झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली दो सगी बहनें अपनी रचनात्मक कला के बल पर आत्मनिर्भरता की शानदार मिसाल पेश कर रही हैं। दीपांशु और प्रियांशु हर दिन केवल तीन घंटे का वक्त निकालकर कॉटन के धागे, सुई, छोटे-छोटे शीशे और समुद्री सीपों से बेहद आकर्षक आभूषण तैयार करती हैं। उनके जरिए बनाए जाने वाले पारंपरिक परांदे, रंग-बिरंगी चूड़ियां और गले के मनमोहक नेकलेस बाजार में काफी पसंद किए जा रहे हैं। बिना किसी आधुनिक मशीन के केवल हाथों की कारीगरी से सजाए जाने वाले ये उत्पाद न केवल दिखने में अलग पहचान रखते हैं, बल्कि पर्यावरण के पूरी तरह अनुकूल भी हैं।
बचपन के शौक से शुरू हुआ आत्मनिर्भर बनने का सफर
दोनों बहनों के भीतर हस्तशिल्प और कलाकारी की रुचि बचपन से ही मौजूद थी। इसी रचनात्मक सोच को उन्होंने आगे चलकर एक छोटे घरेलू व्यवसाय का रूप देने का फैसला किया। दीपांशु और प्रियांशु रोजमर्रा के घरेलू और अकादमिक कामों के बाद शाम को लगभग तीन घंटे साथ बैठती हैं और सादी चूड़ियों व बेस पर सुई-धागे से जटिल कढ़ाई करती हैं। इनमें छोटे-छोटे शीशे जोड़ना और समुद्री सीप के जरिए अनोखे पैटर्न उकेरना उनकी कला की मुख्य खूबी है। उन्होंने अपने उत्पादों की बिक्री के लिए दोनों माध्यमों को चुना है, जहां वे स्थानीय प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने के साथ-साथ ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर भी ऑर्डर लेती हैं।
संवेदनशील त्वचा वालों के लिए प्राकृतिक विकल्प
बाजार में उपलब्ध सामान्य मैटेलिक या कृत्रिम गहनों से कई लोगों को एलर्जी अथवा त्वचा से जुड़ी समस्याएं हो जाती हैं। इन बहनों के बनाए गहनों की सबसे बड़ी खासियत उनका प्राकृतिक और हानिरहित होना है। दीपांशु के अनुसार, वे कच्चा माल चुनते समय इस बात का पूरा ख्याल रखती हैं कि उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल और त्वचा के लिए सुरक्षित हों। यही वजह है कि जिन महिलाओं और लड़कियों की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है, वे इन कॉटन धागे वाले गहनों को प्राथमिकता देती हैं। हाल ही में लगाई गई एक प्रदर्शनी में खरीदारों ने भारी उत्साह दिखाया, जहां कई ग्राहक एक ही बार में 1,000 रुपये तक के उत्पाद खरीदते देखे गए। वर्तमान में झारखंड के लगभग हर जिले से इनके पास ग्राहकों के नियमित ऑर्डर पहुंच रहे हैं।
पिता के संघर्ष में बनीं मजबूत सहारा
इस हुनर से होने वाली आमदनी दोनों बहनों के जीवन में बहुत बड़ा आर्थिक संबल साबित हो रही है। परिवार में उनके पिता ऑटो रिक्शा चलाकर कठिन परिस्थितियों में घर का गुजारा करते हैं और अक्सर अपनी निजी जरूरतों को नजरअंदाज कर बच्चों का पालन-पोषण करते आए हैं। अब इस हस्तशिल्प के जरिए होने वाली कमाई से प्रियांशु की संत जेवियर कॉलेज की पढ़ाई की फीस आसानी से निकल जाती है। साथ ही दीपांशु की खुद की जरूरतें भी पूरी हो रही हैं। दोनों बहनें अपनी शिक्षा का खर्च खुद उठाने के अलावा घर के दैनिक खर्चों में पिता का हाथ भी बंटा रही हैं, जिससे उनके परिवार को बड़ी आर्थिक राहत मिली है।




















