमाल नहीं हुआ है।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को अंदेशा है कि चीन टैक्टिकल परमाणु हथियारों के निर्माण पर तेजी से काम कर रहा है। ये बम हिरोशिमा पर गिराए गए 15,000 टन TNT क्षमता वाले बम की तुलना में बहुत छोटे होते हैं। छोटे आकार और कम वजन के कारण एक ही मिसाइल पर कई ऐसे वॉरहेड तैनात किए जा सकते हैं, जिससे दुश्मन की रक्षा प्रणाली को चकमा देना आसान हो जाता है।
वैश्विक परमाणु हथियारों की स्थिति और संधि पर खतरा
दुनिया भर में परमाणु हथियारों पर नजर रखने वाली संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि दशकों के नियंत्रण प्रयासों के बावजूद वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की संख्या फिर से बढ़ रही है। वैश्विक तनाव और गलतफहमियों के बीच दुनिया एक नई परमाणु दौड़ की ओर बढ़ रही है।
वर्तमान में दुनिया भर में कुल 12,187 परमाणु हथियार मौजूद हैं, जिनमें से 83 प्रतिशत अकेले रूस और अमेरिका के पास हैं। बीते एक साल के भीतर विभिन्न देशों के परमाणु जखीरे में बदलाव आया है
- रूस: 4,309 से बढ़कर 4,400 वॉरहेड।
- चीन: 600 से बढ़कर 620 वॉरहेड।
- भारत: 180 से बढ़कर 190 वॉरहेड।
- उत्तर कोरिया: 50 से बढ़कर 60 वॉरहेड।
आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डैरिल किमबाल ने सचेत किया है कि यदि अमेरिका भी दोबारा परीक्षण शुरू करता है, तो इससे दुनिया भर में प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला शुरू हो जाएगी। इससे संपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का ढांचा ध्वस्त हो सकता है, जिसने अब तक दुनिया में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभाई है।



















