नेपाल में हाल ही में सामने आई तबाही की तस्वीरों ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है, और अब जम्मू-कश्मीर को लेकर एक डरावनी चेतावनी ने अधिकारियों की नींद उड़ा दी है। यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू के वैज्ञानिकों द्वारा की गई एक ताजा रिसर्च में यह बात सामने आई है कि केंद्र शासित प्रदेश का एक बहुत बड़ा भूभाग लैंडस्लाइड के लिहाज से बेहद संवेदनशील स्थिति में है। वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के तहत लगभग 43 हजार वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का बारीकी से विश्लेषण किया है। इस व्यापक अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि कुल क्षेत्र का 24.4 प्रतिशत हिस्सा हाई रिस्क श्रेणी में आता है, जबकि 3.6 प्रतिशत क्षेत्र उससे भी ज्यादा खतरनाक वेरी हाई रिस्क जोन के अंतर्गत चिन्हित किया गया है। इसका साफ अर्थ यह है कि पहाड़ों की गोद में बसा यह इलाका किसी बड़े प्राकृतिक संकट के मुहाने पर खड़ा है।
सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं ये पांच जिले
वैज्ञानिकों की इस शोध रिपोर्ट में विशेष रूप से पांच जिलों को सबसे अधिक संवेदनशील घोषित किया गया है। इन जिलों में डोडा, किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी और रामबन शामिल हैं। इन पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक बनावट और ढलानों की तीव्रता इन्हें बेहद जोखिम भरा बनाती है। इसके अलावा, इन क्षेत्रों से गुजरने वाली कई मुख्य और बेहद महत्वपूर्ण सड़कें भी इस खतरे के सीधे दायरे में आती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ इन इलाकों में हो रही इंसानी गतिविधियां भी भूस्खलन के खतरे को कई गुना बढ़ा रही हैं।
सड़क निर्माण और पहाड़ों की कटाई से बढ़ा जोखिम
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने उन मुख्य कारकों का भी गहराई से विश्लेषण किया जो जमीन खिसकने की घटनाओं को बढ़ावा देते हैं। इसमें सड़क से दूरी, पहाड़ी ढलान की स्थिति और प्राकृतिक जलधाराओं से दूरी को सबसे प्रमुख कारण माना गया है। सड़कों के आसपास के इलाके सबसे ज्यादा खतरे में पाए गए हैं क्योंकि पहाड़ों को काटकर सड़क बनाने की प्रक्रिया से प्राकृतिक ढलानों की स्थिरता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। इसके अलावा, पहाड़ी इलाकों में लगातार कम होते पेड़-पौधे और हरियाली भी मिट्टी को कसकर बांधे रखने की उसकी प्राकृतिक क्षमता को कमजोर कर रहे हैं।
प्रमुख हाईवे और मार्ग आए खतरे के दायरे में
इस स्टडी में विशेष रूप से कुछ प्रमुख परिवहन मार्गों का जिक्र किया गया है जो लैंडस्लाइड की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं। इनमें NH-44, NH-244, NH-144A, प्रसिद्ध मुगल रोड और किश्तवाड़-केलोंग रोड के आसपास के कई हिस्से शामिल हैं। उदाहरण के लिए, NH-44 एक ऐसा अहम राजमार्ग है जो जम्मू को सीधे कश्मीर घाटी से जोड़ता है। वहीं, NH-244 डोडा और किश्तवाड़ के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से होकर गुजरता है। ऐसे में यदि इन मार्गों पर कोई भी भूस्खलन की घटना होती है, तो इसका असर केवल स्थानीय पहाड़ी गांवों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की यातायात व्यवस्था और जरूरी सेवाओं की आवाजाही भी बुरी तरह ठप हो सकती है।
669 पुराने मामलों का अध्ययन और सटीकता
अपने इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए रिसर्च टीम ने आधुनिक सैटेलाइट इमेजरी, विस्तृत फील्ड सर्वे और अतीत में दर्ज किए गए लैंडस्लाइड के पुराने रिकॉर्ड का व्यापक इस्तेमाल किया। टीम ने कुल 669 पुराने मामलों की गहराई से जांच की। चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि इनमें से 87 प्रतिशत घटनाएं ठीक उन्हीं इलाकों में हुईं जिन्हें इस नई स्टडी में हाई या वेरी हाई सस्पेक्टिबिलिटी जोन के रूप में रखा गया था। इस मजबूत आंकड़े से इस बात की पुष्टि होती है कि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया यह मैपिंग मॉडल पूरी तरह सटीक और जमीनी हकीकत के करीब है।
प्रशासन के लिए आपदा प्रबंधन की पुख्ता तैयारी का मौका
हालांकि वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते हैं कि इस स्टडी को नेपाल जैसी किसी भी घटना की सीधी भविष्यवाणी नहीं समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि लैंडस्लाइड के होने का सटीक समय और निश्चित स्थान पहले से बता पाना तकनीक के लिहाज से संभव नहीं है। इसके बावजूद, इस रिसर्च का मुख्य उद्देश्य यही पता लगाना है कि किन चुनिंदा इलाकों में जमीन खिसकने का जोखिम सबसे ज्यादा है। तैयार किया गया यह लैंडस्लाइड सस्पेक्टिबिलिटी मैप अब स्थानीय प्रशासन के लिए एक अत्यंत उपयोगी और समय पर मिलने वाला टूल साबित हो सकता है।
बारिश बन सकती है सबसे बड़ा ट्रिगर
मौसम के लिहाज से देखें तो भारी बारिश इस पूरे तंत्र के लिए सबसे बड़ा और खतरनाक ट्रिगर साबित हो सकती है। जब पहाड़ों पर लगातार बारिश होती है, तो पानी धीरे-धीरे मिट्टी और चट्टानों के भीतर गहराई तक रिसने लगता है, जिससे पूरी जमीन अंदर से कमजोर हो जाती है। इस प्रकार की नाजुक स्थिति में पहले से ही अस्थिर चल रहे पहाड़ी ढलान अचानक नीचे खिसक सकते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने मानसून या भारी बारिश के मौसम में इन संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखने और पहले से पूरी तैयारी करके रखने की सख्त सलाह दी है।
हिमालयी क्षेत्र की नाजुकता और सबक
नेपाल में 26 अगस्त को बर्फ और चट्टानों के अचानक ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर पूरे हिमालयी क्षेत्र की बेहद नाजुक और संवेदनशील स्थिति को दुनिया के सामने ला दिया है। जम्मू-कश्मीर पर आई यह नई रिसर्च भले ही उस विशेष घटना की कोई सीधी भविष्यवाणी न करती हो, लेकिन यह दोनों ही घटनाएं इस बात की कड़े शब्दों में याद दिलाती हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक ढलानों की निरंतर निगरानी कितनी ज्यादा जरूरी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भले ही आपदा के पल को रोका न जा सके, लेकिन संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करके एहतियाती कदम उठाए जा सकते हैं और बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है।





















