इक्कीसवीं सदी के शक्तिशाली तकनीकी अरबपति एक ऐसी कृत्रिम व्यवस्था का ताना बाना बुन रहे हैं जिसका बुनियादी मकसद इंसान को प्रकृति और समाज दोनों से पूरी तरह अलग करना है। सिलिकॉन वैली के धनी कारोबारी अपने जैविक शरीर की सीमाओं से मुक्ति पाने के लिए मौत के बाद अपने सिर को डीप फ्रीज करवाने और चेतना को कंप्यूटर में अपलोड करने की योजनाओं पर काम कर रहे हैं। यह पूरी अवधारणा किसी आधुनिक वैज्ञानिक शोध का नतीजा होने के बजाय लगभग एक सदी पुरानी उन काल्पनिक कहानियों से प्रेरित है जो कभी किशोरों की पत्रिकाओं में छपती थीं। इस सोच के केंद्र में अमरता, अंतरिक्ष में जीवन और दूसरे ग्रहों पर बस्तियां बसाने की अंधी दौड़ शामिल है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचने की रणनीति
तकनीकी उद्योग के कर्णधारों ने एक खास तरह का विमर्श गढ़ा है जिसमें कॉर्पोरेशंस को किसी भी सरकारी या संवैधानिक नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त करने की वकालत की जाती है। उनका तर्क यह रहता है कि धरती के तमाम संसाधनों को अत्यधिक परिष्कृत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास में झोंक दिया जाए ताकि इंसान इस ग्रह की सीमाओं से बाहर निकल सके। अतीत में सिलिकॉन वैली के इन दिग्गजों ने बड़े मंचों पर यह दावा जरूर किया था कि नई तकनीकों के भविष्य का फैसला आम जनता और लोकतांत्रिक सरकारों की सहमति से होगा, लेकिन असल में ऐसा कोई वैश्विक नियामक बोर्ड या एआई संवैधानिक ढांचा कभी तैयार नहीं किया गया।
इसके उलट इन तकनीकी कंपनियों ने जनता और निवेशकों के बीच एआई से जुड़े काल्पनिक अस्तित्वगत खतरों का डर फैलाया। उनका कहना था कि इस विनाश से बचने का एकमात्र रास्ता यह है कि उनकी कंपनियों में अंधाधुंध निवेश किया जाए और विकास की रफ्तार को कई गुना तेज कर दिया जाए, भले ही इसकी कीमत पूरी धरती के संकट के रूप में चुकानी पड़े। वर्ष 2025 में ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन ने यहां तक कहा था कि जल्द ही धरती की सतह का एक बड़ा हिस्सा डेटा केंद्रों से घिर जाएगा और फिर शायद इन केंद्रों को अंतरिक्ष में स्थापित करना पड़ेगा।
साहित्यिक चेतावनियों की गलत समझ
सैम ऑल्टमैन ने कनाडाई उपन्यास 'वी आर लीजन (वी आर बॉब)' से अपनी गहरी प्रेरणा का जिक्र किया है। इस काल्पनिक कहानी में युद्ध से तबाह हुई मानवता के बाद मृत इंसानों की चेतना को एआई सिस्टम में अपलोड करके एक नई सरकार के अधीन काम करने पर मजबूर किया जाता है। मानवता के इस दर्दनाक अंत को भी तकनीकी जगत में एक आकर्षक लक्ष्य की तरह पेश किया गया। पीटर थिएल और मार्विन मिन्स्की की तरह ऑल्टमैन ने भी भविष्य में पुनर्जीवन की उम्मीद में अपने मस्तिष्क को फ्रीज कराने का पंजीकरण कराया हुआ है।
यह रवैया साफ दिखाता है कि तकनीकी दिग्गज विज्ञान गल्प की सचेत करने वाली कहानियों को व्यावहारिक निर्देश पुस्तिका मान बैठे हैं। कंप्यूटर वैज्ञानिक स्टुअर्ट रसेल ने एक बार एआई की समस्या की तुलना राजा मिडास की कहानी से की थी, जिसे मुंहमांगा वरदान मिलने के बाद बर्बादी झेलनी पड़ी थी। लेखक टेड च्यांग ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए याद दिलाया था कि मिडास की कहानी का वास्तविक संदेश यह था कि लालच और केवल दौलत के पीछे भागना जीवन की सबसे जरूरी चीजों को छीन लेता है, जिसे तकनीकी विशेषज्ञ पूरी तरह भूल गए।
