झारखंड के बोकारो जिले में किसान धान और गेहूं की पारंपरिक पैदावार के अलावा मोटे अनाज की फसलों पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं। इन मोटे अनाजों के भीतर ज्वार एक बेहद महत्वपूर्ण और पौष्टिक फसल मानी जाती है। हालांकि, अगर खेत में सही समय पर निगरानी और वैज्ञानिक देखरेख न की जाए, तो ज्वार की फसल में विभिन्न प्रकार के हानिकारक कीटों और गंभीर बीमारियों का बड़ा खतरा पैदा हो जाता है। इस तरह के अनियंत्रित संक्रमण की वजह से फसल की पैदावार सीधे तौर पर गिर जाती है और किसानों को भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ता है। इसी समस्या को देखते हुए बोकारो स्थित कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ सुषमा सरोज ने ज्वार में नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों की पहचान, उनके जैविक स्वभाव और उनसे बचाव के पुख्ता कृषि उपायों की विस्तार से जानकारी दी है।
तना छेदक कीट के लक्षण और इसका रासायनिक समाधान
कृषि वैज्ञानिक डॉ सुषमा सरोज के अनुसार ज्वार की खड़ी फसल पर सबसे गंभीर और व्यापक हमला तना छेदक कीट की तरफ से दर्ज किया जाता है। इस कीट का संपूर्ण जीवन चक्र चार अलग-अलग चरणों से होकर गुजरता है, जिसमें अंडा, लार्वा, प्यूपा और व्यस्क पतंगे की अवस्थाएं शामिल होती हैं। वैज्ञानिक पड़ताल के मुताबिक इन सभी चरणों में से लार्वा यानी इल्ली की अवस्था पौधे के लिए सबसे ज्यादा घातक सिद्ध होती है।
यह लार्वा पौधे के हरे तने के भीतर सुराख करके सीधे अंदरूनी हिस्से में घुस जाता है। अंदर दाखिल होने के बाद यह पौधे के आंतरिक तंतुओं को लगातार कुतर कर खाता रहता है, जिससे ज्वार के पौधे का बीच का हिस्सा पूरी तरह सूखने लगता है। इस स्थिति से पौधे की सामान्य वृद्धि रुक जाती है और पूरी फसल बुरी तरह प्रभावित हो जाती है। तना छेदक के इस गंभीर संक्रमण को रोकने के लिए किसान रासायनिक उपचार का सहारा ले सकते हैं। इसके लिए क्लोरपायरीफॉस अथवा प्रोफेनोफॉस दवा को 1.5 ml या 2 ml प्रति लीटर पानी के अनुपात में अच्छी तरह घोल बनाकर पौधों पर छिड़कना चाहिए, जिससे तना छेदक की समस्या प्रभावी ढंग से नियंत्रित हो जाती है।
सैनिक कीट से सुरक्षा: गर्मी की गहरी जुताई और सटीक कीटनाशक
तना छेदक के अलावा ज्वार को नुकसान पहुंचाने वाला दूसरा सबसे बड़ा शत्रु सैनिक कीट है। सैनिक कीट का लार्वा पौधों की हरी पत्तियों को तेजी से खाकर उन्हें छलनी कर देता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है। यह कीट अपनी आरंभिक अवस्थाओं में खेत की मिट्टी के नीचे दबा रहता है, इसलिए इसके जीवन चक्र को तोड़ने के लिए समय पर जुताई करना अनिवार्य माना गया है। विशेष रूप से ग्रीष्मकाल में खेत की गहरी जुताई करने से मिट्टी के भीतर छिपी कीट की विभिन्न अवस्थाएं जमीन के ऊपर आ जाती हैं। तेज चिलचिलाती धूप के सीधे संपर्क में आने से ये सुप्त कीट स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं।
सैनिक कीट के प्रकोप से खेत को सुरक्षित रखने के लिए नियमित रूप से खेत की साफ-सफाई करना और पिछली फसल के अवशेषों का वैज्ञानिक निस्तारण करना अत्यंत लाभकारी है। अगर खेत में अवशेष नहीं बचेंगे, तो कीटों के दोबारा अंडे देने और पनपने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। इसके साथ ही, जब खड़ी फसल पर सैनिक कीट का हमला दिखाई दे, तो किसान 5% इमामेक्टिन बेंजोएट का 1 ml प्रति लीटर पानी में मिश्रण तैयार कर खेत में छिड़काव करें, जिससे फसल को इस विध्वंसक कीट से पूरी सुरक्षा मिलती है।
झुलसा और भूरी पत्ती रोग: रोकथाम के लिए बीज उपचार और फसल चक्र
कीटों के साथ-साथ ज्वार की फसल कई गंभीर फफूंद जनित रोगों की चपेट में भी आ सकती है, जिनमें झुलसा रोग और भूरी पत्ती रोग प्रमुख हैं। इन दोनों बीमारियों के फैलने पर ज्वार के पौधों की पत्तियों पर गहरे धब्बे उभर आते हैं। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार यह बीमारी मुख्य तौर पर रोग ग्रस्त बीज बोने के कारण खेतों में फैलती है। रोग के असर से पूरी फसल धीरे-धीरे सूखने लगती है और पौधों का प्राकृतिक विकास पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है।
झुलसा और पत्ती धब्बा रोग के नियंत्रण के लिए किसानों को फसल चक्र अपनाने की सलाह दी गई है, ताकि मिट्टी में मौजूद रोग कारक सक्रिय न रह सकें। साथ ही खेतों में मौजूद पुराने पौधों के अवशेषों और खरपतवार को पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए। सबसे अहम बचाव बुवाई से पहले ही किया जा सकता है। किसान यदि बुवाई पूर्व बीजों को मैनकोजेब या कार्बेन्डाजिम जैसे फफूंदनाशकों से उपचारित कर लें, तो इन दोनों बीमारियों का खतरा शुरुआत में ही खत्म हो जाता है और ज्वार की स्वस्थ उपज प्राप्त होती है।


















