लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में महिला कर्मचारियों और चिकित्सकों के उत्पीड़न के साथ-साथ धर्मांतरण के दबाव से जुड़े मामले में प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष कार्यबल द्वारा तैयार की गई एक विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर राज्य प्रशासन ने विश्वविद्यालय को आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ नियम सम्मत कदम उठाने का निर्देश दिया है। इस संदर्भ में विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था, कार्य परिषद की एक आपात बैठक 6 नवंबर 2026 को बुलाई गई है, जिसमें मामले के विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं की पड़ताल की जाएगी।
विवाद की शुरुआत और प्राथमिक आपराधिक मामले
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब चिकित्सा विश्वविद्यालय से जुड़े परिसरों में महिला चिकित्सकों और कर्मचारियों द्वारा गंभीर दुर्व्यवहार की शिकायतें औपचारिक रूप से सामने आईं। पैथोलॉजी विभाग में जूनियर रेजिडेंट पद पर कार्यरत रमीजुद्दीन उर्फ रमीज मलिक के खिलाफ एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर ने यौन उत्पीड़न करने, जबरन शादी करने और धर्म बदलने का दबाव बनाने की प्राथमिक शिकायत दर्ज कराई थी।
इसी संस्थान से जुड़ा दूसरा मामला एक मेडिकल इंटर्न से संबंधित था, जिस पर विवाह का झांसा देकर एक नर्सिंग छात्रा का दैहिक शोषण करने का आरोप लगाया गया। इन दोनों मामलों में अलग-अलग आपराधिक मुकदमे कायम किए गए थे। रमीजुद्दीन को पकड़ने के लिए पुलिस ने चार राज्यों में छापेमारी की थी और उस पर 50,000 रुपये का इनाम तथा गैर-जमानती वारंट भी जारी हुआ था। पुलिस उपायुक्त पश्चिम विश्वजीत श्रीवास्तव के अनुसार, 9 जनवरी 2026 को आरोपी को लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस मामले में उसके माता-पिता, सलीमउद्दीन और खतीजा की गिरफ्तारी भी पहले ही अमल में लाई जा चुकी थी।
आंतरिक पड़ताल और विशेष जांच दल को मामला सौंपना
गिरफ्तारी की कार्रवाई के उपरांत विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंतरिक स्तर पर दो अलग-अलग जांच प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया। पहली जांच विश्वविद्यालय की विशाखा समिति ने की, जिसने अपनी रिपोर्ट कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद को सौंपते हुए आरोपी चिकित्सक का प्रवेश रद्द करने सहित दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी।
धर्मांतरण और कैंपस के माहौल से जुड़े अन्य आरोपों के मूल्यांकन के लिए पूर्व पुलिस महानिदेशक भावेश सिंह की अध्यक्षता में सात सदस्यीय तथ्य-खोज समिति गठित की गई। इस समिति ने मामले की व्यापकता को देखते हुए गहन पड़ताल विशेष कार्यबल को सौंपने की राय दी। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एसटीएफ ने औपचारिक जांच संभाली। इसके समानांतर, यूपी यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में स्वयं को पेश करने वाले एक व्यक्ति ने भी कैंपस में धर्मांतरण की गतिविधियों की जांच के लिए शिकायत दी थी, जिसके बाद जांच का दायरा विस्तृत कर दिया गया।
एसटीएफ की जांच रिपोर्ट के मुख्य बिंदु और प्रभावित विभाग
एसटीएफ ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट 25 अगस्त 2026 को शासन को प्रस्तुत की थी। इस दस्तावेज में विश्वविद्यालय के चार प्रमुख विभागों—पैथोलॉजी, गांधी वार्ड, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी—में सामने आए घटनाक्रमों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से चार प्रकार के आरोप दर्ज हैं
