झारखंड के बोकारो जिले का नाम सुनते ही आमतौर पर विशाल इस्पात संयंत्र और कोयला खदानों की भारी मशीनरी की तस्वीर दिमाग में उभरती है। मगर चार दशक पूर्व इस औद्योगिक अंचल ने सिनेमाई कैनवास पर अपनी एक बिल्कुल अलग और रूमानी पहचान दर्ज कराई थी। साल 1985 में आई बेहद लोकप्रिय भोजपुरी फिल्म 'पिया के गांव' का निर्माण इसी धरती की वादियों और देहाती परिवेश में हुआ था। मशहूर गीत 'ए डॉक्टर बाबू' और 'जुग-जुग जियो ललनवा' जैसे संगीत से सजी इस पारिवारिक फिल्म का तकरीबन 80 फीसदी हिस्सा बोकारो के बहरागोड़ा, अंगवाली और उनके आसपास के ग्रामीण इलाकों में कैमरे में कैद किया गया था। अभिनेता दानिश और अभिनेत्री मीरा माधुरी की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म की शूटिंग जब शुरू हुई, तो शांत और सुदूर गांवों में मानो किसी उत्सव का माहौल बन गया था।
रवींद्र कुमार पांडेय के पैतृक आवास पर फिल्माया गया अमर सोहर गीत
फिल्म के सबसे भावुक और लोकप्रिय पारंपरिक गीत 'जुग-जुग जियो ललनवा' का फिल्मांकन पूर्व सांसद रवींद्र कुमार पांडेय के पिता कृष्ण मुरारी पांडेय के घर पर किया गया था। कृष्ण मुरारी पांडेय केवल शूटिंग के लिए अपना घर देकर ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि वे खुद भी रचनात्मक रूप से इस पूरे सिनेमाई सफर से गहराई से जुड़े रहे। उन्होंने फिल्म में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। उस जमाने में एक वास्तविक ग्रामीण घर के आंगन में मुंबई से आई तकनीशियनों और कलाकारों की टोली का जुटना, रोशनी के बड़े-बड़े लैंप लगना और आधुनिक कैमरों का घूमना पूरे इलाके के लिए कौतूहल और गर्व का सबसे बड़ा विषय बन गया था। आसपास के गांवों से बड़ी तादाद में लोग इस ऐतिहासिक पल के गवाह बनने के लिए वहां पहुंचते थे।
तेनुघाट-बोकारो नहर के तट पर तैयार हुए रोमांचक दृश्य
फिल्म का एक अन्य बेहद कर्णप्रिय और लोकप्रिय गीत 'हाथ में सुरतिया तोहरी, माथे पर बिपतिया' प्राकृतिक छटा बिखेरती तेनुघाट-बोकारो नहर के किनारे फिल्माया गया था। नहर की जलधारा और उसके किनारे फैली हरियाली ने कहानी के दर्द और भावनाओं को कैमरे में बखूबी उभारा। इसके अतिरिक्त फिल्म के निर्णायक मोड़ यानी क्लाइमेक्स के कई रोमांचक दृश्य भी इसी जलमार्ग के आसपास के खुले मैदानों और रास्तों पर शूट किए गए थे। बहरागोड़ा गांव के निवासी विराज उस सुनहरे दौर को याद करते हुए साझा करते हैं कि तब शूटिंग का यह सिलसिला लगभग एक महीने तक अनवरत चला था। विराज के अनुसार, कलाकारों को अपनी आंखों के सामने संवाद बोलते और अभिनय करते देखने के लिए ग्रामीण कड़ी धूप और घंटों के इंतजार की परवाह किए बिना डटे रहते थे। पूरा इलाका उस महीने एक अनोखे उत्साह और उमंग में डूबा रहा था।
अंगवाली में आतिथ्य और स्थानीय प्रतिभाओं का सिनेमाई पदार्पण
इस बड़े पैमाने की शूटिंग के दौरान फिल्म यूनिट ने अंगवाली गांव को भी अपना प्रमुख ठिकाना बनाया था। अंगवाली के इकराम उल हक, जो उस समय सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) की परियोजना में कार्यरत थे, बताते हैं कि फिल्म निर्माण दल के कई प्रमुख सदस्य उनके आवास पर ठहरे थे। लगभग 15 दिनों तक उनके घर में फिल्मी मेहमानों की चहल-पहल रही। उस समय इन कलाकारों और क्रू के लिए विशेष प्रबंध के तहत बाहर से खाना मंगाया जाता था। सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि मुंबई से आए नामचीन कलाकारों के साथ अंगवाली के स्थानीय लोगों ने भी परदे पर अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरा। इनमें पप्पू हजाम, ईश्वर मिश्रा और पारस मिश्रा जैसे स्थानीय नाम प्रमुख रहे, जिन्होंने इस फिल्म में अभिनय कर गांव का नाम रोशन किया। किसी ग्रामीण के लिए सीधे कैमरे के सामने खड़े होकर मुंबई के कलाकारों के साथ दृश्य साझा करना जीवन भर की पूंजी बन गया था।
मेघदूत सिनेमा में उमड़ा था जनसैलाब
जब फिल्म पूरी होकर सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई, तो इसका जादू स्थानीय दर्शकों के सिर चढ़कर बोला। अंगवाली के कैलाश सिंह के स्वामित्व वाले मेघदूत सिनेमा में फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। स्थानीय बाशिंदों के अनुसार, दिन के शो से लेकर देर रात तक टिकट खिड़की पर लंबी कतारें लगी रहती थीं। उस दौर में टेलीविजन और मोबाइल स्क्रीन का नामोनिशान नहीं था, इसलिए थिएटर जाकर फिल्म देखना ही मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया हुआ करता था। दर्शकों के लिए 'पिया के गांव' देखना सिर्फ एक कहानी का आनंद लेना नहीं था, बल्कि बड़े पर्दे पर अपने खुद के गांव की पगडंडियों, नहरों, खेतों और अपने ही पड़ोसियों को अभिनय करते देखने का एक रोमांचकारी और अविस्मरणीय अनुभव था।
औद्योगिक पहचान से परे प्राकृतिक सौंदर्य का जीवंत दस्तावेज
यह फिल्म परियोजना बोकारो के लिए केवल एक पुरानी फिल्मी शूटिंग का किस्सा भर नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक भूगोल और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य है। अस्सी के दशक में बोकारो को केवल इस्पात कारखाने और कोयला उद्योग के भारी काम के लिए जाना जाता था, लेकिन इस सिनेमाई काम ने दुनिया को दिखाया कि यहां के ग्रामीण अंचल कितने मनोरम और शांत हैं। चार दशक बीत जाने के बाद भी बहरागोड़ा और अंगवाली की चौपालों पर उस दौर की बातें उतनी ही ताजगी के साथ सुनाई जाती हैं। यह दास्तान उस समय की अमिट स्मृति है जब आम ग्रामीणों ने पहली बार अपनी दहलीज पर सिनेमाई कला को उतरते और अपनी गलियों को अमर होते देखा था।





















