सरकार की ओर से संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरों पर साल 2021 से लेकर अगस्त 2026 के बीच कुल 555 करोड़ रुपये की राशि खर्च हुई है।
विदेश मंत्रालय ने यह आधिकारिक जानकारी राज्यसभा सांसद संजय सिंह और वी. शिवदासन की ओर से पूछे गए एक लिखित सवाल के जवाब में साझा की है। इन दोनों सांसदों ने सरकार से प्रधानमंत्री के विदेश दौरों और उन पर हुए कुल खर्च का पूरा ब्योरा मांगा था।
विदेशी दौरों पर होने वाले खर्च के मायने
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद एक बार फिर राष्ट्राध्यक्षों की विदेश यात्राओं के खर्च पर बहस छिड़ गई है। लेकिन इसके साथ ही बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर देश के शीर्ष नेता विदेश यात्राएं क्यों करते हैं और इन दौरों से भारत को क्या ठोस हासिल होता है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्रीश पाठक का इस बारे में कहना है कि किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष के पास विदेशी दौरे सबसे ताकतवर कूटनीतिक हथियारों में से एक होते हैं। ये यात्राएं महज औपचारिक रस्में नहीं होती हैं।
आमने-सामने की बैठकें और शिखर सम्मेलन उन जटिल मुद्दों को सुलझाने में मदद करते हैं जो महीनों तक प्रशासनिक और नौकरशाही प्रक्रियाओं में अटके रहते हैं। ऐसे दौरों के जरिए नेताओं के बीच बनी राजनीतिक सद्भावना को रक्षा, व्यापार, टेक्नोलॉजी और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में वास्तविक समझौतों में बदला जा सकता है।
इसके अलावा, ये यात्राएं मित्रों, प्रतिद्वंद्वियों और देश के अपने नागरिकों को भारत की प्राथमिकताओं का एक स्पष्ट संकेत भी देती हैं।
शोध और आंकड़े क्या कहते हैं
इस बात की पुष्टि शोध से भी होती है। अर्थशास्त्री वोल्कर नित्स ने फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों की कई दशकों की विदेश यात्राओं का गहराई से अध्ययन किया था।
उनके अध्ययन में सामने आया कि एक अकेला राजकीय दौरा आमतौर पर द्विपक्षीय निर्यात में 8 से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि कर देता है।
नरेंद्र मोदी और पिछले प्रधानमंत्रियों की विदेश नीति की तुलना
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्रीश पाठक का मानना है कि यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि भारत की रणनीतिक कूटनीति की शुरुआत साल 2014 में हुई थी। भारत की कूटनीतिक यात्रा का एक लंबा इतिहास रहा है।
अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के दौरान 32 देशों की 29 यात्राएं की थीं, जबकि मनमोहन सिंह ने करीब 46 देशों के लगभग 71 दौरे किए थे। वहीं, नरेंद्र मोदी के 80 से ज्यादा देशों के 100 से अधिक दौरे अपने पैमाने और संस्थागत गहराई के मामले में अलग नजर आते हैं।
विशेषज्ञ के अनुसार, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित रहने के बजाय एक नेवटर्क्ड या बहु-पक्षीय दृष्टिकोण अपनाया है। इस दौरान भारत ने क्वाड को मजबूत किया है, जी20 और इंटरनेशनल सोलर अलॉयंस के जरिए वैश्विक एजेंडे को आकार दिया है और मल्टी-अलाइनमेंट की नीति को और गहरा किया है।
इसके साथ ही, रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए अमेरिका, जापान, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को नई ऊंचाइयां दी गई हैं।
श्रीश पाठक का यह भी कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया का वास्तविक पैमाना केवल मिलने वाले नेताओं की संख्या नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि क्या ये संबंध रक्षा उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा, बाजार तक पहुंच, कनेक्टिविटी और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर पा रहे हैं। इस दिशा में बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी है और यह पूरी नहीं हुई है।
भारत की विदेश नीति का क्रमिक विकास
विभिन्न प्रधानमंत्रियों के दौरों और नीतियों की तुलना करने से यह स्पष्ट होता है कि भारत की विदेश नीति समय के साथ कैसे विकसित हुई है। देश के शुरुआती दशकों से लेकर आज के दौर तक कूटनीति की प्राथमिकताएं बदलती रही हैं।
हर प्रधानमंत्री ने अपने दौर में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और देश की आर्थिक व सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से कूटनीति को दिशा दी है। आज के समय में भारत की विदेश नीति केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।



















