विदेशों में बेहतर करियर और सुनहरे भविष्य की चाह रखने वाले भारतीय युवा अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क के जाल में फंस रहे हैं। राजस्थान के अलवर जिले के रहने वाले विजय कुमार वर्मा के फोन पर जब एक अनजान विदेशी नंबर से कॉल आई, तो उनके होश उड़ गए। फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को पाकिस्तान का नागरिक बताते हुए दावा किया कि उसका बेटा सुल्तान कंबोडिया की जेल में बंद है और वहीं विजय वर्मा का बेटा प्रदीप भी गंभीर रूप से बीमार हालत में कैद है। कॉलर ने प्रदीप तक खाना और मदद पहुंचाने के नाम पर 100 डॉलर की मांग की। प्रदीप कंप्यूटर ऑपरेटर के काम के लिए मलेशिया गया था, लेकिन शातिर एजेंटों ने उसे कंबोडिया भेजकर एक साइबर स्कैम कंपनी के हवाले कर दिया। बाद में स्थानीय पुलिस के छापे में प्रदीप पकड़ा गया और पिछले छह महीनों से वह विदेशी सलाखों के पीछे फंसा हुआ है।
यह दुखद स्थिति अकेले प्रदीप या राजस्थान के किसी एक परिवार की नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के दर्जनों युवक-युवतियां आज कंबोडिया की विभिन्न जेलों में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। इन कैदियों में केरल के 18 नागरिक, तमिलनाडु के दो और उत्तर प्रदेश व राजस्थान के कई अन्य लोग शामिल हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कंबोडिया की जेलों में वास्तविक रूप से कुल कितने भारतीय बंद हैं, इसका कोई स्पष्ट और एकीकृत आंकड़ा खुद सरकार के पास भी मौजूद नहीं है। रोजी-रोटी कमाने के लिए निकले ये सामान्य युवा कैसे साइबर गुलाम बनकर जेलों में पहुंच रहे हैं, यह पूरी दास्तान अंतरराष्ट्रीय भर्ती धोखाधड़ी के भयानक तंत्र को उजागर करती है।
मलेशिया के रास्ते कंबोडिया में 15 भारतीयों की सौदेबाजी
प्रदीप 30 जून 2025 को नौकरी करने के लिए मलेशिया रवाना हुआ था। रोनी नामक एक एजेंट ने उसके लिए इंटरव्यू का प्रबंध किया और हवाई टिकट की व्यवस्था की थी। जैसे ही प्रदीप मलेशिया पहुंचा, वहां मौजूद कंपनी के प्रबंधकों ने उसका पासपोर्ट और वीजा अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद 25 मई 2026 को प्रदीप ने अपने घर पर फोन कर यह सूचना दी कि उसे कंबोडिया के सिहानुकविले शहर भेजा जा रहा है, जहां स्टार लाइन होटल में उसे एक शेफ के रूप में काम मिला है। लेकिन वहां की हकीकत बेहद खौफनाक निकली। अगले ही दिन 26 मई को प्रदीप ने अपनी पत्नी से बात की और घबराते हुए कहा कि वह एक बहुत बड़ी परेशानी में फंस चुका है।
इसके कुछ दिन बाद यानी 2 जून को परिवार के पास एक अनजान शख्स की कॉल आई, जिसने प्रदीप के पुलिस हिरासत में होने का दावा करते हुए उसकी रिहाई के बदले 40 लाख रुपये ट्रांसफर करने की मांग की। फिर 4 जून को आंध्र प्रदेश के एक अन्य व्यक्ति ने विजय वर्मा को फोन कर पूरी साजिश से पर्दा उठाया। उस व्यक्ति ने बताया कि प्रदीप ने कुछ देर के लिए उसका फोन मांगकर बात की थी। उसने खुलासा किया कि विवेक तिवारी नाम का एजेंट मलेशिया से 15 भारतीय नागरिकों को कंबोडिया के स्टार लाइन होटल लेकर आया था और उसने वहां सभी लोगों को साइबर गिरोहों के हाथों बेच दिया। जून के पहले हफ्ते में कंबोडिया पुलिस ने उस ठिकाने पर छापा मारकर सभी को हिरासत में ले लिया था। फोन करने वाला व्यक्ति कुछ दिनों बाद रिहा हो गया, लेकिन प्रदीप समेत बाकी लोग वहीं जेल में बंद रह गए। उस कॉलर ने अपनी और अपने परिवार की जान को खतरा बताते हुए अपनी पहचान पूरी तरह गुप्त रखने का अनुरोध किया था।
