झारखंड के पलामू जिले में खेती का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और अन्नदाता अब केवल पुरानी फसलों तक सीमित न रहकर नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसी कड़ी में स्ट्रॉबेरी की खेती कृषि क्षेत्र में एक नए विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम कर रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाकर इसकी बुवाई करें, तो उन्हें बाजार में बेहतरीन रिटर्न मिल सकता है। इस फसल की खूबी यह है कि सही प्रबंधन और उन्नत तरीकों से हर एक पौधे से भारी मात्रा में फल प्राप्त किए जा सकते हैं, जिससे कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
उन्नत प्रभेद और रोपाई की सही विधि
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार स्ट्रॉबेरी की फसल में पौधों को रोपने का तरीका इसकी सफलता तय करता है। इस प्रक्रिया में एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच लगभग 25 सेंटीमीटर का फासला रखना बेहद जरूरी होता है, जबकि दो पंक्तियों के बीच की दूरी 40 सेंटीमीटर तय की गई है। इस तरह की उचित दूरी बनाए रखने से पौधों को सूर्य का प्रकाश और पोषण आसानी से मिलता है, जिससे उनकी वृद्धि बेहतर ढंग से होती है। इस इलाके के किसान मुख्य तौर पर विंटर डॉन किस्म को प्राथमिकता दे रहे हैं, हालांकि इसके अलावा चांडलर और पूसा अर्ली जैसे अन्य विकल्पों का भी उपयोग किया जा सकता है। किसान भाई अक्टूबर महीने की 15 तारीख के बाद भी इस फसल की बुवाई का कार्य शुरू कर सकते हैं। आमतौर पर रोपाई के 40 से 45 दिन बीत जाने के बाद पौधों में फल निकलने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है, और सर्दियों से लेकर वसंत ऋतु यानी फरवरी से मार्च तक इनकी कटाई की जा सकती है।
मल्चिंग तकनीक और खरपतवार नियंत्रण
फसल की सुरक्षा और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए मिट्टी में नमी का संतुलन और अवांछित घास-फूस की रोकथाम करना अनिवार्य होता है। नमी की अधिकता होने पर खरपतवार बहुत तेजी से पनपने लगते हैं, जो मुख्य फसल के पोषक तत्वों को प्रभावित कर सकते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होता है। खेत में मल्च बिछाने से स्ट्रॉबेरी के फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आ पाते हैं, जिससे उनके गंदे होने या सड़ने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। इसके अलावा यह तकनीक मिट्टी के अंदर नमी को लंबे समय तक रोके रखती है और खरपतवारों की वृद्धि को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में मदद करती है।
गुणवत्तापूर्ण पौधों की आपूर्ति और जड़ संरक्षण
पलामू क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की खेती करने वाले लोग अच्छी किस्म के पौधों के लिए मुख्य रूप से बाहरी राज्यों पर निर्भर हैं, और यहां के कई उत्पादक विशेष रूप से पुणे से पौधे मंगवाते हैं। खेतों में इनकी रोपाई करने से पहले पौधों की जड़ों को विभिन्न प्रकार के रोगों से सुरक्षित रखना बहुत जरूरी होता है। कृषि जानकारों का कहना है कि यदि फसल की शुरुआती अवस्था से ही नियमित रूप से निगरानी की जाए और उसकी उचित देखभाल का ध्यान रखा जाए, तो पैदावार की गुणवत्ता में भारी सुधार देखने को मिलता है।
तुड़ाई, पैकेजिंग और परिवहन के नियम
स्ट्रॉबेरी एक बेहद संवेदनशील और नाजुक फल है, जिसके कारण इसकी तुड़ाई से लेकर बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया में अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है। जब फल लगभग 75 प्रतिशत तक पककर तैयार हो जाएं, तब बाजार की आवश्यकता और दूरी को ध्यान में रखते हुए इनकी तुड़ाई का निर्णय लिया जा सकता है। तुड़ाई के तुरंत बाद इन फलों को हवादार प्लास्टिक के विशेष कंटेनर में पैक किया जाता है, ताकि रास्ते में आते समय वे आपस में दबकर खराब न हों। पलामू क्षेत्र के उत्पादक अपने इस उत्पाद को कोलकाता और बनारस जैसे बड़े और प्रमुख बाजारों तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। हालांकि, परिवहन के खर्च, बाजार की तात्कालिक मांग और बिक्री मूल्य का सही आंकलन करना किसानों के लिए लाभ का सौदा साबित होता है।
सरकारी सहायता और विभागीय योजनाएं
स्ट्रॉबेरी के उत्पादन को और अधिक व्यापक स्तर पर बढ़ाने के लिए किसानों को स्थानीय जिला उद्यान विभाग से संपर्क करने की सलाह दी जाती है। सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के नियमों और पात्रताओं के आधार पर किसानों को वित्तीय सहायता या सब्सिडी का लाभ मिल सकता है। इस प्रकार की सरकारी मदद मिलने से खेती की शुरुआती लागत में कमी आती है और किसानों को अपनी फसल पर बंपर मुनाफा कमाने का अवसर प्राप्त होता है।



















