पारंपरिक अनाज की फसलों पर निर्भर रहने वाले किसानों के लिए खेती की बढ़ती लागत और अनिश्चित मुनाफा लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों में महीनों की कड़ी मेहनत और भारी लागत लगाने के बाद भी कई बार किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता। इस स्थिति को बदलने के लिए अब फसल विविधीकरण यानी बागवानी और फ्लोरीकल्चर को एक टिकाऊ समाधान के रूप में देखा जा रहा है। सीमित जोत वाले किसान भी अपनी छोटी जमीन पर फूलों की पैदावार कर बेहतर आर्थिक लाभ हासिल कर सकते हैं। झारखंड के देवघर जिले में यह पहल खासतौर पर कारगर साबित हो रही है, जहां धार्मिक महत्व के कारण फूलों की भारी खपत हर दिन बनी रहती है।
धार्मिक महत्व के कारण देवघर में फूलों की भारी खपत
देवघर को प्रसिद्ध तीर्थस्थल बाबा बैद्यनाथ की पावन नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और विशेष पूजा-अर्चना के लिए पूरे देश से रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों और दैनिक पूजा में फूलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, जिसके चलते स्थानीय बाजार में फूलों की मांग कभी कम नहीं होती। श्रद्धालुओं की जरूरतों के कारण विशेष रूप से गेंदा फूल की खपत सबसे अधिक देखी जाती है।
पूजा-पाठ के अलावा वैवाहिक समारोहों, सामाजिक और धार्मिक उत्सवों, पार्टियों और मंडप सजावट के कार्यों में भी सुगंधित और सजावटी फूलों की सतत आवश्यकता रहती है। गेंदा के साथ-साथ गुलाब, रजनीगंधा, जरबेरा और अन्य किस्म के फूलों का कारोबार भी यहां काफी तेजी से बढ़ रहा है। स्थानीय स्तर पर ऐसी मजबूत खपत मौजूद होने के कारण किसानों को अपनी कटी हुई फसल बेचने के लिए दूर की मंडियों में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, बल्कि गृह जिले में ही उन्हें तुरंत खरीदार और उचित मूल्य मिल जाता है।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत शत-प्रतिशत सरकारी मदद
इस बड़े बाजार अवसर को किसानों की आमदनी में बदलने के लिए सरकार राष्ट्रीय बागवानी मिशन के माध्यम से फ्लोरीकल्चर को बढ़ावा दे रही है। देवघर प्रखंड के प्रखंड कृषि पदाधिकारी शशांक शेखर के अनुसार, उद्यान विभाग की ओर से किसानों को फूलों की खेती शुरू करने के लिए 100 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। इस व्यवस्था के अंतर्गत किसान को फूलों की खेती के लिए अपनी जेब से शुरुआती निवेश या जरूरी लागत वहन नहीं करनी पड़ती, क्योंकि निर्धारित योजना के तहत संपूर्ण अनिवार्य खर्च विभाग स्वयं उठाता है।
इस सरकारी सहायता का लाभ उठाने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि आवेदक किसान के पास अपनी निजी कृषि भूमि होनी चाहिए। जिन काश्तकारों के पास उपयुक्त जमीन उपलब्ध है और वे पारंपरिक खेती के ढर्रे से बाहर निकलकर अपनी पारिवारिक आय को बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए यह व्यवस्था एक सुरक्षित वित्तीय संबल प्रदान करती है।
आवेदन की प्रक्रिया और जरूरी कागजी दस्तावेज
योजना में शामिल होकर अनुदान का लाभ लेने के इच्छुक किसानों को एक तय प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना होता है। आवेदन पत्र के साथ किसान को अपना आधार कार्ड और सक्रिय मोबाइल नंबर संलग्न करना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त भूमि के स्वामित्व को प्रमाणित करने के लिए जमीन का रकबा, खाता संख्या और खसरा से संबंधित राजस्व विवरण स्पष्ट रूप से दर्ज करना होता है।
आवेदन प्रपत्र भरने के बाद उस पर स्थानीय जनप्रतिनिधि अथवा प्रखंड कृषि पदाधिकारी या बीटीएम जैसे सक्षम सरकारी अधिकारियों के हस्ताक्षर और सत्यापन कराए जाते हैं। औपचारिक सत्यापन पूरा होने के उपरांत यह आवेदन उद्यान विभाग के कार्यालय में जमा कर दिया जाता है। विभाग के अधिकारी भूमि दस्तावेजों और मौके की जांच प्रक्रिया पूरी करते हैं, जिसके बाद चयनित लाभार्थी किसान के खेत में योजना के प्रावधानों के अनुसार फूलों की खेती शुरू कराई जाती है।
ग्रामीण युवाओं और काश्तकारों के लिए स्थानीय आजीविका
यह पहल केवल खेती के तरीके को बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी आजीविका तैयार करने का एक सशक्त जरिया बन रही है। बाबा मंदिर की उपस्थिति से देवघर में फूलों की बारहमासी मांग पहले से ही सुनिश्चित है, जिससे किसानों के सामने विपणन का जोखिम लगभग समाप्त हो जाता है। शत-प्रतिशत सब्सिडी मिलने से किसानों पर कर्ज या आर्थिक नुकसान का डर नहीं रहता। ऐसे में जिले के युवाओं और काश्तकारों के लिए यह योजना पलायन रोके रखने और अपने ही गांव-जिले में सम्मानजनक आमदनी जुटाने का एक अत्यंत व्यावहारिक माध्यम बनकर उभर रही है।



















