झारखंड का लातेहार जिला अब अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ एक विशेष कृषि उत्पाद के कारण पूरे देश में अपनी नई पहचान बना रहा है। जिले के महुआडांड़ पहाड़ी क्षेत्र में उगाई जाने वाली पारंपरिक जीराफूल धान की फसल ने पहली बार राज्य की सीमाओं को पार कर देश के बड़े व्यावसायिक बाजार में कदम रखा है। स्थानीय महिला किसानों द्वारा तैयार किए गए इस सुगंधित चावल की 6700 किलोग्राम की पहली बड़ी खेप हरियाणा के गुरुग्राम भेजी गई है। यह उपलब्धि न केवल इस दुर्लभ चावल किस्म को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर रही है, बल्कि सुदूर क्षेत्रों की ग्रामीण महिलाओं के जीवन में वित्तीय मजबूती और नया आत्मविश्वास भी ला रही है।
पहाड़ी क्षेत्र की खास पैदावार और जीराफूल की विशेषताएं
लातेहार जिले के महुआडांड़ क्षेत्र में पहाड़ियों की तलहटी और समृद्ध मिट्टी में उगाया जाने वाला जीराफूल चावल अपनी खास बनावट के लिए जाना जाता है। इस चावल के दाने काफी छोटे और बारीक होते हैं, और पकाते समय इनमें से जीरे जैसी प्राकृतिक सुगंध आती है। पकाने के बाद यह बेहद स्वादिष्ट और पाचक होता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक और पूर्णतः प्राकृतिक तरीकों से उपजाए जाने के कारण यह चावल स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद लाभदायक माना जाता है। अब तक यह फसल केवल स्थानीय गांवों और आसपास के पारंपरिक बाजारों तक सीमित थी। लेकिन अब महानगरों में जैविक तथा पारंपरिक कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण जीराफूल राइस को एक बड़ा बाजार मिल गया है। झारखंड पहले से ही तसर सिल्क, महुआ, मडुआ और लाह जैसे उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है, और अब इस सूची में लातेहार का जीराफूल चावल भी प्रमुखता से शामिल हो गया है।
1500 महिला किसानों का प्रयास और गुरुग्राम का कमीशन मॉडल
इस पूरी पहल की सबसे बड़ी ताकत क्षेत्र की महिला किसान हैं जो स्वयं सहायता समूहों के जरिए संगठित होकर काम कर रही हैं। लातेहार के उपायुक्त संदीप कुमार ने जानकारी दी है कि महुआडांड़ इलाके की लगभग 1500 महिला किसान इस जीराफूल धान की संगठित खेती, कटाई, कुटाई और सफाई के कार्य से जुड़ी हुई हैं। गुरुग्राम की एक निजी कंपनी के साथ हुए व्यापारिक समझौते के तहत 6,700 किलोग्राम चावल की सप्लाई की गई है। गुरुग्राम के बाजार में इस उत्पाद की बिक्री होने के बाद कंपनी महिला किसानों को तय कमीशन की राशि सीधे उनके खातों में हस्तांतरित करेगी। जिला प्रशासन का मानना है कि यह पहल केवल खेती-किसानी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अब इसमें पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और डायरेक्ट मार्केटिंग जैसी व्यावसायिक गतिविधियां शामिल हो चुकी हैं, जिससे ग्रामीण महिलाओं के लिए नियमित आय का एक स्थाई जरिया बन रहा है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव और सरकारी प्रोत्साहन
राज्य का ग्रामीण विकास विभाग इस पहल को दूरदराज के इलाकों की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने वाले मॉडल के रूप में देख रहा है। झारखंड की ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने इस सफलता पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य की महिलाएं विभिन्न प्रकार के अनोखे और पारंपरिक स्थानीय उत्पाद तैयार कर रही हैं। मंत्री के अनुसार सरकार की प्राथमिकता यह है कि इन उत्पादों को केवल स्थानीय या राष्ट्रीय बाजारों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि आने वाले समय में इन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जाए। इसके लिए राज्य सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों को आधुनिक कृषि उपकरण, प्रसंस्करण सुविधाएं, गुणवत्ता नियंत्रण और सीधा बाजार उपलब्ध कराने में हर संभव सहायता प्रदान कर रही है।
आत्मनिर्भरता की राह पर कदम और भविष्य की योजनाएं
महुआडांड़ की महिला किसानों का कहना है कि समूह से जुड़कर जीराफूल चावल का व्यावसायिक उत्पादन करने से उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। पहले जहां उन्हें अपनी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता था, वहीं अब सीधे कंपनियों से जुड़ने से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अपने परिवारों के स्वास्थ्य तथा बच्चों की पढ़ाई पर बेहतर खर्च कर पा रही हैं। लातेहार जिला प्रशासन की योजना आने वाले वर्षों में जीराफूल धान के खेती के रकबे को बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर आधुनिक पैकेजिंग इकाइयां स्थापित करने की है ताकि इस ब्रांड की आपूर्ति को निर्बाध बनाया जा सके।



