असिमोव और एडम्स के व्यंग्य की अनदेखी
एलोन मस्क ने दस वर्ष की उम्र में आइजैक असिमोव की 'फाउंडेशन' सीरीज पढ़ी थी और उससे यह निष्कर्ष निकाला कि सभ्यता के अंधकार युग को छोटा करने के लिए बड़े कदम उठाने चाहिए। हालांकि इस किताब का मूल संदेश यह था कि इतिहास किसी एक महापुरुष से नहीं बल्कि सामूहिक क्रियाकलापों से बनता है और मानवीय व्यवहार पर कंप्यूटर की भविष्यवाणियां तानाशाही का रूप ले सकती हैं। इसी तरह मस्क ने डगलस एडम्स की प्रसिद्ध व्यंग्य कृति 'द हिचहाइकर गाइड टू द गैलेक्सी' के असली मर्म को भी नजरअंदाज कर दिया।
एडम्स ने 1970 के दशक के मध्य में बीबीसी रेडियो 4 के लिए यह कहानी लिखी थी, जो बाद में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शुमार हुई। मस्क जब बारह या तेरह वर्ष के थे और जीवन के अर्थ को लेकर मानसिक संकट से जूझ रहे थे, तब उन्होंने इस किताब को पढ़ा। किताब में मैग्राथिया ग्रह के लोग जीवन और ब्रह्मांड के अंतिम उत्तर के लिए एक विशाल कंप्यूटर बनाते हैं जो लाखों साल बाद '42' उत्तर देता है। मस्क ने इससे केवल यह सीधा सबक लिया कि सही सवाल पूछना सबसे मुश्किल और महत्वपूर्ण काम है।
वास्तव में डगलस एडम्स की यह किताब साम्राज्यवाद, अनियंत्रित पूंजीवाद और अत्यधिक अमीरों पर तीखा कटाक्ष थी। एडम्स ने जब 1978 में प्रिटोरिया, दक्षिण अफ्रीका में इसके प्रसारण के समय यह कहानी लिखी, तब दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद सरकार के खिलाफ वैश्विक विरोध चरम पर था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1973 में रंगभेद की निंदा की थी और 1976 में सोवेटो में स्कूली बच्चों पर गोलियां चलाई गई थीं। एडम्स ने अपने टाइपराइटर पर रंगभेद विरोधी स्टिकर लगाकर यह व्यंग्य रचा था, जिसमें अंतरिक्ष उपनिवेशीकरण की औपनिवेशिक मानसिकता का पर्दाफाश किया गया था।
ज़ैफॉड बीबलबरॉक्स और असली कॉर्पोरेट सत्ता
'द हिचहाइकर गाइड टू द गैलेक्सी' का मुख्य पात्र ज़ैफॉड बीबलबरॉक्स दो सिर और तीन हाथ वाला आत्ममुग्ध व्यक्ति है, जिसे गैलेक्टिक सरकार का नाममात्र का राष्ट्रपति बनाया जाता है ताकि जनता का ध्यान सरकार के अपराधों से भटकाया जा सके। वह चुराए हुए स्पेसशिप 'हार्ट ऑफ गोल्ड' से घूमता है, जबकि पूरी आकाशगंगा को सीरियस साइबरनेटिक्स कॉर्पोरेशन जैसी रहस्यमयी कंपनियां चलाती हैं। बीबलबरॉक्स जब उस भयानक कक्ष में जाता है जो ब्रह्मांड में इंसान की तुच्छता दिखाकर दिमाग नष्ट कर देता है, तो वह वहां से यह मानकर निकलता है कि वह समूचे ब्रह्मांड का सबसे महत्वपूर्ण प्राणी है। मस्क ने बाद में अपने स्पेसएक्स रॉकेट में टेस्ला रोडस्टर रखकर अंतरिक्ष में भेजा, उसमें असिमोव की किताब और 'डॉनट पैनिक' का बोर्ड लगाया और मंगल ग्रह जाने वाले पहले यान का नाम बीबलबरॉक्स के जहाज की तर्ज पर 'हार्ट ऑफ गोल्ड' रखने का विचार रखा।
मंगल ग्रह और अंतरिक्ष का भ्रम
जेफ बेजोस का जन्म 1964 में हुआ था, जिस वर्ष नासा ने मंगल ग्रह के लिए पहला मैरिनर 4 यान छोड़ा था। 1990 के दशक में जब बेजोस और मस्क अकूत संपत्ति जुटा रहे थे, तभी किम स्टेनली रॉबिन्सन का 'मार्स ट्रायलॉजी' उपन्यास और 1996 में रॉबर्ट जुब्रिन की पुस्तक 'द केस फॉर मार्स' सामने आई। जुब्रिन का दावा था कि बिना किसी चमत्कारी तकनीक के एक दशक के भीतर मंगल पर इंसानी बस्ती बनाई जा सकती है। इसके बाद बेजोस ने 2000 में ब्लू ओरिजिन और मस्क ने 2002 में स्पेसएक्स की नींव रखी।
