चलती हुई बस की गति को अचानक रोक देना और किसी विशाल खतरे के सामने अकेले खड़े हो जाना आसान नहीं होता। जब कोई व्यक्ति संकट की घड़ी में पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर रास्ता रोक लेता है, तो वह क्षण इतिहास में दर्ज हो जाता है। हाल ही में दो अलग-अलग शहरों से आई तस्वीरों ने लोगों का ध्यान खींचा। एक तरफ भोपाल में प्रदर्शन के दौरान एक महिला पुलिस अधिकारी चलती बस के सामने ढाल बनकर खड़ी हो गईं, तो दूसरी तरफ मुंबई में एक युवा छात्रा ने पुलिस वैन का रास्ता रोक दिया। इन दोनों घटनाओं ने देश को उन पलों की याद दिला दी जब किसी एक नागरिक या सैनिक ने अपने साहस से आगे बढ़ते खतरे का रुख मोड़ दिया था।
दो शहरों की दो तस्वीरें जहाँ थमी थी रफ्तार
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में किसानों के प्रदर्शन के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था। प्रदर्शनकारी नारेबाजी कर रहे थे और पुलिस बल स्थिति को संभालने में जुटा था। इसी अफरातफरी के बीच एक बस आगे बढ़ने लगी। तभी भोपाल की एसीपी मोनिका शुक्ला बिना किसी झिझक के सीधी उस चलती हुई बस के सामने आकर खड़ी हो गईं। कुछ पलों के लिए सड़क पर सन्नाटा छा गया। बस की रफ्तार रुक गई और भीड़ भी ठिठक गई। सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को खूब सराहा गया और लोगों ने उन्हें लेडी सिंघम का नाम दिया। हालांकि मोनिका शुक्ला ने बाद में इसे सिर्फ अपनी ड्यूटी बताया, लेकिन वह तस्वीर लोगों के दिलों में उतर गई।
ठीक इसी तरह का एक दृश्य मुंबई के शिवाजी पार्क में देखने को मिला था। सीजेपी प्रदर्शन के दौरान छात्रा रिया यादव एक पुलिस वैन के आगे आकर खड़ी हो गईं। पुलिसकर्मियों ने उन्हें हटने को कहा, लेकिन उन्होंने जगह छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। देखते ही देखते 40 मिनट का वक्त बीत गया और वैन वहीं खड़ी रही। दो अलग शहर, दो अलग स्थितियां और दो अलग महिलाएं, लेकिन दोनों का इरादा एक जैसा था।
जब कानून के सामने नहीं झुकी ताकत की हनक
सत्ता और ताकत के आगे नियम न तोड़ने का एक बड़ा उदाहरण राजधानी दिल्ली में देखने को मिला था। सुबह के समय दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की एक क्रेन सड़क किनारे नो पार्किंग जोन में खड़ी गाड़ी को उठाने की तैयारी कर रही थी। आदेश बहुत सामान्य था कि गाड़ी को क्रेन से उठाकर जुर्माना लगाया जाए। तभी वहां मौजूद अधिकारियों को पता चला कि यह कार देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काफिले की है।
यह खबर सुनते ही बाकी पुलिसकर्मी झिझक गए, क्योंकि सबसे आसान तरीका अनदेखी करना ही था। लेकिन युवा ट्रैफिक पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने साफ कर दिया कि कानून किसी बड़े नाम के आगे नहीं झुक सकता। उनके निर्देश पर क्रेन ने गाड़ी उठाई और चली गई। दोपहर होते ही यह खबर चारों तरफ फैल गई और एक युवा अधिकारी की हिम्मत पूरे देश के लिए चर्चा का विषय बन गई।
सड़क से लेकर आसमान तक जान बचाने की जिद
किरण बेदी की घटना के चार साल बाद एक और भारतीय युवती ने खतरे के सामने खड़े होने का अदम्य साहस दिखाया। नीरजा भनोट एक अपहृत विमान के भीतर यात्रियों की सुरक्षा के लिए काल बनकर खड़े आतंकियों के सामने ढाल बन गईं। जब लोग अपनी जान बचाने के लिए पीछे हट रहे थे, तब नीरजा ने यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। उनका यह फैसला इंसानियत और कर्तव्य की मिसाल बन गया।
ताज होटल की गलियारों से लेकर चौपाटी की सड़क तक
नवंबर 2008 में जब मुंबई पर आतंकी हमला हुआ, तब ताज महल पैलेस होटल गोलियों की आवाज और धुएं से भरा हुआ था। आतंकियों को होटल के कोने-कोने की जानकारी थी, जबकि कमांडो अनजान रास्तों पर आगे बढ़ रहे थे। इस बेहद खतरनाक स्थिति में मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने का फैसला किया।
ऑपरेशन के दौरान जब उनका एक साथी घायल हो गया, तो वे उसे बचाने के लिए पीछे गए। उन्होंने अपने साथियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि कोई भी ऊपर न आए, वे अकेले ही आतंकियों से निपटेंगे। इस संघर्ष में मेजर संदीप शहीद हो गए, लेकिन उनके इस कदम ने कई नागरिकों और सहयोगियों की जान बचा ली।
उसी भयानक रात होटल के बाहर गिरगांव चौपाटी पर एक और ऐतिहासिक वीरता देखी गई। मुंबई पुलिस के सिपाही तुकाराम ओंबले हाथ में सिर्फ एक लाठी लेकर खूंखार आतंकी का सामना करने के लिए सड़क पर डटे रहे। उनके इस असीम साहस की बदौलत ही आतंकी कसाब को जिंदा पकड़ा जा सका। ताज होटल के अंदर मेजर संदीप और बाहर सड़क पर तुकाराम ओंबले, दोनों ने ही खतरे का रास्ता रोककर दूसरों की रक्षा की।
जब टैंकों का रास्ता रोककर अमर हो गया एक निहत्था इंसान
साहस की यह भावना केवल भारत तक सीमित नहीं है। 5 जून 1989 को चीन की राजधानी बीजिंग के तियानमेन चौक पर हुई घटना को पूरी दुनिया आज भी याद करती है। तियानमेन स्क्वायर पर कार्रवाई के अगले दिन सन्नाटे के बीच सैन्य टैंकों की एक लंबी कतार सड़क पर आगे बढ़ रही थी।
तभी हाथ में सामान के थैले लिए एक साधारण आदमी सड़क के बीचोंबीच आकर खड़ा हो गया। टैंक रुक गए। जब टैंकों ने रास्ता बदलने की कोशिश की, तो वह आदमी फिर से उनके सामने आ गया। यह निहत्था इंसान बख्तरबंद गाड़ियों के सामने अकेला डटा रहा। उस व्यक्ति की पहचान कभी उजागर नहीं हो सकी और दुनिया उसे टैंक मैन के नाम से जानती है, लेकिन उसकी यह तस्वीर सत्ता के सामने मानवीय साहस का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई।
साहस का एक ही अनूठा धागा
चाहे मुंबई में प्रदर्शन करती रिया यादव हों, भोपाल में बस के आगे खड़ी मोनिका शुक्ला हों, नो पार्किंग में गाड़ी उठाने वाली किरण बेदी हों, विमान में नीरजा भनोट हों, 26/11 हमले में मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और तुकाराम ओंबले हों या फिर बीजिंग का टैंक मैन, इन सभी कहानियों में एक बात समान है। इन सभी ने आने वाले खतरे को देखा और पीछे हटने के बजाय वहीं डटे रहने का फैसला किया।



















