कभी बेकरी गाड़ियों के स्टीयरिंग संभालकर आजीविका चलाने वाले दिलीप कुमार ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करते हुए खुद का बेकरी उद्यम खड़ा कर लिया है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में कदम रखने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना का सहारा लिया। इस सरकारी पहल के तहत उन्होंने विधिवत ऑनलाइन आवेदन दाखिल किया और फिर पूरी बेकरी परियोजना की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कराई। प्रशासनिक और वित्तीय औपचारिकताओं को पूरा करते हुए उन्होंने स्वरोजगार की दिशा में ठोस शुरुआत की।
परियोजना लागत, बैंक लोन और 35 प्रतिशत सब्सिडी
इस नई बेकरी इकाई की स्थापना में कुल 7 लाख रुपये के आसपास का खर्च आया। इस संपूर्ण वित्तीय ढांचे को खड़ा करने के लिए उन्हें बैंकिंग चैनल के माध्यम से लोन स्वीकृत किया गया। इसके साथ ही योजना के प्रावधानों के अंतर्गत दिलीप कुमार को कुल लागत पर 35 प्रतिशत की पूंजीगत सब्सिडी का सीधा लाभ मिला, जिससे शुरुआती निवेश का दबाव काफी कम हो गया। व्यवसाय संचालन के लिए जरूरी तकनीकी ढांचा और मशीनरी जुटाने के क्रम में उन्होंने दरभंगा के एक अधिकृत सप्लायर से संपर्क साधा और वहां से आवश्यक उपकरण मंगवाए।
आधुनिक मशीनरी और दैनिक उत्पादन का दायरा
बेकरी परिसर में आधुनिक उत्पादन के लिए कई जरूरी मशीनें स्थापित की गई हैं। इनमें तापमान नियंत्रण वाली इलेक्ट्रॉनिक भट्टी, बड़े पैमाने पर मिश्रण तैयार करने वाली मिक्सिंग मशीन, ब्रेड कटिंग मशीन, ट्रे और कई छोटे-बड़े सहायक कलपुर्जे शामिल हैं। इन तकनीकी उपकरणों के जरिए उत्पादन प्रक्रिया को सुगम बनाया गया है। वर्तमान समय में इस सेटअप के जरिए ब्रेड, रस्क टोस्ट, क्रीम केक, मीठी पापड़ी और बिस्किट जैसे दैनिक उपभोग के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। हर दिन इस इकाई में लगभग 60 से 70 किलोग्राम बेकरी आइटम का उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा रहा है।
स्थानीय आपूर्ति, दैनिक कमाई और पारिवारिक श्रम
तैयार माल की बिक्री के लिए कोडरमा जिले के विभिन्न बाजारों और स्थानीय खुदरा दुकानों में सीधी आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। रोजाना के माल की खपत से बेकरी में प्रतिदिन करीब 5 से 6 हजार रुपये का कारोबार दर्ज हो रहा है। इस निरंतर मांग के चलते पूरी इकाई का मासिक टर्नओवर लगभग डेढ़ लाख से दो लाख रुपये तक पहुंच जाता है। इस पूरे उद्यम का सबसे उल्लेखनीय पहलू इसका पारिवारिक श्रम मॉडल है। दिलीप ने बाहर से किसी पेशेवर कारीगर को काम पर नहीं रखा है, बल्कि उनके पिता, भाई और परिवार के अन्य सदस्य ही उत्पादन में हाथ बंटाते हैं। इतना ही नहीं, तैयार खाद्य सामग्री की मार्केटिंग और दुकानों तक डिलीवरी का पूरा जिम्मा भी परिवार के लोग आपस में मिलकर निभाते हैं।



















