जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले बाहरी राज्यों के मजदूरों को अब सीधे निशाना बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर सामने आए एक नए धमकी भरे संदेश में उन्हें इलाका छोड़ने या गोलियों का सामना करने की चेतावनी दी गई है। यह संदेश यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल के नाम से जारी हुआ है, जिसे भारतीय सुरक्षा एजेंसियां प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ऑनलाइन प्रॉक्सी मोर्चा मानती हैं।
बाहरी मजदूरों को सीधी चेतावनी
पहले जारी हुए पत्रों से अलग, इस बार निशाने पर सीधे तौर पर वे मजदूर हैं जो रोजगार के लिए देश के दूसरे राज्यों से जम्मू-कश्मीर आए हैं। संदेश में इन मजदूरों पर आरोप लगाया गया है कि वे यहां स्थायी रूप से बसने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही यह भी चेतावनी दी गई है कि महिला हो या पुरुष, हैसियत चाहे जो भी हो, हिंसा से कोई नहीं बच पाएगा।
धमकी भरे संदेश में किया गया दावा
संदेश में यह भी दावा किया गया है कि ये मजदूर पहले भिखारी के रूप में इलाके में दाखिल हुए थे और अब स्थानीय निवास का अधिकार हासिल करने के लिए किसी प्रॉक्सी प्रशासन की शह पर प्रदर्शन कर रहे हैं। स्थानीय निवासियों से इन मजदूरों को बलपूर्वक बाहर निकालने की अपील की गई है। इसमें चल रहे विरोध प्रदर्शनों को महज दिखावा बताया गया है और कहा गया है कि जो लोग दिल्ली के इशारे पर काम करते रहेंगे, वे गोलियों के नतीजों से बच नहीं पाएंगे और मारे जाने पर उनके शव उनके गृह राज्यों में भेज दिए जाएंगे।
2026 के मध्य से जारी धमकियों का सिलसिला
इस पत्र की भाषा और मंशा उसी संगठन के पुराने संदेशों से मिलती जुलती है, जिनमें कब्जे, इलाके पर नियंत्रण और आबादी में बदलाव जैसे राजनीतिक दावों के साथ आम नागरिकों को सीधे डराने की कोशिश की जाती रही है। यह ताजा पत्र जुलाई और अगस्त 2026 से चली आ रही धमकियों की कड़ी का ही विस्तार है, जो बताता है कि यह कोई इकलौती वारदात नहीं बल्कि एक सोची समझी और लगातार चलाई जा रही मुहिम है।
पहले निशाने पर थे कश्मीरी पंडित कर्मचारी
बाहरी मजदूरों को निशाना बनाने से पहले इसी संगठन की धमकियां मुख्य रूप से प्रधानमंत्री के पुनर्वास पैकेज के तहत नौकरी कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों पर केंद्रित थीं। उन पुराने संदेशों में इस बार से भी आगे बढ़कर लोगों के नाम उजागर किए गए थे और उनके घर के पते व गाड़ियों के नंबर तक सार्वजनिक कर दिए गए थे, साथ ही यह चेतावनी भी दी गई थी कि इन नामित लोगों पर नजर रखी जा रही है और उन्हें निशाना बनाया जाएगा। सुरक्षा एजेंसियां इन पोस्टरों को एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध मानती हैं, जिसका मकसद डर फैलाना, कश्मीरी पंडितों की घाटी वापसी को हतोत्साहित करना और चल रहे पुनर्वास प्रयासों को कमजोर करना है।
कुलगाम हत्याओं के बाद गहराया डर
बाहरी मजदूरों के बीच यह डर जुलाई से ही गहराता जा रहा है, जब कुलगाम जिले में ईंट भट्ठे के दो मजदूरों की टारगेटेड हत्या कर दी गई थी। इससे पहले भी इस तरह के हमले हर साल दूसरे राज्यों से घाटी में आने वाले मौसमी मजदूरों को डरा चुके हैं, जो स्थानीय लोगों के यहां निर्माण कार्य, ईंट भट्ठों, बागों और दूसरे मेहनत वाले कामों में लगते हैं।
अधिकारियों ने बताया गंभीर मामला
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत जम्मू-कश्मीर के शीर्ष अधिकारी पहले भी इस तरह के पोस्टरों को बेहद चिंताजनक बता चुके हैं और पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को इन्हें हल्के में न लेने का निर्देश दे चुके हैं। कश्मीरी पंडित पहले से ही धमकियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और घाटी में तैनात कर्मचारियों के लिए कड़ी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष रह चुके एक पूर्व मुख्यमंत्री ने इन धमकी भरे पत्रों की सच्चाई पर सवाल उठाते हुए मामले की गहन जांच की मांग की है।
धमकियों की जांच जारी
एजेंसियां इन व्यक्तिगत संदेशों की प्रामाणिकता की पड़ताल कर रही हैं और साथ ही इन पर करीबी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इन्हें आम नागरिकों को डराने या हिंसा भड़काने की मंशा के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक ये ऑनलाइन धमकियां लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े गुमनाम संगठनों की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं, जो सांप्रदायिक और जनसांख्यिकीय मतभेदों का फायदा उठाकर घाटी में रह रहे बाहरी मजदूरों और अल्पसंख्यक समुदाय दोनों को असुरक्षित महसूस कराना चाहते हैं।





