सिहानुकविले जेल में बेटे से मुलाकात और यातनाओं की दास्तान
अपने बेटे को वापस लाने की उम्मीद में विजय वर्मा 12 जुलाई को कंबोडिया पहुंचे। सिहानुकविले की प्रांतीय जेल में 14 जुलाई को उनकी अपने बेटे प्रदीप से मुलाकात हो सकी। इस मुलाकात के दौरान प्रदीप ने जो दर्दनाक आपबीती सुनाई, उसने पिता को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। प्रदीप ने बताया कि जेल के अंदर उसे दिन में केवल दो बार एक-एक कप चावल और कद्दू का रस पीने के लिए दिया जाता है। इसके अलावा उसे जेल में 18 इंजेक्शन भी लगाए गए थे। जुलाई महीने में हुई इस मुलाकात के बाद से विजय वर्मा की अपने बेटे से कोई बात नहीं हो पाई है।
लाचार पिता ने कंबोडिया स्थित भारतीय दूतावास में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई और नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय को भी पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी। हालांकि दूतावास के अधिकारियों ने बताया कि प्रदीप के खिलाफ स्थानीय कानून के तहत आपराधिक मामला दर्ज है। विदेशी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और अदालत से फैसला आने के बाद ही दूतावास के स्तर पर आगे की कोई ठोस कार्रवाई संभव हो सकेगी। इस कानूनी मजबूरी के चलते परिवार खुद को पूरी तरह बेबस महसूस कर रहा है।
एजेंटों का गायब होना और वेतन न मिलने पर बगावत
भारत से युवाओं को मलेशिया और कंबोडिया जैसे देशों में भेजने वाले रैकेट की पहली कड़ी स्थानीय भर्ती एजेंट होते हैं। प्रदीप को भी मलेशिया भेजने के पीछे एक स्थानीय एजेंट ही था, जिसने शुरुआत में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद का भरोसा दिया था। कुछ महीने मलेशिया में रखने के बाद इन युवाओं को साइबर अपराध सिंडिकेट को सौंप दिया गया। जिस एजेंट ने प्रदीप का सौदा किया था, उसका मोबाइल फोन लगातार बंद आ रहा है। वहीं इंटरव्यू आयोजित कराने वाले रोनी के बारे में भी परिवार को अब कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर निवासी सार्थक भी प्रदीप के साथ कंबोडिया गया था। सार्थक ने घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि वे दोनों जून 2025 में पहली बार कंबोडिया पहुंचे थे। सिहानुकविले की एक कंपनी में दोनों ने लगभग डेढ़ महीने तक साथ काम किया। बाद में सार्थक दूसरी कंपनी में चला गया और प्रदीप भी किसी अन्य ठिकाने पर शिफ्ट हो गया। दोनों कंपनियों के बीच करीब 100 किलोमीटर की दूरी थी, लेकिन वे फोन पर नियमित संपर्क में रहते थे। सार्थक के अनुसार, प्रदीप जिस कंपनी में काम कर रहा था, उसने दो महीने से कर्मचारियों का वेतन रोक रखा था। इस मनमानी से नाराज होकर 25 से 30 कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। बदले की कार्रवाई करते हुए कंपनी प्रबंधन ने हड़ताली कर्मचारियों को बाकी लोगों से अलग कर एक होटल में बंधक बना लिया। इसी दौरान भारत में सार्थक की पत्नी गंभीर रूप से बीमार हो गईं, जिसके चलते उसने कंपनी से मिन्नतें कर स्वदेश लौटने की इजाजत ले ली। प्रदीप वहीं फंसा रह गया और कुछ दिनों के भीतर ही उसका फोन पूरी तरह बंद हो गया। सार्थक ने यह भी बताया कि राजस्थान के राजेश नाम के एक व्यक्ति ने प्रदीप को मलेशिया बुलाया था, लेकिन उसके मूल निवास या संपर्क नंबर की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
