अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में बीजिंग और इस्लामाबाद का तालमेल अब एक नए चरण में प्रवेश करने जा रहा है। पाकिस्तान अपने एक अंतरिक्ष यात्री को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित चीनी अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग पर भेजने की योजना बना रहा है। इस मिशन के लिए पाकिस्तान के दो सैन्य पायलटों को विशेष तौर पर चुना गया है, जो इस समय चीन में गहन प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा होने के बाद इन दोनों में से किसी एक पायलट को इस ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा के लिए अंतिम रूप से चयनित किया जाएगा। यह मिशन केवल एक सांकेतिक अंतरिक्ष उड़ान तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन अपने मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम के जरिए पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को नई ऊंचाई दे रहा है।
तियांगोंग मिशन पर क्या भूमिका निभाएगा पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्री
चीनी अंतरिक्ष यान से रवाना होने वाला पाकिस्तानी पायलट तियांगोंग स्पेस स्टेशन पर लगभग एक सप्ताह का समय बिताएगा। यह अवधि चीनी अंतरिक्ष यात्रियों के सामान्य छह महीने के मिशन की तुलना में काफी छोटी होगी। मिशन के दौरान उनकी प्राथमिक भूमिका पेलोड स्पेशलिस्ट की होगी। तकनीकी दृष्टि से पेलोड स्पेशलिस्ट वह विशेषज्ञ होता है, जिसका मुख्य दायित्व अंतरिक्ष के शून्य गुरुत्वाकर्षण वातावरण में वैज्ञानिक प्रयोगों और अनुसंधान कार्यों को अंजाम देना होता है। सरल शब्दों में, इस अभियान के तहत चीन लॉन्च व्हीकल, अंतरिक्ष यान और स्पेस स्टेशन का पूरा बुनियादी ढांचा उपलब्ध करा रहा है, जबकि पाकिस्तान अनुसंधान के लिए अपना वैज्ञानिक पायलट भेज रहा है।
अपनी एक हफ्ते की कक्षा में मौजूदगी के दौरान यह अंतरिक्ष यात्री पाकिस्तान द्वारा तैयार किए गए चार जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगों को पूरा करेगा। इन चार प्रयोगों का चयन पाकिस्तान के कराची, लाहौर और इस्लामाबाद स्थित विश्वविद्यालयों से प्राप्त 300 से अधिक प्रस्तावों की गहन समीक्षा के बाद किया गया है। यह संपूर्ण शोध मुख्य रूप से खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान पर केंद्रित है। अंतरिक्ष स्टेशन पर ले जाने से पहले इन सभी वैज्ञानिक प्रयोगों को पाकिस्तान में ही पूरी तरह तैयार और परीक्षण किया जाएगा। इस तरह यह अभियान केवल अंतरिक्ष में जाने का अवसर भर नहीं है, बल्कि पाकिस्तान को चीनी प्लेटफॉर्म पर अपने घरेलू वैज्ञानिक अनुसंधानों को परखने का मौका भी दे रहा है।
चीनी मानवयुक्त अंतरिक्ष यान पर पहली बार विदेशी नागरिक की उड़ान
यदि यह प्रस्तावित मिशन योजना के अनुसार आगे बढ़ता है, तो यह पहला मौका होगा जब चीन अपने किसी अंतरिक्ष यान से किसी विदेशी अंतरिक्ष यात्री को तियांगोंग स्पेस स्टेशन पर भेजेगा। इससे पूर्व चीन ने उपग्रह प्रक्षेपण, वैज्ञानिक परीक्षणों और अंतरिक्ष यात्रियों के प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में अन्य देशों के साथ सहयोग जरूर किया है, लेकिन आज तक किसी भी गैर-चीनी नागरिक ने चीन के मानवयुक्त मिशन में उड़ान नहीं भरी है।
इस मिशन के लिए उम्मीदवारों की खोज के दौरान पाकिस्तान ने शुरुआती चरण में वैज्ञानिकों और पायलटों के बड़े समूह में से 20 फाइनलिस्ट चुने थे। इसके बाद अंतिम रूप से दो सैन्य पायलटों, जीशान अली और खुर्रम दाऊद का चयन किया गया। पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी, स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमीशन (सुपारको) के निदेशक उजैर अंसारी के अनुसार, इन दोनों अधिकारियों को चुने जाने का मुख्य आधार उनका हाई-स्पीड विमान उड़ाने का अनुभव और अत्यधिक जी-फोर्स को झेलने की उनकी शारीरिक क्षमता रही है। अंतरिक्ष यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को अत्यधिक त्वरण और दबाव का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए फाइटर पायलटों का अनुभव बेहद उपयुक्त माना जाता है।
