झारखंड की राजधानी रांची स्थित प्रतिष्ठित जवाहर विद्या मंदिर में नब्बे के दशक के छात्रों के लिए एक विशेष पुनर्मिलन समारोह आयोजित किया गया। इस भावुक आयोजन में महेंद्र सिंह धोनी के स्कूल के दिनों के दो साल वरिष्ठ साथी श्रीराम सिंह भी शामिल हुए। उन्होंने भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में शुमार महेंद्र सिंह धोनी के स्कूली जीवन, उनके अनूठे स्वभाव, खेल के प्रति लगन और विकेटकीपिंग में अचानक हुए उनके प्रवेश को लेकर कई अनसुने प्रसंगों पर विस्तार से चर्चा की।
जमशेदपुर की भीषण गर्मी और ढाई घंटे का कड़ा अभ्यास
श्रीराम सिंह ने मैदान पर धोनी के कठिन परिश्रम को याद करते हुए एक ऐसा वाकया बताया जिसने उस समय सभी को हैरान कर दिया था। स्कूल की ओर से खेलों को काफी प्रोत्साहन मिलता था, जिसके चलते छात्र मुकाबलों के लिए जमशेदपुर समेत कई अलग-अलग शहरों में साथ यात्रा करते थे। ऐसे ही एक जमशेदपुर दौरे के दौरान उन्होंने देखा कि चिलचिलाती धूप में ग्राउंड पर धोनी अकेले कानों में हेडफोन लगाए लगातार दौड़ लगा रहे थे। श्रीराम के अनुसार, उन्होंने समय नोट किया तो धोनी करीब ढाई घंटे तक बिना रुके भागते रहे और पसीने से पूरी तरह तरबतर हो चुके थे। खेल को लेकर ऐसा अनुशासन और समर्पण उनके भीतर बेहद कम उम्र से ही मौजूद था।
मेकॉन मैदान, दूध का शौक और शांत स्वभाव की जड़ें
स्कूल के दिनों में बच्चे मेकॉन मैदान पर क्रिकेट खेला करते थे। खेल समाप्त होने के बाद टीम के साथी पास के ही एक छोटे से होटल में जाकर अल्पाहार और स्नैक्स खाते थे। श्रीराम बताते हैं कि धोनी बहुत ज्यादा शरारती नहीं थे। खाने-पीने की आदतों में उन्हें सादा दूध बेहद पसंद था और वे नियमित रूप से काफी दूध पीते थे। मैदान पर या बाहर वे कभी किसी से व्यर्थ का विवाद या झगड़ा नहीं करते थे। उनका जो शांत और संयमित अंदाज दुनिया भर में मशहूर हुआ, उसकी शुरुआत वहीं से हो चुकी थी। किसी भी नाजुक मोड़ पर विचलित हुए बिना पूरी तरह शांत बने रहना उनका प्राकृतिक स्वभाव था।
विकेट से चिपककर कीपिंग और विपक्षी बल्लेबाजों में खौफ
यह धारणा बिल्कुल सही नहीं है कि केवल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ही विपक्षी खिलाड़ी धोनी से घबराते थे। स्कूल स्तर के इंटर स्कूल मैचों में भी जब प्रतिद्वंद्वी टीमें विकेट के पीछे धोनी को दस्ताने पहने देखती थीं, तो बल्लेबाजों के मन में पवेलियन लौटने का डर बैठ जाता था। उस दौर में भी धोनी की एक खास तकनीक थी कि गेंद चाहे जितनी भी तेज या गति वाली क्यों न हो, वे स्टंप्स के बिल्कुल करीब सटकर कीपिंग करते थे। बल्लेबाज के क्रीज से हल्का सा भी बाहर निकलते ही पलक झपकते ही वे गिल्लियां बिखेर देते थे, जिससे विरोधी टीमों के लिए रन बनाना बेहद मुश्किल हो जाता था।
गोलकीपर से अचानक दस्ताने थामने और इतिहास रचने का मोड़
धोनी के क्रिकेट में दस्ताने संभालने के पीछे भी एक अप्रत्याशित घटनाक्रम था। स्कूल टीम के पास पहले से ही एक नियमित विकेटकीपर मौजूद था, लेकिन ऐन मौके पर उसने टीम का साथ छोड़ दिया। उसके माता-पिता ने खेल पूरी तरह बंद करके केवल पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने का दबाव डाला। अचानक सामने आए इस संकट के बीच स्कूल के खेल शिक्षक बनर्जी सर ने समाधान निकाला। उन्होंने धोनी को फुटबॉल मैदान में शानदार गोलकीपिंग करते हुए देखा था। बनर्जी सर ने धोनी को बुलाकर कुछ मैचों के लिए विकेट के पीछे खड़े होने की जिम्मेदारी सौंपी। उस तात्कालिक निर्णय ने आगे चलकर विश्व क्रिकेट का इतिहास ही बदल दिया।
हर छोटे-बड़े मैच में माता-पिता की निरंतर मौजूदगी
महेंद्र सिंह धोनी के इस शुरुआती सफर में उनके परिवार का योगदान बेहद मजबूत रहा। स्कूल का कोई छोटा अभ्यास मैच हो या कोई बड़ा इंटर स्कूल टूर्नामेंट, मैदान के किनारे उनके माता-पिता दोनों की मौजूदगी हमेशा दर्ज होती थी। भले ही बाकी किसी भी साथी खिलाड़ी के परिजन मुकाबला देखने न पहुंचें, लेकिन धोनी के माता-पिता हर परिस्थिति में अपने बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए बाउंड्री लाइन के बाहर खड़े दिखाई देते थे। इसी अटूट पारिवारिक सहारे और खुद की अथाह मेहनत के बल पर उन्होंने भारतीय क्रिकेट में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।



















