प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार महीने के भीतर दूसरी बार देशवासियों से अपील की है कि वे अपनी जरूरत न होने पर सोने की खरीदारी से परहेज करें। किर्गिस्तान की यात्रा के दौरान उन्होंने एक इंस्टाग्राम रील जारी कर लोगों से आग्रह किया कि यदि आवश्यकता न हो तो सोने पर पैसे खर्च न किए जाएं। इससे पहले 10 मई को भी उन्होंने सात तरह के संयम बरतने की बात कही थी, जिसमें कम सोना खरीदना, कम तेल का उपयोग करना और विदेश यात्राओं से बचना शामिल था। इस पूरी नीति के पीछे देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने का उद्देश्य जुड़ा हुआ है।
विदेशी मुद्रा भंडार और आयात बिल का गणित
प्रधानमंत्री की इस अपील का मुख्य मकसद देश के पास मौजूद डॉलर को बचाना है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनें और सोना विदेशों से आयात करता है। इन विदेशी सामानों की खरीद के लिए चुकाई जाने वाली कुल रकम को आयात बिल कहा जाता है। इस आयात बिल का भुगतान अधिकतर डॉलर में होता है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार से निकाले जाते हैं।
भारत अपनी कुल खपत का लगभग 90 प्रतिशत सोना बाहर से मंगवाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में जितनी ज्यादा सोने की खरीद होगी, उतना ही अधिक भुगतान डॉलर में करना पड़ेगा। इससे आयात बिल बढ़ेगा और फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव आएगा। वित्तीय वर्ष 2025 से 2026 के बीच भारत ने कुल 6.85 लाख करोड़ रुपये का सोना खरीदा था। विदेशों से खरीदे जाने वाले सामानों में सोने की हिस्सेदारी नौ प्रतिशत है और यह दूसरे स्थान पर आता है।
इन्वेस्टमेंट एडवाइजरी फर्म केडिया एडवाइजरी के संस्थापक अजय केडिया बताते हैं कि सोने की खरीद और विदेश दौरों का सीधा असर भारत में डॉलर की मांग पर पड़ता है। इन दोनों चीजों की मांग घटने से डॉलर की आवश्यकता कम होती है और रुपया मजबूत होता है। वैश्विक उथल-पुथल के दौर में कच्चे तेल और उर्वरकों के दाम चढ़ रहे हैं, जिसके लिए भारत को अधिक डॉलर की जरूरत है।
सोने और अन्य आयातों में अंतर
कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स या मशीनरी जैसी जरूरी वस्तुओं के आयात को अचानक बंद या कम करना देश के रोजमर्रा के जीवन और वित्तीय सेहत पर भारी असर डाल सकता है। लेकिन सोने के मामले में ऐसा नहीं है। एक बार खरीदे जाने के बाद सोना तिजोरियों में सुरक्षित रख लिया जाता है और उसका इस्तेमाल केवल मुश्किल वक्त में या मुनाफा कमाने के लिए होता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने नागरिकों से गैर-जरूरी सोना न खरीदने का अनुरोध किया है।
साढ़े तीन महीने पहले यानी 10 मई को तेलंगाना की एक रैली में भी नरेंद्र मोदी ने ऐसी ही अपील की थी। उन्होंने कहा था कि संकट के समय लोग देशहित में अपना सोना दान कर देते थे, आज दान की आवश्यकता नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित में यह तय करना है कि एक साल तक घर के किसी भी समारोह में सोने के गहने नहीं खरीदे जाएंगे।
पिछले आग्रह का बाजार पर असर
इस अपील के बाद और सोने की कीमतों में तेजी के बीच भारतीय आयातकों ने विदेशों से सोने की खरीदारी कम कर दी थी। जनवरी के महीने में जहां करीब 100 टन सोना खरीदा गया था, वहीं जून में यह घटकर लगभग 20 टन रह गया। जुलाई और अगस्त के सरकारी आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन बाजार के जानकारों का अनुमान है कि जुलाई में करीब 45 टन सोने का आयात हुआ था।