वर्ष 2021 में स्टार ट्रेक में कैप्टन किर्क का किरदार निभाने वाले नब्बे वर्षीय अभिनेता विलियम शैटनर ने ब्लू ओरिजिन के जरिए दस मिनट की अंतरिक्ष यात्रा की। अंतरिक्ष से धरती को देखकर शैटनर बेहद भावुक हो गए और रो पड़े। उन्होंने लौटकर लिखा कि अरबों साल में विकसित हुई पृथ्वी की जैव विविधता मानव हस्तक्षेप के कारण तेजी से खत्म हो रही है और अंतरिक्ष से धरती को देखना किसी जश्न के बजाय अंतिम संस्कार में शामिल होने जैसा महसूस हुआ। इस मार्मिक अनुभव के बावजूद तकनीकी अरबपतियों का ध्यान पृथ्वी को बचाने के बजाय उसे छोड़कर भागने पर ही लगा रहा।
धरती पर गहराता वास्तविक संकट
ई. एम. फोर्स्टर ने अपनी रचना 'द मशीन स्टॉप्स' में एक ऐसी दुनिया की कल्पना की थी जहां इंसान अलग थलग कमरों में बंद रहते हैं और मशीनें उन्हें सब कुछ मुहैया कराती हैं। आज दुनिया के कई हिस्सों में लोग अपना नब्बे प्रतिशत समय चारदीवारी के भीतर बिता रहे हैं। अत्यधिक वायु प्रदूषण के कारण अकेले 2018 में चीन के 79 शहरों में लोगों को घरों के भीतर रहने के सरकारी आदेश जारी करने पड़े थे। अमेरिका और यूरोप में भी लोगों का धूप और खुली हवा में निकलना न के बराबर रह गया है।
एआई और रोबोटिक्स की इस आंधी के बीच जमीन पर वास्तविक उत्पादकता के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया की लगभग छह हजार कंपनियों के एक 2026 के सर्वेक्षण में सामने आया कि अस्सी प्रतिशत कंपनियों को एआई अपनाने से कोई ठोस फायदा नहीं हुआ। दूसरी तरफ धरती पर वास्तविक संकट पहले ही दस्तक दे चुका है, जहां पिछले दस हजार वर्षों में जंगली स्तनधारी जीवों के कुल बायोमास में अस्सी प्रतिशत और 1850 के बाद से सत्तर प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
रोबोट्स की बढ़ती तादाद और पलायन की तैयारी
धरती पर जीवों की जगह अब मशीनें ले रही हैं। वर्ष 2016 के अनुमानों के मुताबिक दुनिया में प्रत्येक 250 व्यक्तियों पर एक रोबोट मौजूद था। अमेरिका में औद्योगिक रोबोटों का सालाना निर्माण 2010 से 2023 के बीच चार गुना बढ़कर एक लाख से चार लाख इकाई पर पहुंच गया, जबकि वैश्विक स्तर पर इनकी संख्या लगभग पचास लाख हो चुकी है। टेस्ला हर साल दस लाख ऑप्टिमस रोबोट बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है और मॉर्गन स्टेनली का अनुमान है कि 2050 तक ह्यूमनॉइड रोबोटों की संख्या एक अरब के पार पहुंच जाएगी। बिल गेट्स से जब पूछा गया कि क्या भविष्य में इंसानों की जरूरत पड़ेगी, तो उनका जवाब था कि ज्यादातर चीजों के लिए नहीं।
विज्ञान गल्प की त्रासदियों को असल दुनिया में लागू करने की इस जिद ने पर्यावरण और समाज को गंभीर खतरे में डाल दिया है। लेकिन तकनीकी व्यवस्था के इन योजनाकारों को इसकी कोई चिंता नहीं है। एलोन मस्क के पास मंगल ग्रह, मार्क जुकरबर्ग के पास मेटावर्स, पीटर थिएल के पास न्यूजीलैंड में सुरक्षित ठिकाने, जेफ बेजोस के पास अंतरिक्ष और सैम ऑल्टमैन के पास क्लाउड में डिजिटल चेतना का विकल्प है। यह मानवता के उद्धार की कोई ईमानदार कोशिश नहीं बल्कि धरती और इंसानी समाज को अपने हाल पर छोड़कर भागने की सोची समझी योजना है।


















