जम्मू-कश्मीर में संभावित कैबिनेट विस्तार से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होने के नेशनल कॉन्फ्रेंस के नए प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने स्पष्ट किया है कि पार्टी का यह रुख अपने सिद्धांतों पर टिका हुआ है और जब तक केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस नहीं मिल जाता, तब तक कांग्रेस सरकार में कोई मंत्री पद स्वीकार नहीं करेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि पार्टी बाहर से सरकार को अपना समर्थन जारी रखेगी ताकि धर्मनिरपेक्षता और क्षेत्रीय सद्भाव को बनाए रखा जा सके।
राज्य का दर्जा और संवैधानिक अधिकारों की मुख्य मांग
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने पार्टी का रुख दोहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के संवैधानिक अधिकारों को केंद्र सरकार ने असंवैधानिक और एकतरफा तरीके से छीन लिया था। कांग्रेस की सबसे प्रमुख मांग यह है कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिया जाए। इसके साथ ही, स्थानीय निवासियों के जमीन, नौकरियों और प्राकृतिक संसाधनों पर संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। कर्रा ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस को समर्थन देने का उद्देश्य केवल राज्य में सांप्रदायिक एकता और सद्भाव को बचाना है। पिछले दो वर्षों से पार्टी का यह दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट रहा है कि जब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं होता, तब तक कैबिनेट का हिस्सा बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
केंद्र शासित प्रदेश में कैबिनेट का आकार और खाली पद
जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण यहां मंत्रिपरिषद के आकार को लेकर कानूनी सीमाएं तय हैं। नियमों के मुताबिक, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल मंजूर संख्या 9 हो सकती है। फिलहाल, उमर अब्दुल्ला मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री को मिलाकर केवल 6 मंत्री ही कार्यरत हैं। इसका मतलब है कि कैबिनेट में अभी भी 3 पद खाली हैं। सरकार गठन के शुरुआती दौर में भी कांग्रेस ने कैबिनेट में शामिल न होने का निर्णय लिया था। उस समय चर्चाएं थीं कि कांग्रेस को दी जाने वाली मंत्री पदों की संख्या को लेकर पार्टी में असंतोष था। इसके बाद से ही मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलों के बीच कांग्रेस के रुख पर सभी की नजरें टिकी हुई थीं।
सहयोगी दलों के बीच पिछला तनाव और राज्यसभा चुनाव विवाद
नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन के रिश्तों में पिछले कुछ महीनों के दौरान खींचतान भी देखने को मिली है। खासकर पिछले साल अक्टूबर में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे। केंद्र शासित प्रदेश की 4 राज्यसभा सीटों के लिए हुए चुनाव से पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने 3 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी। इसके बाद चौथी सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दी गई थी, जिसे जीतना गणितीय रूप से काफी कठिन माना जा रहा था। कांग्रेस का दावा था कि उसे एक सुरक्षित सीट देने का भरोसा दिया गया था, इसलिए उसने असंतोष जताते हुए चुनाव न लड़ने का फैसला किया। नतीजतन, नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 3 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि चौथी सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सत शर्मा ने जीत हासिल की। इस घटनाक्रम के बाद गठबंधन में दरारें और गहरी हो गई थीं।
विधानसभा में दलीय स्थिति और बहुमत का समीकरण
जम्मू-कश्मीर की 90 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने और बहुमत साबित करने के लिए 46 सीटों की आवश्यकता होती है। चुनावी नतीजों और वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 41 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं। इन दोनों सहयोगी दलों का संयुक्त आंकड़ा 47 बैठता है, जो बहुमत के आंकड़े से 1 अधिक है। इसके अलावा, नेशनल कॉन्फ्रेंस को कुछ निर्दलीय विधायकों और छोटे दलों का समर्थन भी हासिल है, जिससे सरकार की स्थिरता पर कोई संकट नहीं है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के पास 29 सीटें हैं और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 4 सीटें हैं। कांग्रेस द्वारा कैबिनेट से बाहर रहने के फैसले के बावजूद सरकार को कोई खतरा नहीं है, क्योंकि 6 कांग्रेस विधायकों का समर्थन सरकार को पूर्ण बहुमत में बनाए रखता है।





