पिछले चार हफ्तों में सोने में एक बार फिर तेजी आई है और इसकी कीमतें 12,000 रुपये तक बढ़ गई हैं। इसके पीछे कई अंतरराष्ट्रीय कारण हैं जैसे कमजोर डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड से कम रिटर्न की उम्मीदें और दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीदारी जारी रखना। इसके अलावा एक घरेलू वजह यह भी है कि लोग दोबारा जेवर खरीद रहे हैं। त्योहारी सीजन को देखते हुए बुलियन डीलरों ने स्टॉक बढ़ाना शुरू कर दिया है और ज्वेलरी मेकर्स को भी अधिक ऑर्डर मिल रहे हैं।
भारतीयों का सोने से जुड़ाव और दोहरे मुनाफे का चक्र
कीमतों में भारी उछाल के बावजूद भारतीय नागरिक सोना खरीदना बंद नहीं कर रहे हैं, जिसके मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं। पहला कारण हमारी संस्कृति से जुड़ा है। शादियों, त्योहारों और शुभ अवसरों पर सोने के गहने, सिक्के और बिस्कुट खरीदने की परंपरा रही है। शादियों में इसे स्त्रीधन माना जाता है, जो दुल्हन की वित्तीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। इसके अलावा धनतेरस, दिवाली और अक्षय तृतीया जैसे पर्वों पर सोना खरीदना समृद्धि और सौभाग्य का सूचक माना जाता है।
दूसरा कारण यह है कि सोना मुश्किल समय का साथी होने के साथ-साथ दोहरा रिटर्न भी देता है। उदाहरण के लिए, यदि पिछले साल आपने एक लाख रुपये में 10 ग्राम सोना खरीदा था और आज उसकी कीमत 1.6 लाख रुपये है, तो यह 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। हालांकि इसी अवधि में वैश्विक बाजार में सोने के भाव में केवल 50 प्रतिशत की ही तेजी आई थी। बाकी बचा 10 प्रतिशत का इजाफा डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने की वजह से आया। यही वह दोहरा फायदा है जिसके कारण भारतीय सोने पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।
आरबीआई का स्वर्ण भंडार और वैश्विक रुझान
जनता की अपील के विपरीत, भारतीय रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का कुल भंडार पिछले पांच महीनों से 880.52 टन पर स्थिर बना हुआ है। इसका बाजार मूल्य लगभग 11 लाख करोड़ रुपये है। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार है और इसके साथ भारत वैश्विक स्वर्ण भंडार रैंकिंग में आठवें स्थान पर पहुंच गया है।
हालांकि इससे पहले आरबीआई लगातार सोना खरीद रहा था। वर्ष 2021 से 2025 के बीच केंद्रीय बैंक ने 185 टन सोना खरीदा था। पिछले 10 वर्षों में देश का स्वर्ण भंडार 560 टन से बढ़कर 880.52 टन हो गया है, जो कि 57 प्रतिशत की वृद्धि है। वर्तमान में भारत के कुल फॉरेक्स रिजर्व का 15.3 प्रतिशत हिस्सा सोने के रूप में है, जो पिछले साल की तुलना में पांच प्रतिशत अधिक है।
केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन, ब्राजील, तुर्की और पोलैंड जैसे कई देशों के केंद्रीय बैंक भी अपना स्वर्ण भंडार लगातार बढ़ा रहे हैं। चीन ने पिछले 21 महीनों से लगातार सोना जमा किया है। उसने जुलाई में 20 टन सोना खरीदा, जो अक्टूबर 2023 के बाद से उसकी सबसे बड़ी खरीद है। चीन के पास वर्तमान में 2,366 टन सोने का भंडार मौजूद है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर के केंद्रीय बैंक हर साल औसतन 1,000 टन शुद्ध सोना खरीद रहे हैं। अप्रैल से जून 2026 के बीच केंद्रीय बैंकों ने सामूहिक रूप से 289 टन सोना खरीदा। दुनिया के 73 प्रतिशत केंद्रीय बैंक आगामी पांच वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार को और अधिक बढ़ाना चाहते हैं।
अमेरिकी डॉलर से दूरी और भू-राजनीतिक बदलाव
सोने की इस आक्रामक खरीदारी का सीधा संबंध अमेरिकी डॉलर से है। दरअसल, वैश्विक स्तर पर व्यापार और बचत के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर बड़ी चर्चा छिड़ी हुई है। इस चर्चा के पीछे अमेरिका द्वारा लिया गया एक कड़ा फैसला मुख्य वजह है।