केरल और तमिलनाडु के युवाओं की गिरफ्तारी व सामाजिक बदनामी का डर
कंबोडिया के बांते मींचे प्रांतीय जेल में भी दक्षिण भारत के कई युवा बंद हैं। इनमें केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के अंजुतेंगू गांव के कम से कम पांच लोग शामिल हैं, जिनमें एक पति-पत्नी का जोड़ा भी कैद है। स्थानीय पत्रकार अंजुतेंगू साजन ने बताया कि इन परिवारों से संपर्क साधने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन सामाजिक बदनामी और लोकलाज के डर से परिजनों ने इस मसले पर बात करने से साफ इनकार कर दिया। परिजनों को खास तौर पर यह डर सता रहा है कि यदि परिवार की युवतियों के नाम सार्वजनिक हुए तो भविष्य में उनकी शादियों में गंभीर बाधाएं आ सकती हैं। जून 2026 में हिरासत में लिए गए इन युवाओं में से कई रोजगार की तलाश में बैंकॉक और वियतनाम गए थे, जहां से एजेंट उन्हें धोखे से कंबोडिया ले गए और वहां की कंपनियों को बेच दिया।
कंबोडिया के आंतरिक मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2023 से 13 सितंबर 2026 के बीच कुल 1,921 भारतीय नागरिकों को उनके वतन वापस भेजा गया था। इनमें से 575 लोग सीधे तौर पर ऑनलाइन वित्तीय घोटालों में लिप्त कंपनियों से जुड़े पाए गए थे। ये सिंडिकेट कंबोडिया के साथ-साथ अमेरिका और भारत जैसे देशों के नागरिकों से भारी वित्तीय ठगी करते हैं। इन कंपनियों में काम करने वाले पुरुषों को 1,000 डॉलर प्रति माह यानी लगभग 95,000 रुपये दिए जाते हैं, जबकि महिला कर्मचारियों को 2,500 डॉलर से लेकर 4,000 डॉलर यानी करीब 2.37 लाख रुपये से 3.8 लाख रुपये तक का मासिक वेतन दिया जाता है। इसके अतिरिक्त बड़ी धोखाधड़ी को सफलतापूर्वक अंजाम देने पर अलग से भारी प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। कंबोडिया में पकड़े गए विदेशी नागरिकों के लिए कोई एक समान नियम नहीं है; उन्हें अपराध में उनकी भूमिका के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। जहां गंभीर अपराधों में शामिल लोगों पर मुकदमे चलते हैं, वहीं मानव तस्करी और जबरन श्रम के शिकार निर्दोष लोगों को जांच के बाद रिहा कर दिया जाता है।
संसद में सरकार का पक्ष और बचाव अभियान का आंकड़ा
दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में फैले इस अंतरराष्ट्रीय साइबर माफिया पर केंद्र सरकार भी लगातार नजर बनाए हुए है। इसी वर्ष फरवरी महीने में केंद्र सरकार ने राज्यसभा को लिखित जानकारी देते हुए बताया था कि वर्ष 2022 से 2025 के बीच कंबोडिया, लाओस और म्यांमार से कुल 6,998 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित स्वदेश वापस लाया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे अभियान के तहत कंबोडिया से 2,533 भारतीयों, लाओस से 2,297 नागरिकों और म्यांमार से 2,168 युवाओं को सफलतापूर्वक निकाल कर भारत लाया गया। हालांकि, जमीनी स्तर पर अवैध भर्ती एजेंटों की धरपकड़ और कंबोडिया की जेलों में कानूनी पचड़ों में फंसे दर्जनों अन्य युवाओं की रिहाई अब भी एक बड़ी कूटनीतिक और मानवीय चुनौती बनी हुई है।


















