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कश्मीर में मजदूरों को लश्कर से जुड़े संगठन की धमकी, कहा- इलाका छोड़ो वरना गोलियां झेलनी होंगीजम्मू-कश्मीर
7 सित॰ 2026, 12:12 am (28 मिनट पहले)· 2

कश्मीर में मजदूरों को लश्कर से जुड़े संगठन की धमकी, कहा- इलाका छोड़ो वरना गोलियां झेलनी होंगी

जम्मू-कश्मीर में बाहरी राज्यों के मजदूरों को यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल के नाम से धमकी भरा संदेश मिला है, जिसमें उन्हें इलाका छोड़ने या हिंसा झेलने को कहा गया है। सुरक्षा एजेंसियां इस संगठन को लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी मोर्चा मानती हैं।

जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले बाहरी राज्यों के मजदूरों को अब सीधे निशाना बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर सामने आए एक नए धमकी भरे संदेश में उन्हें इलाका छोड़ने या गोलियों का सामना करने की चेतावनी दी गई है। यह संदेश यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल के नाम से जारी हुआ है, जिसे भारतीय सुरक्षा एजेंसियां प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ऑनलाइन प्रॉक्सी मोर्चा मानती हैं।

बाहरी मजदूरों को सीधी चेतावनी

पहले जारी हुए पत्रों से अलग, इस बार निशाने पर सीधे तौर पर वे मजदूर हैं जो रोजगार के लिए देश के दूसरे राज्यों से जम्मू-कश्मीर आए हैं। संदेश में इन मजदूरों पर आरोप लगाया गया है कि वे यहां स्थायी रूप से बसने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही यह भी चेतावनी दी गई है कि महिला हो या पुरुष, हैसियत चाहे जो भी हो, हिंसा से कोई नहीं बच पाएगा।

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धमकी भरे संदेश में किया गया दावा

संदेश में यह भी दावा किया गया है कि ये मजदूर पहले भिखारी के रूप में इलाके में दाखिल हुए थे और अब स्थानीय निवास का अधिकार हासिल करने के लिए किसी प्रॉक्सी प्रशासन की शह पर प्रदर्शन कर रहे हैं। स्थानीय निवासियों से इन मजदूरों को बलपूर्वक बाहर निकालने की अपील की गई है। इसमें चल रहे विरोध प्रदर्शनों को महज दिखावा बताया गया है और कहा गया है कि जो लोग दिल्ली के इशारे पर काम करते रहेंगे, वे गोलियों के नतीजों से बच नहीं पाएंगे और मारे जाने पर उनके शव उनके गृह राज्यों में भेज दिए जाएंगे।

2026 के मध्य से जारी धमकियों का सिलसिला

इस पत्र की भाषा और मंशा उसी संगठन के पुराने संदेशों से मिलती जुलती है, जिनमें कब्जे, इलाके पर नियंत्रण और आबादी में बदलाव जैसे राजनीतिक दावों के साथ आम नागरिकों को सीधे डराने की कोशिश की जाती रही है। यह ताजा पत्र जुलाई और अगस्त 2026 से चली आ रही धमकियों की कड़ी का ही विस्तार है, जो बताता है कि यह कोई इकलौती वारदात नहीं बल्कि एक सोची समझी और लगातार चलाई जा रही मुहिम है।

पहले निशाने पर थे कश्मीरी पंडित कर्मचारी

बाहरी मजदूरों को निशाना बनाने से पहले इसी संगठन की धमकियां मुख्य रूप से प्रधानमंत्री के पुनर्वास पैकेज के तहत नौकरी कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों पर केंद्रित थीं। उन पुराने संदेशों में इस बार से भी आगे बढ़कर लोगों के नाम उजागर किए गए थे और उनके घर के पते व गाड़ियों के नंबर तक सार्वजनिक कर दिए गए थे, साथ ही यह चेतावनी भी दी गई थी कि इन नामित लोगों पर नजर रखी जा रही है और उन्हें निशाना बनाया जाएगा। सुरक्षा एजेंसियां इन पोस्टरों को एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध मानती हैं, जिसका मकसद डर फैलाना, कश्मीरी पंडितों की घाटी वापसी को हतोत्साहित करना और चल रहे पुनर्वास प्रयासों को कमजोर करना है।

कुलगाम हत्याओं के बाद गहराया डर

बाहरी मजदूरों के बीच यह डर जुलाई से ही गहराता जा रहा है, जब कुलगाम जिले में ईंट भट्ठे के दो मजदूरों की टारगेटेड हत्या कर दी गई थी। इससे पहले भी इस तरह के हमले हर साल दूसरे राज्यों से घाटी में आने वाले मौसमी मजदूरों को डरा चुके हैं, जो स्थानीय लोगों के यहां निर्माण कार्य, ईंट भट्ठों, बागों और दूसरे मेहनत वाले कामों में लगते हैं।