चीन पर पाकिस्तान की निर्भरता और बीजिंग के रणनीतिक हित
इस पूरे मिशन में चीनी संसाधनों पर पाकिस्तान की निर्भरता का मुख्य कारण यह है कि पाकिस्तान के पास स्वतंत्र रूप से मानव को अंतरिक्ष में भेजने का बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है। किसी भी देश के लिए अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजना केवल अंतरिक्ष यात्री तैयार करने तक सीमित नहीं होता। इसके लिए रॉकेट प्रक्षेपण यान, अत्याधुनिक अंतरिक्ष यान, सुसज्जित लॉन्च पैड, निरंतर निगरानी रखने वाला मिशन कंट्रोल सेंटर और सुरक्षित लैंडिंग व रिकवरी सिस्टम का होना आवश्यक है। पाकिस्तान के पास अभी अपनी कोई स्वतंत्र क्रू लॉन्च प्रणाली नहीं है। ऐसे में यह मिशन पाकिस्तान को बिना खुद का समूचा सिस्टम तैयार किए मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता और अनुभव हासिल करने का एक त्वरित मार्ग प्रदान करता है।
वहीं बीजिंग के नजरिए से देखें तो यह केवल एक पड़ोसी देश की सहायता का मामला नहीं है। चीन अपने अंतरिक्ष स्टेशन को एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में प्रस्तुत करके दीर्घकालिक साझेदार तैयार कर रहा है। चीनी अंतरिक्ष एजेंसी ने इस अभियान को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के लाभ साझा करने का उदाहरण बताया है। इसके जरिए चीन उन देशों के अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहा है जो उसके स्पेस प्रोग्राम से जुड़ रहे हैं। दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में यह साझेदारी पहले से जारी है। चीन ने 2018 में पाकिस्तान के रिमोट सेंसिंग उपग्रह पीआरएसएस-1 और प्रायोगिक उपग्रह पाकटेस-1ए को अपनी रॉकेट प्रणाली से अंतरिक्ष में स्थापित किया था। इसके अलावा दोनों देश सैटेलाइट नेविगेशन तकनीक पर भी साथ मिलकर काम कर रहे हैं। वर्ष 2028 के आसपास प्रस्तावित चीन के चांगई 8 चंद्र मिशन के लिए पाकिस्तान निर्मित एक एआई-सक्षम रोवर की योजना भी बनाई गई है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय द्वारा 26 मई 2026 को जारी संयुक्त बयान में भी इस बात को दोहराया गया है कि दोनों देश अंतरिक्ष सहयोग को अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी का एक अहम हिस्सा मानते हैं।
भारत के सुरक्षा परिप्रेक्ष्य से क्या मायने रखता है यह गठजोड़
चीन और पाकिस्तान के इस बढ़ते अंतरिक्ष तालमेल का भारत की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मोहसिन रजा खान का मानना है कि किसी पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्री का तियांगोंग की यात्रा करना अपने आप में भारत के लिए कोई तात्कालिक सुरक्षा खतरा या अलार्म नहीं है। ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि भारत ने भी अपने पहले अंतरिक्ष यात्री विंग कमांडर राकेश शर्मा को 1984 में भारत-सोवियत अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत सोवियत संघ के सोयुज टी-11 अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष में भेजा था। किसी अन्य देश के अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष यात्री भेजना कोई असामान्य घटना नहीं है।
हालांकि, मोहसिन रजा खान के अनुसार भारत के लिए वास्तविक चिंता तब पैदा हो सकती है जब पाकिस्तान अंतरिक्ष में उपग्रह या रॉकेट प्रक्षेपित करने की अपनी स्वतंत्र क्षमता विकसित कर ले। पाकिस्तान के पास पहले से ऐसी मिसाइलें मौजूद हैं जो भारत के सभी हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम हैं। यदि इस तरह के अंतरिक्ष अभियानों की आड़ में चीन द्वारा रॉकेट इंजन, प्रोपल्शन या गाइडेंस तकनीक जैसी दोहरे उपयोग वाली तकनीकों का हस्तांतरण किया जाता है, तो इससे पाकिस्तान को अपने मिसाइल और सैन्य कार्यक्रम को और अधिक उन्नत बनाने में मदद मिल सकती है। रॉकेट लॉन्च तकनीक और मिसाइल डिलीवरी सिस्टम की बुनियादी संरचना में काफी समानताएं होती हैं, लिहाजा तकनीकी हस्तांतरण का पहलू सामरिक संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।



















