राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर के उण्डू काश्मीर स्थित ऐतिहासिक बाबा रामदेव धाम रामदेरिया में 20 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक भव्य और विशाल मंदिर बनकर तैयार हो चुका है। करीब 621 साल पुराने इस पवित्र तीर्थ स्थल पर नए मंदिर के निर्माण से समूचे क्षेत्र में भारी उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। 110 फीट ऊंचाई वाला यह नया देवालय अपनी नक्काशीदार भव्यता के साथ-साथ इंजीनियरिंग के मामले में भी बेहद खास है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु लगातार यहां पहुंच रहे हैं।
7.5 तीव्रता तक के भूकंप को झेलने की तकनीकी क्षमता
इस नवनिर्मित मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी वैज्ञानिक और भूकंपरोधी बनावट है। विशेषज्ञों और निर्माण दल ने इसे आधुनिक इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार इस प्रकार ढाला है कि यह 7.5 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंपीय झटकों को भी आसानी से सहन कर सकता है। प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए मंदिर की नींव जमीन के भीतर 35 फीट गहरी खोदी गई है। इस गहरी नींव में उच्च गुणवत्ता वाले सीमेंट और कंक्रीट का सघन भराव किया गया है, जिससे पूरे ढांचे को अद्वितीय मजबूती हासिल हुई है।
मंदिर के निर्माण कार्य में सामग्री का इस्तेमाल भी बहुत बड़े पैमाने पर हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, इस संपूर्ण परियोजना में 600 टन जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले पत्थर लगाए गए हैं, जो धूप में सुनहरी चमक बिखेरते हैं। इसके अलावा ढांचे को अभेद्य रूप देने के लिए 60 हजार बोरी सीमेंट और लगभग 1200 ट्रक कंक्रीट की खपत की गई है। पत्थरों पर की गई बारीक कारीगरी पारंपरिक राजस्थानी वास्तुकला की गरिमा को बखूबी उजागर करती है।
श्रद्धालुओं का प्रमुख आस्था केंद्र और रुणिचा यात्रा का नियम
धार्मिक परंपराओं और जन आस्था के अनुसार, उण्डू काश्मीर स्थित रामदेरिया धाम को बाबा रामदेव जी की पावन जन्मस्थली माना जाता है। हर साल भाद्रपद (भादवा) मास में यहां एक विशाल और ऐतिहासिक मेला आयोजित होता है। पुरानी मान्यताओं के तहत श्रद्धालु पहले इस जन्मस्थली पर आकर मत्था टेकते हैं और उसके बाद ही अपनी आगे की यात्रा जारी रखकर रामदेवरा (रुणिचा) धाम पहुंचते हैं। इसे यात्रा का अनिवार्य और शुभ नियम माना जाता है।
इस पावन धाम पर दर्शन करने के लिए सिर्फ बाड़मेर और जैसलमेर के स्थानीय लोग ही नहीं आते, बल्कि राजस्थान के अन्य संभागों सहित गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और पंजाब से भी लाखों भक्त प्रतिवर्ष हाजिरी लगाते हैं। विभिन्न राज्यों, समुदायों और वर्गों से आने वाले श्रद्धालुओं का यह संगम सामाजिक सौहार्द और सर्वधर्म समभाव की जीती-जागती मिसाल पेश करता है।
खेजड़ी के पेड़ से शुरू हुआ ऐतिहासिक सफर
रामदेरिया धाम का अतीत श्रद्धा और धैर्य की अनूठी दास्तान समेटे हुए है। मान्यता है कि यहां बाबा रामदेव जी के अवतरण से लेकर उनकी समाधि तक के आध्यात्मिक स्वरूप की अनुभूति होती है। शुरुआत में इस स्थल पर कोई पक्का या विशाल निर्माण मौजूद नहीं था। उस दौर में श्रद्धालु एक प्राचीन खेजड़ी के पेड़ की छांव में बने एक अत्यंत छोटे से मंदिर में ही शीश नवाते थे और अपनी मन्नतें मांगते थे।
दशकों के दौरान जैसे-जैसे श्रद्धालुओं का विश्वास गहरा होता गया, यहां आने वाले भक्तों का तादाद भी लाखों में पहुंच गई। श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती संख्या और उनकी गहरी भावना को ध्यान में रखते हुए इस 621 साल पुराने धाम के कायाकल्प का फैसला लिया गया। इसी के परिणाम स्वरूप आज खेजड़ी के उस छोटे से थान की जगह जैसलमेर के सुनहरे पत्थरों से तराशा गया यह 110 फीट ऊंचा भव्य मंदिर बनकर शान से खड़ा है।



