- महिला रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मचारियों का शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न करना।
- महिला सहकर्मियों पर धर्म परिवर्तन कर विवाह करने के लिए अनुचित दबाव बनाना।
- आरोपों का विरोध करने पर करियर खराब करने, परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण करने या नौकरी से हटाने की धमकियां देना।
- वरिष्ठ पदों पर बैठे कुछ कर्मियों द्वारा पीड़ितों की शिकायतों को दबाना और आरोपित व्यक्तियों का पक्ष लेना।
रिपोर्ट में माइक्रोबायोलॉजी विभाग की 25 वर्षीय संविदा कंप्यूटर ऑपरेटर के मामले का भी विशेष संदर्भ है। उसने एक वरिष्ठ कर्मी पर पीछा करने, परेशान करने और धर्म परिवर्तन कर शादी का दबाव डालने का आरोप लगाया था। आरोप है कि जांच समिति बनने के बावजूद आरोपी पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जबकि पीड़िता का संविदा अनुबंध समाप्त कर दिया गया। इसी तरह एक अन्य रेजिडेंट डॉक्टर पर दो महिला सहकर्मियों को ब्लैकमेल करने और उन पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने का आरोप अंकित है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह विवरण जांच रिपोर्ट में दर्ज आरोप हैं, जिन्हें अभी किसी अदालत या अंतिम अनुशासनात्मक समिति द्वारा साबित किया जाना बाकी है।
सूचीबद्ध कर्मचारियों की भूमिकाएं और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
जांच एजेंसी की रिपोर्ट में कुल 12 विश्वविद्यालय कर्मियों को नामजद किया गया है। इनके दायित्वों को दो अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी में पांच लोग शामिल हैं, जिन पर सीधे तौर पर दुर्व्यवहार, शोषण और धर्मांतरण का दबाव बनाने के आरोप हैं। दूसरी श्रेणी में शेष सात कर्मियों को रखा गया है, जिन पर पीड़ितों की शिकायतों की उपेक्षा करने, आरोपियों को संरक्षण देने या शिकायतकर्ताओं को प्रभावित करने का संशय है।
रिपोर्ट सामने आने के बाद संस्थान की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं। ऐसा आरोप है कि जब कुछ महिलाओं ने अपनी बात रखनी चाही, तो कुछ संकाय सदस्यों ने उन्हें शैक्षणिक या पेशेवर नुकसान की चेतावनी देकर चुप कराने का प्रयास किया। एक मामले में धर्मांतरण के दबाव की शिकायत करने वाली महिला के परिजनों ने आरोप लगाया कि विभागाध्यक्ष ने आरोपी का बचाव किया और पीड़िता को मानसिक रूप से अस्थिर बता दिया। अब विश्वविद्यालय को यह सिद्ध करना होगा कि आंतरिक शिकायत निवारण प्रणाली और नियमावली का निष्पक्ष पालन हुआ था या नहीं।
संभावित अनुशासनात्मक कार्रवाई और आगामी प्रक्रिया
चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 अक्टूबर 2026 को विश्वविद्यालय प्रशासन को केजीएमयू अधिनियम 2002 और विश्वविद्यालय परिनियम 2011 के प्रावधानों के तहत नामजद कर्मचारियों पर कार्रवाई शुरू करने और कृत कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
संस्थान के प्रवक्ता डॉ. के. के. सिंह ने स्पष्ट किया है कि एसटीएफ रिपोर्ट मुख्य रूप से आंतरिक और विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए भेजी गई है और इसमें नए आपराधिक मामले दर्ज करने की सिफारिश नहीं की गई है। पूर्व में दर्ज दो आपराधिक प्रकरणों की पुलिस जांच अपनी अलग दिशा में जारी है। अब 6 नवंबर 2026 को कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद की अध्यक्षता में आयोजित होने वाली कार्य परिषद की बैठक में प्रत्येक कर्मचारी की व्यक्तिगत भूमिका और साक्ष्यों का परीक्षण कर आगे की विभागीय जांच की रूपरेखा तय की जाएगी।



