अधिकारियों ने बताया गंभीर मामला

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत जम्मू-कश्मीर के शीर्ष अधिकारी पहले भी इस तरह के पोस्टरों को बेहद चिंताजनक बता चुके हैं और पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को इन्हें हल्के में न लेने का निर्देश दे चुके हैं। कश्मीरी पंडित पहले से ही धमकियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और घाटी में तैनात कर्मचारियों के लिए कड़ी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष रह चुके एक पूर्व मुख्यमंत्री ने इन धमकी भरे पत्रों की सच्चाई पर सवाल उठाते हुए मामले की गहन जांच की मांग की है।

धमकियों की जांच जारी

एजेंसियां इन व्यक्तिगत संदेशों की प्रामाणिकता की पड़ताल कर रही हैं और साथ ही इन पर करीबी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इन्हें आम नागरिकों को डराने या हिंसा भड़काने की मंशा के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक ये ऑनलाइन धमकियां लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े गुमनाम संगठनों की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं, जो सांप्रदायिक और जनसांख्यिकीय मतभेदों का फायदा उठाकर घाटी में रह रहे बाहरी मजदूरों और अल्पसंख्यक समुदाय दोनों को असुरक्षित महसूस कराना चाहते हैं।

सवाल-जवाब

इस बार धमकी किसे दी गई है?
जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले दूसरे राज्यों के मजदूरों को।
धमकी के पीछे कौन सा संगठन है?
यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल नाम का संगठन, जिसे सुरक्षा एजेंसियां लश्कर-ए-तैयबा का ऑनलाइन प्रॉक्सी मोर्चा मानती हैं।
संदेश में क्या मांग की गई है?
मजदूरों को इलाका छोड़ने या हिंसा झेलने की चेतावनी दी गई है, उन पर स्थायी रूप से बसने की कोशिश का आरोप लगाया गया है।
क्या इस संगठन ने पहले भी धमकियां दी हैं?
हां, पहले की धमकियां प्रधानमंत्री के पुनर्वास पैकेज के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को नाम लेकर और निजी जानकारी सार्वजनिक कर दी गई थीं।
मजदूरों में डर क्यों बढ़ा है?
जुलाई में कुलगाम जिले में ईंट भट्ठे के दो मजदूरों की टारगेटेड हत्या के बाद से मजदूरों में डर का माहौल है।
अधिकारियों ने क्या प्रतिक्रिया दी है?
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत शीर्ष अधिकारियों ने इन पोस्टरों को चिंताजनक बताते हुए पुलिस को गंभीरता से लेने का निर्देश दिया है।
क्या पत्र की प्रामाणिकता की पुष्टि हुई है?
एजेंसियां अभी संदेश की सच्चाई की जांच कर रही हैं और इस पर नजर रख रही हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की तरफ से क्या कहा गया?
नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष रह चुके एक पूर्व मुख्यमंत्री ने इन धमकी भरे पत्रों पर सवाल उठाते हुए गहन जांच की मांग की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·4 मिनट पहले

यह घटना दिखाती है कि सुरक्षा एजेंसियां इसे केवल मामूली धमकी नहीं मान सकतीं। जब कश्मीरी पंडितों के बाद अब बाहरी राज्यों के मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है, तो यह घाटी में डर फैलाने और विकास कार्यों को बाधित करने का एक बड़ा मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र है। इस तरह के ऑनलाइन प्रॉक्सी मोर्चों की पहचान कर उन पर तुरंत डिजिटल और मैदानी कार्रवाई करना अत्यंत आवश्यक हो गया है, ताकि कामगारों का मनोबल न टूटे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 मिनट पहले

रोहन का विश्लेषण बिल्कुल सही है। यह साफ है कि लश्कर-ए-तैयबा के इस ऑनलाइन प्रॉक्सी 'यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल' की रणनीति केवल धमकियां देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह घाटी में एक सोची-समझी मनोवैज्ञानिक जंग है। जिस तरह से जुलाई 2026 से कश्मीरी पंडितों के बाद अब बाहरी राज्यों के मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है, उसका मकसद जनसांख्यिकी को लेकर भ्रम फैलाना और विकास कार्यों में बाधा डालना है। यदि इस डिजिटल और जमीनी खतरे से तुरंत और सख्ती से नहीं निपटा गया, तो इसका सीधा असर कामगारों की सुरक्षा और घाटी के पुनर्वास प्रयासों पर पड़ेगा।

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