झारखंड के पलामू इलाके में कृषि परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जहां किसान पारंपरिक खेती की सीमाओं से बाहर निकलकर नकदी फसलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। वैश्विक और घरेलू बाजारों में स्ट्रॉबेरी की जबरदस्त मांग, इसके चटख लाल रंग और बेहतरीन स्वाद के चलते हमेशा बनी रहती है। वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर कम समय में तैयार होने वाली यह बागवानी फसल किसानों के लिए आय का एक मजबूत और भरोसेमंद जरिया साबित हो रही है। उन्नत कृषि प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से किसान सीमित जमीन पर भी इस विदेशी फल से भरपूर पैदावार ले रहे हैं।
मेढ़ की सही बनावट और ड्रिप सिंचाई का प्रबंधन
पलामू जिले के कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार स्ट्रॉबेरी की सफल खेती की शुरुआत खेत की वैज्ञानिक तैयारी से होती है। इस फसल के लिए खेत में ऊंची मेढ़ तैयार करना सबसे पहला और जरूरी कदम है। प्रत्येक मेढ़ की चौड़ाई लगभग 2.5 से 3 फीट और गहराई करीब 25 सेंटीमीटर निर्धारित की जानी चाहिए। यह व्यवस्था पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा देने और जलभराव से बचाने के लिए बहुत जरूरी मानी जाती है।
मेढ़ का ढांचा तैयार करने के बाद उस पर पौध रोपने का काम किया जाता है। पानी के सटीक और किफायती उपयोग के लिए पूरे खेत में ड्रिप इरिगेशन यानी टपक सिंचाई प्रणाली बिछाई जाती है। टपक सिंचाई का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे गैर-जरूरी बर्बादी पूरी तरह रुकती है और पानी की भारी बचत होती है।
सिल्वर-ब्लैक प्लास्टिक मल्चिंग और दूरी का नियम
स्ट्रॉबेरी उत्पादन में आधुनिक सुरक्षात्मक तकनीक के रूप में प्लास्टिक मल्च का इस्तेमाल अनिवार्य भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक तौर पर करीब 25 माइक्रोन मोटाई वाली सिल्वर-ब्लैक प्लास्टिक मल्च बिछाने की सलाह दी जाती है। यह विशेष शीट मेढ़ के भीतर मिट्टी की नमी को लंबे समय तक सुरक्षित रखती है और खरपतवारों को उगने से रोकती है। इसके साथ ही टपक सिंचाई की पाइप लाइनें मल्च शीट के नीचे सुरक्षित बिछाई जाती हैं, ताकि नमी और जरूरी लिक्विड फर्टिलाइजर सीधे पौधों की जड़ों में बिना किसी बाधा के पहुंचते रहें।
फसल की सघनता और वायु संचार को संतुलित रखने के लिए पौधों के बीच की दूरी तय करना बहुत अहम है। रोपाई करते समय एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी करीब 25 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी लगभग 40 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए। इस सटीक अंतर से पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे धूप और हवा समान रूप से पहुंचती है। इसका सीधा असर फलों के आकार, चमक और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है, साथ ही खेत की नियमित निगरानी और तुड़ाई का काम भी बेहद सुगम हो जाता है।
19:19:19 संतुलित उर्वरक और उन्नत किस्में
पौधों के तेजी से विकास और स्वस्थ शाखाओं के निर्माण के लिए संतुलित पोषण की जरूरत होती है। पोषण प्रबंधन के तहत किसान 19:19:19 जैसे संतुलित एनपीके उर्वरक का इस्तेमाल कर सकते हैं। ड्रिप फर्टिगेशन तकनीक के माध्यम से यह संतुलित पोषक तत्व पानी में घुलकर सीधे जड़ों में पहुंचता है, जिससे खाद की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं होती और पौधों को हर दौर में जरूरी ऊर्जा मिलती है।
क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार सही प्रभेद चुनना उत्पादन की रीढ़ माना जाता है। पलामू के किसान स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मुख्य रूप से विंटर डॉन किस्म को सबसे ज्यादा तरजीह देते हैं। अपने बेहतरीन स्वाद और आकर्षक चटख रंग के कारण बाजार में विंटर डॉन की मांग सबसे ऊंची रहती है। इसके अलावा किसान चैंडलर, पूसा अर्ली और डगलस जैसे अन्य उन्नत प्रभेदों की भी सफलतापूर्वक बुवाई कर सकते हैं।
रोपाई का समय, तुड़ाई और संभावित कमाई
स्ट्रॉबेरी की खेती में समय का ध्यान रखना सबसे निर्णायक पहलू है। सामान्य तौर पर 15 अक्टूबर तक पौध लगा देने से रोपाई के करीब 45 दिन बाद पौधों में फूल आना शुरू हो जाता है। फूल आने के कुछ ही समय बाद फल पकने लगते हैं और तुड़ाई का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। एक बार उत्पादन शुरू होने के बाद पौधों से लगभग पांच महीने तक लगातार फल प्राप्त होते रहते हैं।
पलामू के वातावरण में किसान आमतौर पर फरवरी से मार्च के महीनों के दौरान मुख्य उत्पादन हासिल करते हैं। सही प्रबंधन और बाजार तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करके किसान इस पूरी फसल अवधि में लगभग 5 से 6 लाख रुपए तक की शानदार कमाई कर सकते हैं।



