वर्ष 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत हुई, तब अमेरिका ने अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलकर रूस की 300 अरब डॉलर की विदेशी संपत्ति को फ्रीज कर दिया था। यहाँ तक कि अमेरिका ने अमेरिकी ट्रेजरी बिलों में रखे रूसी फंड को कैश करने से भी साफ मना कर दिया था।
अमेरिकी इस कदम ने पूरी दुनिया में हलचल पैदा कर दी। इसके बाद से यह माना जाने लगा कि अमेरिका अपनी मुद्रा का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में कर सकता है। तब से दुनिया भर के देशों का डॉलर से भरोसा उठने लगा और उन्होंने अपनी विदेशी तिजोरी को अन्य मुद्राओं, विशेषकर सोने के रूप में रखना शुरू कर दिया। साल 2016 में दुनिया के कुल विदेशी भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत हुआ करती थी, जो अब घटकर 56.7 प्रतिशत पर आ चुकी है। भारत ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाया है।
भारतीय रिजर्व बैंक भी सोना खरीदकर विदेशी भंडार में डॉलर पर निर्भरता को कम करना चाहता है। डॉलर की कीमतें लगातार घटती-बढ़ती रहती हैं और जरूरत के वक्त अमेरिका उस पर रोक भी लगा सकता है। इसके विपरीत, सोना एक ऐसी सुरक्षित संपत्ति है जिसके जरिए किसी भी देश से कोई भी सामान या मुद्रा आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
विदेश यात्राओं से दूरी क्यों जरूरी है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का दायरा केवल सोने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध डॉलर और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने से भी है। जब कोई नागरिक विदेश यात्रा पर जाता है, तो वहां होने वाले खर्च जैसे फ्लाइट टिकट, होटल में ठहरना, खानपान, घूमना-फिरना और खरीदारी का भुगतान डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा में ही किया जाता है।
भारत के पर्यटन विभाग की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में 3.27 करोड़ भारतीयों ने विदेश यात्राएं कीं, जो पिछले साल की तुलना में 5.9 प्रतिशत अधिक है। इनमें से 43.5 प्रतिशत लोगों ने छुट्टियों या मनोरंजन के उद्देश्य से विदेश का रुख किया, जो 2024 के मुकाबले छह प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है।
वर्ष 2023-24 में विदेश घूमने वाले भारतीयों ने कुल 2.72 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे, जो 2025-26 में बढ़कर 3.65 लाख करोड़ रुपये हो गए। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीयों ने विदेशों में जमकर पैसा बहाया। एक अनुमान के मुताबिक, यदि अवकाश के लिए विदेश जाने वाले आधे भारतीय भी वहां न जाएं, तो देश लगभग 78,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाने में कामयाब हो सकता है।
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के मुताबिक, साल 2023 में हर साल कम से कम 5,000 भारतीय जोड़े शादी करने के लिए विदेशों का रुख करते हैं। इस प्रकार के डेस्टिनेशन वेडिंग पर 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च होती है। यदि भारतीय नागरिक विदेश जाने के बजाय देश के भीतर ही किसी पर्यटन स्थल पर छुट्टियां मनाएं या शादियां करें, तो विदेशी मुद्रा में बहने वाला पैसा भारत की अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्तार देगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और देश के होटल एवं टैक्सी कारोबारियों को सीधा फायदा पहुंचेगा।



















